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राम को तो मानेंगे, मगर राम की नहीं

Bhola Tiwari Oct 15, 2021, 4:20 PM IST राष्ट्रीय
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नीरज कृष्ण

पटना : दशहरा संस्कृत भाषा के शब्द दशा व 'हरा' से मिल कर बना है। दशहरा का दूसरा मतलब भगवान राम के द्वारा रावण के दर्सों सिर, जो दस पापों और दस तामसी आदतों के सूचक है यानि काम, क्रोध, लोभ, मोह-मद, मत्सर, अहंकार, आलस्य, हिंसा और चोरी। दशहरा इन सभी को समूल नष्ट करके हमको राक्षस राजा राज के आंतक अनाचार से मुक्ति दिलाने से है। 

विजयदशमी को हम अन्याय पर न्याय की, विजय सौहार्द की, अहंकार की पराजय दिन के रूप में मनाते है। ध्यान रखें कि जिजयदशमी हमें बुराई में भी अच्छाई ढूंढने का अवसर देता है। रावण वध के बाद स्वयं भगवान राम ने अपने छोटे भाई लक्ष्मण को रावण के पास जाकर रावण से राजनीति सीखने और गूढ ज्ञान प्राप्त करने का आदेश दिया था। रावण ने लक्ष्मणजी को तीन सीख दी, पहली- शत्रु को कभी छोटा नहीं समझना चाहिए, दूसरी- शुभ कार्य जितनी हो जल्दी कर देना चाहिये, तीसरा- अपने जीवन का कोई राज किसी को भी नहीं बतलाना चाहिये। रावण ने लक्ष्मणजी को कहा कि- यहां भी मैं चूक गया क्योंकि विभीषण मेरी मृत्यु का राज जानता था, ये मेरे जीवन की सबसे बड़ी गलती थी। आईये आज हम सभी विजयादशमी को मनाये तामसी प्रवत्तियों पर सात्विक प्रवत्तियों के विजय दिवस के रूप में स्नेह प्रेम और विनम्रता अपनाने के पर्व के रूप में मनायें।

रावण-कुंभकर्ण-मेघनाद के पुतलों को जलाते वक्‍त कुछ ही क्षणों के लिये हमारे मन में भगवान श्रीराम के आदर्शों को अपने जीवन में अपना कर सभी प्रकार दुष्कर्मों एवं तामसिक प्रवत्तियों यानी काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह, मत्सर, अहंकार, आलस्य, हिंसा एवं चोरी को त्यागने का विचार आता है, किन्तु हमारा यह विचार क्षणिक होता है क्योंकि कुछ ही समय बाद हम सभी अपने सांसारिकता के प्रपंचों में तल्लीन हो कर तामसिक प्रवृत्तियों के चंगुल में फँस जाते हैं। काश अगर हम हम इस सात्विक सोच को हमेशा के लिए अमली जामा पहना पाते तो हमारे समाज में झूठ, फरेब, धोखाधड़ी, लूट, चोट, चोरी-चकारी, हिंसा, मारकाट, अपहरण-बलात्कार की भयावह घटनायें घटित ही नहीं होती। 

जरा सोचिये और चिंतन मनन कीजिये कि क्या ऐसा हो रहा है? अगर नहीं तो रावण-कुंभकर्ण-मेघनाद के पुतलों को जलाने और भव्य राम लीलाओं को देखने एवं श्री राम की कसमें खाने का क्या औचित्य है? क्‍यों हम लाखों-करोड़ो रुपये पुतले बनाकर उन्हें जलाने में व्यर्थ खर्च करते हैं? क्यों हमारे मन में काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह, आलस्य की जड़ें दिन-प्रति दिन मजबूत बनती जा रही है? क्‍यों हम पर निंदा करने में सबसे आगे रहते हैं? क्यों हमारी बहन-बेटियां अपहरणकर्ताओं के हाथों रोजाना बेइज्जत होती है? क्यों भ्रष्टाचार का विषाणु हममें आत्मसात हो गया है? क्यों हमारी करनी और कथनी में अंतर निरन्तर बढ़ता ही जा रहा है? क्यों हमारी जुबान पर राम किन्तु बगल में छुरी होती है? क्‍यों जरा सी सत्ता मिलते ही हम अहंकारी बन जाते हैं? 

सच्चे मन से स्वयं से यह वादा करें कि अपने भारत को प्रगतिशील, उन्नत, सर्वश्रेष्ठ राष्ट्र बनाने हेतु परस्पर स्नेह, सोहार्द, सामंजस्य स्थापित करने हेतु क्रोध,अभिमान, लालच-लोभ, मद, मोह, अहंकार, हिंसा चोरी-डकैती, ईर्ष्या-डाह का परित्याग कर आपस में सद्भावनापूर्ण सम्बन्ध बना कर रहेगें। एक-दूसरे की मदद करेगें। बहिन- बेटियों के सम्मान की रक्षा करेगें। हम सभी को इन तामसिक आदतों के विनाशकारी नतीजों के बारे में आत्ममंथन करना होगा। क्रोधित होकर हम सफलता के सभी दरवाजे बंद कर देते हैं।

आलस्य आदमी को उसके कर्मों से विमुख कर देता है, उसकी बुद्धि मंद हो जाती है जिससे समाज में उसकी कोई अहमियत नहीं होती है। कर्कश वाणी सिर्फ शत्रु पैदा कर सोहार्दता को समूल नष्ट करती है। काम वासना योनाचार-अनाचार की जननी है। आदमी काम वासनाओं से अपने को चरित्रहीन बना लेता है एवं अनेकों अनैतिक कार्यो को कर अनेक बीमारियों को बुलावा देता है। 

लोभ-लालच के वशीभूत होकर रावण ने भगवान शिवजी से अपने लिए सोने की लंका मांग ली एवं लंकापति बन स्वयं को सर्वश्रेष्ठ, शक्तिशाली मान अवांछित कार्यों में लिप्त होने लगा। रावण की इर्ष्या-डाह-जलन की प्रवृति की वजह से रावण का सगा भाई विभीषण रावण को छोड़ कर राम का शरणार्थी बन गया। आज भी इर्ष्या-जलन की बजह आदमी बेजजह यह सोच कर दुखी रहता है कि मेरा पड़ोसी, मेरे रिश्तेदार, मेरे दोस्त मुझसे ज्यादा सुखी कैसे और क्यों हैं? 

रावण की पर निंदा की आदत भी उसकी पराजय का कारण बनी। रावण का अभिमान ही उसके पतन का कारण बना। हम हमारे अभिमान-घमंड की वजह से दूसरों के स्वाभिमान को ठेस पहुंचाते हैं। पवनपुत्र हनुमान जी ने लंकापति रावण के बैभव को देख कर कहा कि अगर रावण में अधर्म अधिक बलबान नहीं होता तो बह देवलोक का भी स्वामी बन जाता। सच्चाई तो यही है कि विजयादशमी का पर्व मनाना तभी सार्थक होगा जब हम अपनी दिनचर्या एवं जीवन में से सभी प्रकार के पापों यानि काम, क्रोध, लोभ, मोह-मद, मत्सर, अहंकार, आलस्य, हिंसा, अधर्म और चोरी को छोड़ने का संकल्प लेकर उसे मूर्त रूप देगें और तभी सही मायनों में राम राज्य स्थापित हो सकेगा। राम राज्य की स्थापना मात्र मंदिरों में माथा टेकने और राम राम के नाम को जपने से नहीं होगा वरन राम के द्वारा स्थापित मानवीय आदर्शों को मूर्त रूप देने से होगा।

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