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हीट वेव से बचाने के लिए धारा 144

Bhola Tiwari Jul 13, 2019, 4:32 AM IST टॉप न्यूज़
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 कबीर संजय


आमतौर पर धारा 144 एक किस्म की बदनाम धारा है। अपने खिलाफ होने वाले विरोध-प्रदर्शनों को रोकने के लिए शांति भंग की आशंका के नाम पर इसे आयद किया जाता है। लेकिन, ऐसा शायद पहली बार हो रहा है जब लोगों को लू यानी हीट वेव से बचाने के लिए धारा 144 लागू किया गया। जी हां, बिहार के गया जिले में इस बार लोगों को हीट वेव से बचाने के लिए धारा 144 लागू किया गया। 

यह सोचा जा सकता है कि धारा 144 और लू का क्या संबंध है। दरअसल, बिहार के मगध क्षेत्र में अब तक लू से 180 लोगों की मौत हो चुकी थी और लू ने एक विकराल समस्या का रूप धारण कर लिया  था। इसके चलते यहां पर 22 जून तक सभी स्कूलों को बंद कर दिया गया  था और दिन में 11 से चार बजे तक के बीच में किसी भी तरह की निर्माण गतिविधियों को रोकने, मेहनत वाला काम रोकने और किसी भी प्रकार के सार्वजनिक कार्यक्रम पर रोक लगाने के लिए धारा 144 को लागू किया गया। लू के खतरे से बचाने के लिए और लोगों को उनके घरों में रोकने के लिए धारा 144 का प्रयोग किया गया। 

आइये देखते हैं कि इसके कारण क्या हैं। दस जून को दिल्ली का तापमान अब तक के इतिहास में सबसे गर्म होते हुए 48 डिग्री पर रिकार्ड किया गया। जबकि, राजस्थान के चुरू ने इस बार 50.8 डिग्री सेल्सियस का तापमान रिकार्ड किया है। वर्ष 2019 का वर्ष ऐसे साल के रूप में याद किया जाएगा जिसमें सबसे ज्यादा समय तक लू के थपेड़े लोगों को महसूस करना पड़ा। हाल ही में हुए एक अध्ययन के मुताबिक हीट वेब के दिनों में वर्ष 1951 से लेकर 2015 के बीच में लगातार बढ़ोतरी हुई है। आंकड़ों के मुताबिक पांच सबसे ज्यादा भयंकर लू के थपेड़े वाले दिनों में से पांचों 1990 के बाद महसूस किए गए। 

नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथारिटी यानी एनडीएमए के मुताबिक वर्ष 1992 से वर्ष 2016 के बीच लू से मरने वालों की संख्या 25 हजार 716 है। इसमें सबसे ज्यादा तीन हजार से ज्यादा मौतें 1998 में और 2500 के लगभग मौतें वर्ष 2015 में हुईं। हालांकि, यह माना जाता है कि वास्तव में लू के चलते जान गंवाने वालों वास्तविक संख्या इससे कई गुना ज्यादा है। क्योंकि आमतौर पर लू के चलते होने वाली अन्य शारीरिक समस्याओं और उससे होने वाली मौतों को इसमें शामिल नहीं किया जाता है। 

लू की समस्या लगातार इतनी विकराल क्यों होती जा रही है। क्यों लोगों को ज्यादा दिन लू के थपेड़े झेलने पड़ रहे हैं। इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रापिकल मीडिओरोलॉजी का मानना है कि वर्ष 2020 के बाद हीटवेव की समस्या और बढ़ सकती है। एक अन्य अध्ययन कहता है कि अगर दुनिया के तापमान में दो फीसदी की भी बढ़ोतरी होती है तो वर्ष 2100 तक भारत में लू की समस्या तिगुनी बड़ी हो सकता है। 

वास्तविकता है कि आज दुनिया भर में ही ग्लोबल वार्मिंग के चलते होने वाली प्रलय के अलग-अलग संकेत मिलने लगे हैं। हम केदारनाथ में आई प्राकृतिक आपदा को तो फिर भी याद रखते हैं लेकिन लू से होने वाली मौतों को तो प्राकृतिक आपदा में शामिल भी नहीं किया जाता। जबकि, लू ऐसी प्राकृतिक आपदा है जिससे हर साल मरने वालों की संख्या कई अन्य प्राकृतिक आपदाओं की तुलना में कहीं ज्यादा है। 

याद रखें कि वर्ष 2018 में दुनिया भर में कार्बन उत्सर्जन का स्तर 37 अरब टन पर पहुंच चुका था। यह अब तक का सबसे ज्यादा रिकार्ड है। पिछले सात सालों में ही कार्बन उत्सर्जन की मात्रा में सबसे ज्यादा तेजी से बढ़ोतरी हुई है। इसी अनुसार दुनिया पर तबाही की छाया भी ज्यादा तेज होती हुई दिख रही है। 

हमारे यहां इस बार मानसून के देर होने के पीछे भी अल नीनो प्रभाव को कारण माना जा रहा है। अल नीनो प्रभाव समुद्र की सतह के ज्यादा गरम होने से पैदा होता है। जबकि, तबाही के निशान छोड़ने वाला फोन तूफान भी समुद्र की सतह के गर्म होने के चलते ही खतरनाक हुआ है। 

सवाल यह है कि इन संकेतों को क्या कोई पढ़ेगा और इससे निपटने के हल निकालें जाएंगे !!! 

(इस लेख के कई तथ्य और तर्क सीएसई के डिप्टीडायरेक्टर जनरल चंद्र भूषण के आलेख से साभार लिए गए हैं। चित्र इंटरनेट से)

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