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भारत में मिडिल क्लास का चक्कर क्या है

Bhola Tiwari Jul 12, 2019, 8:01 AM IST टॉप न्यूज़
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प्रवीण झा


जाने-माने चिकित्सक नार्वे

‘मिडल क्लास’ वाली बात अधूरी रह गई थी। दरअसल ‘द इकॉनॉमिस्ट’ ने भारत के ‘मिडल क्लास’ के घटने पर चिंता जताई, और नीति आयोग वालों ने बोला कि स्थिति तनावपूर्ण लेकिन नियंत्रण में है। सच क्या है?

ईकॉनॉमिस्ट कहता है कि जिसका भी वेतन टैक्स काटकर, दस हजार महीना से ऊपर है, उसको धकिया कर ‘मिडल क्लास’ में डाल सकते हैं। बीस हजार से ऊपर में पक्का है। आई-फ़ोन हो तो ‘मिडल-क्लास’ बर्थ मिलना सुलभ है। गाड़ी भी अपनी हो ही। बाकी, कर्ज वगैरा खास न हो। बच्चे बढ़िया स्कूल जाते हों। साल में एक छुट्टी भी मनाते हों। मतलब ‘मिडल-क्लास’ बनते-बनते कंगाल हो जाओ, और वापस गरीबी रेखा के आस-पास लटकते रहो? 

नीति आयोग ने जवाब दिया है कि हम अभी चीन से पंद्रह साल पीछे चल रहे हैं। इसलिए पांचे हजार से ‘मिडल-क्लास’ में इंट्री मिल जाएगी। आई-फ़ोन जरूरी नहीं, उनके अनुसार ओप्पो, लावा इत्यादि फ़ोन भी चलेगा। बच्चा साधारण स्कूल में हो, और छुट्टी हल्की-फुल्की हो, तो भी ‘मिडल-क्लास’ ही हुआ।

नीति आयोग भी खींच-खांच कर कहता है कि भारत में दस प्रतिशत से अधिक मध्य-वर्ग नहीं। अपर मिडल दो प्रतिशत। लोअर मिडल आठ प्रतिशत। उनका कहना है कि प्रतिशत बढ़ रहा है। 

पर सच यह है कि सौ साल (92 साल) में भारत इतना विषम कभी नहीं हुआ कि ‘मिडल-क्लास’ ही खत्म होने के कगार पर आ जाए। इसमें अच्छी बात यह है कि मध्य-वर्गीय मानसिकता भी शायद खत्म हो जाए, जब सब एक साथ निचले बर्थ पर होंगें। 

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