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बागमती नदी पर बना कॉफर बांध का टूटना और भ्रष्टाचार

Bhola Tiwari Jul 13, 2019, 6:52 AM IST टॉप न्यूज़
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 दिनेश मिश्रा

अभी बीते 30 जून को मुजफ्फरपुर के बेनीपुर गांव में बागमती पर हाल ही में बना कॉफर बांध टूट गया। तटबंध के अंदर के दर्जनों गांव जलमग्न हो गए। कॉफर बांध पर बात करने से पहले थोड़ी पृष्ठभूमि।

एक दौर आया जब बिहार में बाढ़ का समाधान बांध को मान लिया गया और नदियों को बांध से घेरने की परियोजनाएं शुरू हुईं। जानकारों ने तब भी इसे समाधान की जगह बड़ा नुकसान बताया। लेकिन उनकी नहीं सुनी गई। बागमती भी भला कैसे बचती। यह नदी तो बाढ़ और अपनी धारा बदलने के लिए पहले से कुख्यात रही है। धारा बदलने के कारण इसके द्वारा लाई गई तबाही सर्वविदित है। बावजूद इसके किसानों ने इस पर बांध बनाने की परियोजना का विरोध किया, क्योंकि यह नदी बाढ़ के साथ बहुत उपजाऊ मिट्टी साथ लाती है जो इलाके को आबाद करने में योगदान करती है।

1970 के दशक में बागमती की ऊपरी धारा को सीतामढ़ी जिले में नेपाल से सटे ढ़ेंग से लेकर रुन्नीसैदपुर तक तटबंध बनाकर घेर दिया गया। लेकिन आगे इसकी मुख्य धारा के अतिरिक्त दो उपधाराएं इतना चौड़ा पाट बना चुकी थीं कि तटबंध बनाने पर सहमति नहीं बन रही थी। पक्ष-विपक्ष के अपने-अपने तर्क थे। गौरतलब है कि 1987 में बिहार विधानसभा में यह पूछा गया कि सरकार यह बताए कि समाधान क्या है? विभागीय विश्वस्त सूत्र बताते हैं कि सरकार ने इस सवाल को तत्कालीन समग्र योजना एवं अन्वेषण प्रमंडल, मुजफ्फरपुर को अग्रसारित किया। तब इस प्रमंडल के अभियंताओं ने बांध के खिलाफ राय देते हुए विभाग को लिखा कि तटबंध बनाने की जगह उचित यह होगा कि दो उपधाराओं को भी ढंग से जीवित किया जाए। इससे बाढ़ का खतरा खुद कम जाएगा और तटबंध निर्माण से होनेवाले नुकसान से भी बचा जा सकेगा। उल्लेखनीय है कि तब बागमती की मुख्यधारा मुजफ्फरपुर-सीतामढ़ी मार्ग को कटौझा (मुजफ्फरपुर से लगभग 27-28 किलोमीटर) में पार करती थी, जबकि उपधाराएं मुकसुदपुर (मुजफ्फरपुर से लगभग 12-13 किलोमीटर) और खनुआं (मुजफ्फरपुर से लगभग 19-20 किलोमीटर) से गुजरती थीं। 

अगले अनेक वर्षों तक तटबंध का विचार ठंडे बस्ते में रहा। नीतीश कुमार जी के मुख्यमंत्री बनने के बाद इस विचार को बस्ते से झाड़-पोंछ कर बाहर लाया गया। इसके पीछे कौन लोग थे, यह आसानी से अनुमान लगाया जा सकता है। इस तरह बागमती परियोजना फिर शुरू हो गई। कई गांव तटबंध के भीतर समा गए। कलम के जादूगर स्व रामबृक्ष बेनीपुरी का गांव बेनीपुर भी इसमें शामिल था। तटबंध का काम धनौर से आगे गंगेया गांव तक पूरा कर लिया गया। लेकिन इसके कुपरिणाम सामने आने लगे और काम पूरब बढ़ने पर विरोध बढ़ा, टकराव हुआ और काम रोकना पड़ा। 

कोई तीन साल पहले हुए उग्र आंदोलन और बढ़ते जनदबाव के बीच सरकार को अप्रैल 2017 में एक रिव्यू कमिटी बनानी पड़ी, जिसमें अधिकारियों के अतिरिक्त देश के प्रमुख नदी विशेषज्ञ और अभियंता Sri Dinesh Mishra, गंगा मुक्ति आंदोलन के संस्थापक Sri Anil Prakash, IIT Kanpur के अर्थ साइंस के प्रो राजीव कुमार, IIT Patna के डॉ ओमप्रकाश आदि को सदस्य नामित किया गया। लेकिन, ठेकेदार-अधिकारी-राजनेता गठबंधन ने इस कमिटी की एक के बाद दूसरी बैठक होने तक नहीं दी। कमिटी को कागज पर सिर्फ अवधि विस्तार दिया जाता रहा और बीते 30 जून को यह अवधि विस्तार भी समाप्त हो गया। इस तरह एक सही संभावना को ठिकाने लगा दिया गया

यह जानना जरूरी है कि बेनीपुर में कॉफर बांध बनाने की नौबत अभी क्यों आई? दरअसल, 2011-2012 में बने तटबंध में ही इसका कारण छिपा हुआ है। हुआ यह कि दक्षिणी तटबंध के निर्माण में घोर तकनीकी अनियमितता बरती गई। मिट्टी कोई आधा किलोमीटर दूर से काटकर तटबंध बनाया जाना चाहिए था ताकि तटबंध के भीतर बगल में जमीन पूर्व स्थिति में कायम रहे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और ठेकेदारों ने तटबंध के सटे भाग से मिट्टी काटकर बांध खड़ा कर दिया। घूसखोर अभियंता भला क्यों रोकते! परिणामत: तटबंध के भीतर लंबाई के समानांतर चौड़ा गड्ढा बन गया। शीघ्र ही इस गड्ढे ने बेनीपुर में नदी की उपधारा का रूप ले लिया और साल दर साल इससे प्रवाह बढता गया। और फिर यह उपधारा ही मुख्य धारा बन गई। इस तरह नदी की मुख्य धारा बेनीपुर से धनौर तक मुख्य तटबंध से सटकर बहने लगी और तटबंध टूटने का खतरा पैदा हो गया। 

इससे पार पाने के लिए जल संसाधन विभाग ने इस वर्ष नदी की मूल मुख्य धारा की उड़ाही का निर्णय लिया। 24 करोड़ की लागत से बेनीपुर से आगे 19 किलोमीटर तक सौ मीटर की चौड़ाई में नदी की उड़ाही हुई तथा तटबंध से सटकर बह रही धारा को रोकने के लिए बेनीपुर में कॉफर बांध बनाया गया। इसके फलस्वरूप 15 मई को नदी का प्रवाह उड़ाही गई धारा से शुरू हो गया और तटबंध से सटकर बहने वाली धारा में शून्य प्रवाह हो गया। इससे इलाके के लोगों ने संतोष की सांस ली। लेकिन डेढ़ महीने में ही सबकुछ ध्वस्त हो गया। 30 जून को नदी का जलस्तर थोड़ा ही बढ़ा कि कॉफर बांध टूट गया और नदी की मुख्य धारा फिर 15 मई से पूर्व की स्थिति में पहुंच गई। आज बेनीपुर से धनौर तक 19 किलोमीटर लंबाई में नदी फिर तटबंध से सटे बह रही है। दर्जनों गांव पर खतरा मंडरा रहा है। टूटे हुए कॉफर बांध को भरने की कोशिशें नाकाम हो गई हैं। 

आज विभाग झूठा बहाना बना रहा है कि कॉफर बांध टूटा नहीं, नदी में अचानक पानी आने से ओवरटॉपिंग हुई है। यह सरासर झूठ है। सच्चाई यह है कि घटिया निर्माण के कारण कॉफर बांध टूट गया।

भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस की बात करनेवाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी के राज में भ्रष्टाचार किस तरह मजबूती से कायम है, इसका यह पुष्ट प्रमाण है।

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