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फूँ फाँ करने वाले को फूफा कहते हैं

Bhola Tiwari Sep 15, 2021, 8:11 AM IST कॉलमलिस्ट
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एसडी ओझा

नई दिल्ली : मुझे समझ नहीं आता कि जब चाचा का स्त्रीलिंग चाची , मामा का मामी , जीजा का जीजी , भाई का भाभी होता है तो फूफा का स्त्रीलिंग बुआ क्यों हो जाता है ? पूर्वांचल में फूफा का स्त्रीलिंग फुआ होता है । उर्दू में भी फूफी होता है , पर हिंदी में बुआ क्यों ? गहन अध्ययन करने पर पता चला कि रिटायर्ड जीजा हीं फूफा होता है । रिटायर्ड होने के बाद भी उसकी अकड़ जीजाओं वाली होती है । रस्सी जल जाती है , पर ऐंठन नहीं जाती है । इसलिए रिटायर्ड जीजा ससुराल में जाकर फूँ फाँ करता रहता है । अपनी हेकड़ी दिखाता रहता है । इसलिए उस रिटायर्ड जीजा को फूफा कहते हैं । चूँकि फूफा की पत्नी अपने मायके(जो कभी उसका घर रहा होता है ) के प्रति समर्पित होती है , इसलिए वह बुआ कहलाती है । पूर्वांचल और उर्दू वालों को भी इस बात पर गौर करनी चाहिए ।

बुआ को संस्कृत में पितृस्वसा कहते हैं । पितृस्वसा का मतलब पिता की बहन होता है । बुआ हमेशा अपने भतीजे के पिता की बहन बनी रहती है । इसलिए वह जायदाद में हिस्सा नहीं लेती । उसे डर रहता है कि हिस्सा लेने पर उसका मायका मायका नहीं रह जाएगा । वह अपने भाई का पट्टीदार कहलाने लगेगी । अब सरकार जबरदस्ती दिला रही है तो लेना पड़ रहा है । वैसी बहुत सी पितृस्वसा अब भी अपना हिस्सा नहीं ले रही हैं । उनमें कोई फूँ फाँ नहीं आई है । इसलिए ” बुआ को बुआ हीं रहने दिया जाय , कोई और नाम न दिया जाए ” ।

फूफा लोगों की असलियत तो अकबर महान को भी पता चल गयी थी । उसका बहनोई फूफा बनकर उसके बेटे जहाँगीर का हक मारने पर तुला हुआ था । उसने विद्रोह कर दिया था । समय रहते अकबर ने उस विद्रोह को कुचल दिया । तब से मुगलिया सल्तनत ने एक दम से फूफा बनाना हीं छोड़ दिया था । मुगल शाहजादियों की शादी पर बैन लगा दिया गया । न रहेंगे फूफा न होगा कोई शिगूफा । लेकिन इस प्रकरण में मारी गयीं बेचारी शाहजादियाँ । खेत खाए गदहा , मारा जाए जोलहा । फूफा की आमद बंद हो गयी । शाहजादियों के बुरे दिन आ गये ।

जब तक जीजा जीजा रहते हैं , उनकी ससुराल में खूब आवभगत होती है । फूफा बनते हीं आवभगत में कमी होने लगती है । दामाद की पौ बारह रहती है । फूफा की कोई कद्र नहीं रहती । रहती भी है तो दामाद के मुकाबले बहुत कम । फूफा भी जीजा थे – इस बात को फूफा भूल नहीं पाते । इसलिए फूफा अपने अस्तित्व के लिए लड़ते हैं । बिना बात के हर चीज में टाँग अड़ाते हैं । शादी ब्याह में अपनी अहमियत दिखाने के लिए रुसा फूली करते हैं । मनाने वाले मनाते हैं । फूफा के अहम को संतुष्टि मिलती है। जब आपको कोई खिजाब लगाया हुआ प्रौढ़ खिसिआया हुआ नजर आए और उसके आस पास दो चार लोग मनाते हुए खड़े हों तो शर्तिया वह शख्स फूफा होगा।

एक फूफा एक शादी में ऐसे हीं खिसिआए हुए थे। कितना भी मनाया जाय वे मानते हीं नहीं थे। वे खाना नहीं खा रहे थे। शायद उनके मान सम्मान में कोई कमी हो गयी हो। फूफा अड़े थे। अड़े रह गये। बारात ने खाना शुरू कर दिया। तब फूफा की चैतन्यता जागृत हुई। उन्होंने कहा था –

” मैं इसलिए खा रहा हूँ कि कहीं लोग मुझे शादी में विघ्न डालनेवाला न कह दें । बाद बाकी जो मेरा अपमान हुआ है , वह तो मेरे दिल में ताजिंदगी रहेगा ।”

फूफाजी ने खाना खाया । उनकी इज्जत बच गयी । बर्ना उन्हें रात को भूखे सोना पड़ता । वैसै फूफा के विघ्न डालने से शादियाँ रुकतीं तो देश के प्रायः सभी जवान कुँआरे हीं मरते ।

दरअसल जब जीजा रिटायर्ड होता है तो फूफा बन जाता है । फूफा के साथ जीजा वाला बरताव नहीं होता । फूफा को अपने जीजा वाला रुतबा भूले नहीं भूलता । उसे अपने को फूफा समझने में समय लगता है। लेकिन समय इंतजार नहीं करता । वह अबाध गति से आगे बढ़ता रहता है । फूफा समय की नाड़ी को टटोल नहीं पाते। समय से पंगा लेने के कारण उन्हें मुंहकी खानी पड़ती है। मुंहकी खानी पड़ती है एक अदने से लौण्डे से जो जीजा बनकर उनकी कुर्सी पर विराजमान हो जाता है । आश्चर्य है ! यह जीजा भी उसी दिन से फूफा बनने की कतार में खड़ा हो जाता है ।

फूफा बनना आसान नहीं है । इसके लिए काफी श्रम करना पड़ता है । सबसे श्रमसाध्य काम है पढ़ाई । उसे पढ़नी होती है । बालिग होना पड़ता है । नौकरी ढूँढनी होती है । अपने पैरों पर खड़ा होना पड़ता है । फिर शादी करनी होती है । इतने माध्यमों से गुजरने के बाद फूफा बनते हैं । बुआ तो बगैर पढ़ाई , बगैर नौकरी और बगैर शादी किए हीं बचपन में हीं बन जाते हैं । इसलिए फूफा लोगों में इतना एटीट्यूड होता है । फूँ फाँ ज्यादा होता है ।

फूफा का शादी में रुठना हमारी संस्कृति का हिस्सा है । वो

शादी हीं क्या जिसमें फूफा न रुठे । फूफा के रुठते हीं पूरी पंगत हीं खामोश बैठ जाती थी । मजाल है कि कोई एक ग्रास भी खा ले । बड़ी मान मनौवल के बाद फूफाजी मानते थे । तब जाकर पूरी पंगत खाती थी । अब तो बूफे सिस्टम का जमाना है । लड़की का बाप अपने समधी से खाने का अनुरोध करता है , समधी अनुरोध स्वीकार करते हैं । फिर तो लोग खाने पर ऐसै टूट पड़ते हैं कि मानों महीनों से भूखे हों । जैसे अन्न का एक दाना भी न मिला हो । ऐसे में फूफा बेचारे को पूछने की किसे फुर्सत है ?

बूफे सिस्टम के दौर में एक फूफा रुठने की जुर्रत कर बैठे । वे किसी बात से आहत थे। लोग खा रहे थे । वे चुप बैठे थे । कोई उनको पूछ नहीं रहा है । भारतीय संस्कृति की यह बेकद्री मुझसे देखी नहीं गयी । मैं लड़की के पिता के पास गया । उनसे कहा ” सब कुछ अच्छा चल रहा है । आपने बढ़िया इंतजाम कर रखा है । पर एक रश्म छुट रही है । बारात में खाने से पहले फूफा को रुठना होता है और लड़की के बाप को मनाना होता है । देखिए , वो देखिए । फूफा रुठकर बैठ गये हैं । उन्हें मनाकर खाना खिलाइए ।”

रश्म के नाम पर लड़की के बाप उद्दत हुए । फूफा का मनुहार करने लगे । फूफा तो इसी ताक में थे । उन्हें भी अपनी इज्जत बचानी थी । तुरंत मान गये । उनके लिए अलग से मेज लाई गयी । परोसने वाले बुलाए गये । खाना ले आऊट हुआ । फूफा ने खाना खाया और इस तरह से भारतीय संस्कृति की लाज बच गयी ।

मेरी सब फूफाओं से अनुरोध हैं कि वे 21 वीं सदी में रह रहे हैं । वे अब रुसने फूलने का चक्कर छोड़ें । जब भी ससुराल जाएँ अपनी फूँ फाँ अपने घर पर हीं छोड़कर आएँ । अब कोई मनाने वाला नहीं आएगा। जमाना बूफे सिस्टम का आ गया है ।

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