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आखिर कैसे टूटेगा नशे का कसता शिकंजा

Bhola Tiwari Sep 15, 2021, 8:16 AM IST कॉलमलिस्ट
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ध्रुव गुप्त

(आईपीएस)

पटना : ड्रग्स आज की दुनिया की कुछ सबसे बड़ी समस्याओं में एक है। अलग-अलग किस्म की नशीली दवाएं अपनी अलग रासायनिक संरचना के कारण मानव शरीर और मष्तिष्क को अलग-अलग तरीकों से प्रभावित करती हैं। इनके इस्तेमाल से कुछ देर के लिए लोगों को अपनी समस्याओं, तनावों और दुखों से छुटकारा पाकर किसी काल्पनिक, रहस्मयी दुनिया में घूम आने का अहसास ज़रूर होता है, लेकिन इनकी आदत अपने परिवेश और समाज से काटकर लोगों को अकेला ही नहीं करती, मानसिक विक्षिप्तता और शारीरिक रोगों का कारण भी बनती है। दुनिया भर के देशों में कठोरतम सज़ा के प्रावधानों के बावजूद ड्रग्स के इस्तेमाल में कमी आने के बजाय दिनोदिन बढ़ोतरी ही देखी जा रही है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार अपने देश भारत में ही ड्रग्स के आदी लोगों की संख्या हर साल 30 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है।  

अपने देश में पारंपरिक रूप से सबसे ज्यादा जिस एक नशीले पदार्थ का सेवन होता है, वह है गांजा। गांजे के पौधे का वैज्ञानिक नाम कैनेबिस है। इस पौधे केके विभिन्न उत्पादों को मारिजुआना, वीड, स्टफ, पॉट, ग्रास आदि नामों से भी जाना जाता है। कैनेबिस के फूलों से गांजा, इसके पौधे के रेज़िन से चरस या हशीश या हैश और इसके और कई दूसरे हिस्सों से कुछ अन्य ड्रग्स तैयार होते हैं। अमेरिका के कुछ राज्यों, कनाडा और उरुग्वे को छोड़ फिलहाल दुनिया के अधिकतर देशों में गांजे पर प्रतिबन्ध है। सिर्फ चिकित्सीय उद्देश्यों के लिए ही इस प्रतिबंध में छूट दी जाती है। यह और बात है कि प्रतिबंध के बावजूद दुनिया के कई हिस्सों में गांजे की खेती होती है। अफगानिस्तान- पाकिस्तान के सीमावर्ती कुछ प्रांत इसकी खेती के सबसे बड़े केंद्र हैं जहां से स्मगल होकर यह दुनिया भर में पहुंचता है। इसकी तस्करी में तालिबान, अल कायदा समेत कई आतंकी संगठन शामिल हैं जिनकी आर्थिक संपन्नता का यह प्रमुख ज़रिया है। हमारे देश के भी कई हिस्सों, विशेषकर हिमालय क्षेत्र में भी चोरी-छिपे इसकी खेती होती है। दुनिया भर में गांजे का अरबों डॉलर का विशाल कारोबार है। इसकी व्यापकता को देखते हुए दुनिया के कई देशों में यह मांग उठ रही है कि गांजे के पौधों से बने दूसरे ड्रग्स पर प्रतिबंध रहे लेकिन कच्चे गांजे को प्रतिबंध से मुक्त किया जाय। गांजे के समर्थन में कई तर्क दिए जाते रहे हैं। मसलन कैंसर की रोकथाम और इलाज में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। दमा, पुराने दर्द, ग्लूकोमा जैसी बीमारियों की यह कारगर औषधि है। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा कराए गए शोध के अनुसार गांजे की कैंसर जैसे कुछ रोगों की चिकित्सा में भूमिका तो है, मगर चिकित्सीय देखरेख में ही इसका इस्तेमाल किया जा सकता है। 

हमारे देश में हज़ारों साल से गांजे के उपभोग पर कभी कोई रोक-टोक नहीं रही थी। राजीव गांधी की सरकार द्वारा पहली बार वर्ष 1985 में इसे प्रतिबंधित ड्रग्स की सूची में शामिल किया गया। भारत में साधु-सन्यासियों के बीच गांजा सबसे लोकप्रिय और सर्वमान्य नशा है। इसे सदियों से सामाजिक स्वीकृति भी हासिल रही है। अथर्ववेद में गांजे के पौधे की गिनती पांच महानतम पौधों में की गई है। गांजे का प्राचीन नाम ज्ञानदा बताया जाता है जो कालांतर में बिगड़कर गांजा हो गया। साधु-संतों का मानना है कि गांजे की चिलम फूंकने से दुनिया की व्यर्थ की बातों से ध्यान हट जाता है। इससे मानसिक शांति और एकाग्रता में वृद्धि होने के कारण कारण ध्यान और समाधि आसानी से लग जाती है। गांजे के पक्ष में अपना मत मजबूत करने के लिए कुछ सन्यासियों ने भगवान शिव तक के हाथों में गांजे की चिलम पकड़ा दी। भगवान शिव की गांजा फूंकती आपत्तिजनक तस्वीरें बाजार में और सोशल मीडिया में भी उपलब्ध हैं जिनका चौतरफ़ा विरोध हो रहा है।

देखा जाय तो कुछ औषधीय उपयोगों के सिवा गांजे के समर्थन में दिए जानेवाले तमाम तर्क अवैज्ञानिक और मनगढ़ंत हैं। सच यह है कि गांजा स्नायुवों को कुछ घंटों के लिए शिथिल भर कर देता है। मष्तिष्क के शिथिल होने से ध्यान या समाधि लगने और इस दुनिया के पार एक दूसरा संसार देख पाने का भ्रम पैदा होता है। यह एक तरह का केमिकल लोचा है जो मतिभ्रम पैदा करता है। लगातार इसका धुआं पीने वाले लोगों में उस काल्पनिक संसार में डूबे रहने की इच्छा तीव्र से तीव्रतर होती चली जाती है। ऐसे लोग वास्तविक दुनिया के प्रति आकर्षण खोकर धीरे-धीरे आत्मकेंद्रित और अकेला होते चले जाते हैं। कम उम्र और अपरिपक्व मष्तिष्क वाले किशोरों के दिमाग को गांजा अपाहिज और कुंद भी कर दे सकता है। सांस के रोगियों और गर्भवती महिलाओं पर इसका असर घातक होता है।

साधु-सन्यासियों से चलकर गांजा अब सिनेमा, फैशन और ग्लैमर इंडस्ट्री तक पहुंच गया है। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्युरो द्वारा बॉलीवुड में चलाए गए अभियान से यह सामने आया है कि फिल्म और ग्लैमर इंडस्ट्री बुरी तरह से नशे की गिरफ्त में है। ग्रामीण क्षेत्र के युवाओं में परंपरागत रूप से इसका चलन रहा है। अब शहरी युवाओं में भी इसका आकर्षण बढ़ा है। देश के उच्च शिक्षा संस्थानों और छात्रावासों तक इसकी पहुंच गंभीर चिंता का विषय है। शहरों में इसके इस्तेमाल के तरीके भी बदले हैं। लोगों की नज़रों से बचने के लिये गांजे की सूखी पत्तियों को चिलम में सुलगा कर दम मारने की जगह अब सिगरेट के पेपर में लपेटकर कश लिया जाता है। जलाने का साधन न मिलने पर लोग इसे चुटकियों में रगड़ कर कभी सीधे भी फांक लेते हैं। पिछले कुछ दशकों में गांजे और उससे बने मादक पदार्थों का इस स्तर पर बढ़ते उपयोग को देखते हुए लगता है कि आने वाले वर्षों में देश की युवा पीढ़ी का एक बड़ा हिस्सा ड्रग्स की गिरफ्त में होगा। 

गांजे और उससे जुड़े मादक पदार्थों के देश में प्रसार को देखते हुए यह असंभव लगता है कि नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो या पुलिस जैसी एजेंसियां अपने दम पर इनपर कारगर नियंत्रण पा सकेंगी। दिखावे के लिए वे इधर-उधर से कुछ लोगों को पकड़ भी लें तो गांजाखोरों की सबसे बड़ी जमात साधु-संन्यासियों पर हाथ डालने की हिम्मत वे कहां से जुटा पाएंगी ? इसे रोकने के लिए सरकार और स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा बड़े स्तर पर जन जागरूकता अभियान चलाने की ज़रुरत है। इसके साथ इसकी उपलब्धता के तमाम स्रोतों को भी काटना होगा। यह देखना होगा कि सख्त प्रतिबंध के बावजूद देश में इस बड़े पैमाने पर गांजा उपजता और आता कहां से है ? अपने देश में गांजे की खेती पर कारगर रोक लगाने के अलावा विदेशों से इसकी तस्करी के सभी रास्ते बंद करने होंगे। अभी पंजाब और कश्मीर ड्रग्स की तस्करी के सबसे बड़े मार्ग बन चुके हैं। बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकार के पास इस लक्ष्य को हासिल करा सकने वाली राजनीतिक इच्छाशक्ति और सक्षम, ईमानदार तंत्र मौज़ूद है भी

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