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क्या पकिस्तान एक और विभाजन की तरफ बढ़ रहा है !!

Bhola Tiwari Jul 12, 2019, 5:23 AM IST टॉप न्यूज़
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 नीरज कृष्ण


पाकिस्तान अपनी छवि को सुधारने के लिए भारत को विश्व-मंच पर लगातार गलत साबित करने का प्रयास कर रहा है। लेकिन, पाकिस्तान का नेतृत्व और सेना शायद यह समझने को तैयार नहीं है कि किसी को गलत साबित करके खुद को अच्छा साबित नहीं किया जा सकता है। खुद को 'सज्जन' स्थापित करने के लिए तो 'सज्जनता' का व्यवहार करना पड़ता है। सज्जन होने के लिए अच्छा आचरण जरूरी है। पाकिस्तान के सामने सज्जनता और सद्आचरण प्रकट करने के अनेक अवसर भारत उपलब्ध कराता है लेकिन उन सब मौकों पर वह अपना वास्तविक रंग ही दिखाता है।

पूर्व प्रधानमंत्री अटलजी स्वयं कहा है कि “हम अपने पड़ोसी नहीं बदल सकते।” यानि संवाद ही एक रास्ता है, क्योंकि रास्ता बातचीत से ही निकलेगा। पाकिस्तान और भारत के बीच अविश्वास के लंबे घने अंघेरों के बावजूद अगर शांति एक बहुत दूर लगती हुई संभावना भी है, तो भी हमें उसी ओर चलना है। सीमा पर अपने सम्मान के लिए डटे रहना, हमलों का पुरजोर जवाब देना किंतु बातचीत बंद न करना, भारत के पास यही संभव और सम्मानजनक विकल्प हैं।

हममे से ज्यादातर लोग 1971 के भारत- पकिस्तान युद्ध को पुराने पत्र-पत्रिकाओं और किस्से-कहानिओं के माध्यम पढ़ा है और समझा है पर कभी भी आज का युवा वर्ग और प्रोढ समाज (जो भारत- पाक युद्ध के समय बच्चे थे या उतनी राजनीतिक समझ नहीं विकसित हुई थी) कभी भी 1971 के युद्ध के पूर्व की विदेश नीति एवं राजनयीक परिस्थितिओं एवं समीकरण को समझने के लिए इतिहास के पन्नों को पलटने की चेष्टा भी नहीं की है। 

प्रधानमंत्री मोदी के अनवरत विदेश दौरे एवं उनकी विदेश नीति ने आज पकिस्तान को कब विश्व के मंच पर अलग-थलग कर दिया इसका अंदाज पकिस्तान को भी उस वक्त अंदाज हुआ होगा जब तुर्की जैसा परंपरागत इस्लामिक देश पाकिस्तान का दामन छोड कर भारत की तरफ मित्रता का हाँथ बढ़ा रहा है।   

1971 के युद्ध के एक डेढ़ वर्ष पूर्व से ही तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी ने ही इसकी पृष्ठभूमि तैयार करना शुरू कर दिया था। इंदिरा गाँधी सबसे पहले रूस जाकर वहाँ के राजनीतिज्ञों से मिली और उससे मदद का वादा लिया। उसके बाद वह अमेरिका जा कर निक्सन से मिली। इंदिरा गाँधी ने उस वक्त भी पकिस्तान को विश्व के रंगमंच पर अलग थलग कर दिया था। 

किसी भी युद्ध के पूर्व उसकी समग्र तैयारी करनी होती है एवं सभी राष्ट्रों के समक्ष अपनी नीति को स्पष्ट करते हुए उन्हें अपने पक्ष में करना पड़ता है। उसी रास्ते का अनुशरण करते हुए नरेंद्र मोदी ने अपनी कुटिल विदेश नीति के तहत पकिस्तान के सभी अच्छे मित्र राष्ट्रों को तोड़ अपने साथ बहुत ही मधुर संबंध बना लिए हैं। अफगानिस्तान को उन्होंने पहले ही अपना मुरीद बना लिया है, बंगला देश भी अब पकिस्तान के खिलाफ हो चूका है अमेरिका और जापान के साथ सैन्य सहयोग से हर वर्ष युद्धाभ्याश कर रहे है और उधर पकिस्तान की स्थिति बिलकुल ही विश्व मंच पर बिल्कुल ही अलग थलग वाली स्थिति उत्पन्न हो गयी है। यह प्रधान मंत्री मोदी की कुशल विदेश नीति का ही कमाल है कि भारत का पहला प्रधानमंत्री इजराईल जाता है और किसी भी इस्लामिक देश से उसके खिलाफ एक भी आवाज नहीं उठती है जबकि इजराईल का संबंध किसी भी मुस्लिम देश के साथ बिल्कुल ही अच्छा नहीं है। 

हालाकि चीन प्रत्यक्ष रूप से पकिस्तान को सहयोग देने की बात कर उकसाता रहता है परन्तु हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि चीन मूलतः एक व्यापारिक देश है और वह भारत के खिलाफ जाकर कभी भी अपना निकटतम और सबसे बड़ा बाजार नहीं खोना चाहेगा। चीन का भारत से 2000 साल पुराना व्यापारिक रिश्ता है। 1 जुलाई 2017 को मोदी सरकार ने अपने नए “वस्तु एवं सेवा कर”(GST) को देश में कानून बना लागु कर विदेशी निवेशकों(बाजार) के लिए भारत में रास्ता साफ़ कर दिया है। इस लेख में मैं GST को एक कूटनीतिक दाँव के रूप में भी देख पा रहा हूँ।

इसका मूल कारण यह है कि पाकिस्तान की कोई ठोस विदेश नीति ही नहीं है जबकि भारत एक निश्चित विदेश नीति के तहत काम कर रहा है। दोनों ही मुल्क के प्रधान मंत्री अपने देश से ज्यादा विदेशी दौरे पर रहते हैं परन्तु दोनों देश के प्रधान मंत्री में एक मूल अंतर यह है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री जब भी विदेशी मुल्क के दौरे पर होते हैं तब वे सिर्फ अपने को पाक साफ़ दिखाने की चेष्टा में रहते हैं और अपनी खामिओं पर पर्दा डालने का काम करते हैं और अपने व्यापारिक लाभ की ही सिर्फ बात सोचते हैं जबकि नरेंद्र मोदी जब भी बाहर निकलते हैं तो वह पकिस्तान को घेरने निकलते हैं और नरेन्द्र मोदी इसमें बिल्कुल सफल भी हो गए हैं लगभग। 

पाकिस्तान से संबंध सुधारने की दिशा में प्रयास करते हुए पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक सब धोखा खा चुके हैं। बार-बार पाकिस्तान से छले जाने पर भी भारत ने अपने प्रयासों में कमी नहीं की है। अब भी भारत चाहता है कि कैसे भी संबंध दोस्तानां हो जाएं। कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दल और विचारकों 'पाक पर मोदी नीति' का उपहास उड़ा रहे हैं। इसके बावजूद भारत-पाक संबंधों में चासनी घोलने के लिए वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी परम्परागत नीति पर ही आगे बढ़ रहे हैं। यह जरूरी भी है। 

भारत सरकार के इन तमाम प्रयासों के वावजूद पाकिस्तान हुक्मरान को हमारी सहनशीलता और विनम्रता हमारी कमजोरी नजर आ रही है। पाकिस्तान के इस मिथ्या भ्रम का कारण भी उचित है। समय-समय पर हमारे देश के कुछ खास राजनीतिक दल(कांग्रेस) के शीर्ष राजनीतिज्ञ पाकिस्तान में जाकर देश के वर्तमान सरकार को सता से हटाने में उनकी सहयोग मांगते हैं। इतिहास साक्षी है कि लंकाधिपति रावण अपने अक्षमता के कारण नहीं बल्कि विभीषण के छल से हारा था।      

पिछले दिनों तथाकथित पाकिस्तान समर्थित चरमपंथियों द्वारा भारतीय पारा मिलिट्री(CRPF) के लगभग 50 जवान एवं अधिकारीयों की एक निश्चित योजनाबद्ध तरीके से जिस प्रकार हत्या की है, उससे यह प्रतीत होता है कि गद्दार देश के बहार नहीं भीतर भी अपनी पैठ जमा चुके हैं। आये दिन परमाणु शोध संस्थानों, सेना के तीनों अंग सहित पारा मिलिट्री के जवानों का पाकिस्तान के लिए जासूसी करते हुए पकडे जाना इस बात की पुष्टि करती है कि हमें सचेत अपने घर में ही होने की आवश्यकता ज्यादा है अब।    

पाकिस्तान से होने वाली घुसपैठ और गोलाबारी का माकूल जवाब देना अब भारत ने भी शुरू कर दिया है। पिछले दिनों भारतीय सेना के सर्जिकल स्ट्राइक ने इस बात के संकेत भी दिए थे कि अब बहुत कुछ बदल गया है। हम थोड़े से खुल गए हैं। दुश्मन की ईंट का जवाब पत्थर से दे पा रहे हैं। लेकिन, बात वही है कि भारतीय मानस शांति और सह-अस्तित्व के साथ जीना पसंद करता है। इसलिए सेना का मानस भी वैसा ही है। भारतीय सेना मानवीय संवेदनाओं से भरी है। सैनिकों के 'सिर काटने' जैसी नृशंस हरकत कभी भी भारतीय सेना ने नहीं की। कारगिल युद्ध के बाद पाकिस्तान अपने सैनिकों के शव लेने को भी तैयार नहीं था तब भी भारतीय सेना ने उनका विधिवत अंतिम संस्कार किया। भारतीय सेना ने कभी भी पाकिस्तान के आम लोगों पर फायरिंग की हो, ऐसी भी कोई घटना याद नहीं आती है।

पारा-मिलिट्री फ़ोर्स पर हुए अप्रत्याशित हमले में हुए जान–माल की नुक्सान से भारतीय मानस सिर्फ युद्ध को ही एकमात्र उपाय मान रही है, पर सरकार को धैर्य पूर्वक सामरिक युद्ध के विकल्प को दरकिनार करते हुए कुछ खास रणनीति के तहत पाकिस्तान को आर्थिक रूप से इतना विपन्न कर देना चाहिए कि उसकी आर्थिक अर्थ-व्यवस्था चरमरा जाए, उन तमाम स्त्रोतों को अवरुद्ध कर देना चाहिए जिससे उसकी कृषि, नगर व्यवस्था ध्वस्त हो जाये.....और वह भारत की तरफ से नजर हटा कर अपने आन्तरिक कलह एवं परेशानियों में बुरी तरह उलझ जाये।

हालाकि चीन प्रत्यक्ष रूप से पकिस्तान को सहयोग देने की बात कर उकसाता रहता है परन्तु हमें यह ध्यान रखना चाहिए पकिस्तान में ‘जय हिन्द...जय सिंध’ के नारे लगने प्रारंभ हो गए हैं, ऐसी परिस्थिति में पाकिस्तान अपने लिए विश्व समुदाय से सहानुभूति बटोरने के लिए भारत के तरफ से युद्द के लिए प्रतीक्षारत है, ताकि वह युद्ध के नाम पर पुरे विश्व समुदाय से आर्थिक एवं सामरिक सहयोग मांग सके। पकिस्तान लगातार भरता को उकसाने की चेष्टा कर रहा है कि वह पहले आक्रमण करे। क्यूंकि पाकिस्तान अब खुद अपनी आतंरिक परेशानियों से अच्छी तरह वाकिफ है कि पकिस्तान में पुनः एक नए विभाजन की पृष्ठभूमि तैयार हो रही है........बस जरुरत है इंदिरा गाँधी जैसी चतुर और कुटनीतिक चाल चलने की। ............और वर्तमान पाकिस्तान के तीन टुकड़े हो जायेंगें।

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