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शिव और शक्ति के बीच इस विवाद के बाद प्रकट हुईं थी दस महाविद्या, जानें

Bhola Tiwari Sep 16, 2021, 8:52 AM IST राष्ट्रीय
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नई दिल्ली : नवरात्रि पर्व के दौरान नौ दिनों तक माता पार्वती के जिन विभिन्न रूपों की पूजा होती है, पुराणों में उन्हें महाविद्या कहा गया है। देवी दुर्गा के इन रूपों को विभिन्न दिशाओं की अधिष्ठात्री शक्तियां माना जाता है। इनमें माता काली और तारा देवी को उत्तर दिशा की, श्रीविद्या को ईशान दिशा की, देवी भुवनेश्वरी पश्चिम दिशा की, त्रिपुर भैरवी दक्षिण दिशा की, माता छिन्नमस्ता पूर्व दिशा की, मां धूमावती पूर्व दिशा की, बगला मां दक्षिण दिशा की, मातंगी माता वायव्य दिशा की और माता कमला र्नैत्य दिशा की अधिष्ठात्री हैं।

ऋषियों ने दस महाविद्याओं को तीन रूपों उग्र, सौम्य और सौम्य-उग्र में वर्गीकृत किया है। उग्र में मां काली, मां छिन्नमस्ता, मां धूमावती, मां बगलामुखी और सौम्य में मां त्रिपुरसुंदरी, मां भुवनेश्वरी, मां मातंगी और मां महालक्ष्मी (कमला) शामिल हैं। मां तारा तथा मां भैरवी को उग्र तथा सौम्य दोनों बताया गया हैं।

पौराणिक ग्रंथों में महाविद्याओं की उत्पत्ति भगवान शिव और उनकी पत्नी माता सती के बीच एक विवाद के कारण बताई गई है। ग्रंथों में बताया गया है कि शिव और सती के विवाह से सती के पिता दक्ष प्रजापति खुश नहीं थे। उन्होंने शिव का अपमान करने के लिए एक विशाल यज्ञ का आयोजन कर सभी देवी-देवताओं को आमन्त्रित किया लेकिन अपने जामाता भगवान शंकर और पुत्री सती को निमंत्रण नहीं भेजा।

 जिस दिशा में मुड़े शिव, उसी में प्रकट हुईं एक महाविद्या

देवर्षि नारद से माता सती को पितृगृह में यज्ञ आयोजन की जानकारी मिली तो वे यज्ञ में जाने की जिद करने लगीं लेकिन भगवान शिव ने बिना निमंत्रण जाने से इनकार कर दिया और माता सती को भी रोकने की कोशिश की। इससे नाराज माता सती ने स्वयं का रूप भयानक कर लिया। इसी रूप को माता काली के नाम से जाना जाता है। रूप देखकर भौचक रह गए भगवान शिव ने वहां से हटने की कोशिश की तो माता सती ने उन्हें रोकना चाहा और इसी के चलते शिव जिस दिशा में जाने की कोशिश करते, माता सती उस दिशा में एक नए रूप में प्रकट होकर उन्हें रोकने की कोशिश करने लगीं। शिव जिस दिशा में गये, उसी दिशा में माँ का एक नया रूप प्रकट होकर उन्हें रोकने लगा। इस प्रकार दसों दिशाओं में माँ ने दस रूप धारण किए थे। ये दस रूप ही दस महाविद्याएँ कहलाईं। माता के इन दस रूपों को ही मां काली, मां तारा, मां छिन्नमस्ता, मां षोडशी, मां भुवनेश्वरी, मां त्रिपुर भैरवी, मां धूमावती, मां बगलामुखी, मां मातंगी और मां कमला के रूप में पूजा जाता है। इन 10 महाविद्याओं में मां काली पहली देवी है।

महाविद्याओं का पहला रूप है माता काली

माता सती ने पहला रूप माता काली का धारण किया था। उनका ये रूप भयभीत करने वाला था। उनका रंग काला और केश खुले हुए थे। गले में नरमुंडों की माला के साथ एक हाथ में खप्पर और दूसरे में भयंकर खड्ग लेकर प्रकट हुई माता काली की गर्जना से दसों दिशाएं कांप उठीं। माता काली ने ही चण्ड और मुंड का वध किया तथा रक्तबीज के आतंक से भी संसार को उन्होंने ही ​मुक्ति दिलाई थी। दैत्य रक्तबीज ने कठोर तप करके वरदान पाया था कि अगर उसके खून की एक बूंद भी धरती पर गिरेगी तो उस से अनेक दैत्य पैदा हो जाएंगे। इससे मदांध हुए रक्तबीज ने तीनों लोकों में त्राहि—त्राहि मचा दी। देवताओं ने उसे युद्ध के लिए ललकारा लेकिन वे उसका वध नहीं कर पाए क्योंकि जैसे ही उसके शरीर से रक्त की बूंदें गिरतीं तो उससे अनेक रक्तबीज पैदा हो जाते थे।

रक्तबीज के मस्तक काटती चली गईं माता काली

नाकाम और पराजित देवता माता काली की शरण में गए। माता काली ने एक हाथ में खप्पर और दूसरे में खड्ग लेकर रक्तबीज को ललकारा। उन्होंने रक्तबीज के रक्त को धरती पर गिरने से रोकने के लिए अपनी जीभ को इतना विस्तार दे दिया कि जैसे ही वे अनेक रक्तबीज में से ​किसी एक का सिर काटती तो उसका रक्त उनकी जीभ पर आकर गिरता था। इससे नए रक्तबीजों की उत्पत्ति रूक गई। लेकिन रक्तबीजों का मस्तक काटते-काटते माता काली के क्रोध ने ऐसा विकराल रूप धारण कर लिया कि उनके पास जाने से देवता भी डरने लगे। तब भगवान शिव ने उनके मार्ग में लेटकर उनके क्रोध को शांत किया। जैसे ही माता के चरण भगवान शिव के वक्ष पर पड़े, वे ठिठक गईं और धीरे—धीरे शांत होती चली गईं। उनके इस रूप का वर्णन मार्कण्डेय पुराण में वर्णित है।

मुख्य शस्त्र खड्ग और अस्त्र है गदा, चक्र तथा धनुष

माता काली ने भगवान विष्णु के कानों के मैल से उत्पन्न मधु और कैटभ नामक भयंकर दैत्यों का भी वध किया था। खड्गधारिणी, शूलधारिणी घोररूपा माता काली के अन्य अस्त्र-शस्त्रों में गदा, चक्र और धनुष के साथ ही भुशुण्डी और परिघ भी शामिल हैं। 10 महाविद्याओं में से एक मां काली के 4 रूप हैं- दक्षिणा काली, शमशान काली, मातृ काली और महाकाली। माता ने महिषासुर, चंड, मुंड, धूम्राक्ष, रक्तबीज, शुम्भ, निशुम्भ आदि राक्षसों के वध किए थे।

ब्रह्मा को खाना चाहते थे मधु तथा कैटभ

माता काली को भगवान विष्णु की योगनिद्रा भी कहते हैं। पुराणों के अनुसार कल्प के अन्त में भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेष शैया पर योगनिद्रा का आश्रय लेकर निद्रामग्न हो गये थे। उसी दौरान उनके कानों के मैल से दो भयानक असुर मधु तथा कैटभ उत्पन्न हो गए। वे दोनों भगवान विष्णु के नाभिकमल में स्थित ब्रह्मा को खाने दौड़े तो उन्होंने भगवान को विष्णु को पुकारा लेकिन उनकी निद्रा भंग नहीं हो पाई। विचलित ब्रह्मा ने आद्यभवानी की स्तुति की तो भगवान विष्णु के नेत्र, मुख, नासिका, बाहु, हृदय तथा वक्षस्थल से निकलकर माता काली प्रकट हो गईं।

महाभयंकर और श्मशानवासिनी हैं माता काली

भयंकर मुख वाली माता काली के बायीं तरफ के दोनों हाथों में तत्काल काटे गये शव का सिर और दक्षिण तरफ के दोनों हाथ अभय और वरमुद्रा में हैं। उनके कण्ठ में पड़ी मुण्डमाला से रुधिर टपक रहा है। कमर में शवों के हाथों की करधनी पड़ी हुई है। माता काली महाभयंकर और श्मशानवासिनी हैं। माता काली की पूजा करने से भय से ​मुक्ति मिलती है। वैभव के साथ धन संपदा बढ़ती चली जाती है। पारिवारिक और मानसिक शांति मिलती है। उनकी पूजा के लिए शुक्रवार का दिन निर्धारित है। माता काली की पूजा चंडी पाठ करके की जाती है। कापालिक और अघोरी माता काली के भयानक रूप की पूजा करते हैं।

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