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पूरा मामला मार्केट वैल्यू का है

Bhola Tiwari Jul 12, 2019, 5:03 AM IST टॉप न्यूज़
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दिनेश त्रिनेत

जब मैं अपने शहर गोरखपुर जाता हूँ तो ऐसा लगता है कि यहां की पूरी अर्थव्यवस्था शादियों पर टिकी है। परिवार में पैदा होने वाला बेटा ही इस अर्थव्यवस्था की केंद्रीय धुरी होता है।  और यह शायद किसी एक शहर की बात नहीं है। उत्तर भारत के अधिकांश शहरों यहां तक कि दिल्ली का भी यही हाल होगा। 

पर मैं तो अपने शहर गोरखपुर की बात करता हूँ। 

लगन के दिनों में लोगों से मिलिए तो वे शादियों से आ रहे होते हैं और किसी अन्य शादी में जाने वाले होते हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय लोग तो बाकायदा डायरी मेंटेन करते हैं। कुछ लोग सिर्फ इसीलिए जाने जाते हैं कि वे चाहे कुछ भी हो जाए मगर शादी में सही टाइम पर जरूर पहुंचते हैं। नेता, नगर विधायक, मेयर, सभासद, दारोगा जी... इनको भी तमाम जरूरी काम छोड़कर शादी में जरूर जाना होता है। कुछ महिलाएँ और पुरुष तो ऐसे होते हैं कि जैसे वे पैदा ही इसलिए हुए हैं कि शादियों में जा सकें। 

यहां की मेन मार्केट गोलघर में साड़ियों के भव्य शो-रूम हैं और ये इसीलिए सिर्फ चलते हैं क्योंकि दुल्हन से लेकर रिश्तेदारों तक को उपहार में दी जाने वाली खरीदारी यहीं से होनी है। जो मेहमान जाएँगे उनके परिवार की स्त्रियों को भी साड़ियां चाहिए। यही हाल ज्वेलर्स का है। इस शहर में हर एक किलोमीटर पर एक बारातघर तो मिल ही जाएगा। बड़े होटलों से लेकर रिहाइशी कालोनियों में बने बारातघरों तक का कारोबार शादियों से ही चलना है। 

टैक्सी वाले हमेशा शादियों के लिए बुक रहते हैं। दूल्हे को चढ़ने के लिए स्विफ्ट डिज़ायर सबकी फेवरेट है। वैसे दूल्हा अलग-अलग कारों में अपनी हैसियत और शौक के हिसाब से बैठता है। लोकल शो-रूम से वही कारें ज्यादा बिकती हैं जिन्हें दहेज में दिया जाता है। स्विफ्ट और हुंडई की ग्रैंड आइ-10 जैसी कारों को दहेज के लिए अच्छा माना जाता है। लड़का भी खुश, लड़की के पिता भी खुश। आल्टो लेने वाला लड़का हैवी डिस्काउंट वाला माना जाता है। माना जाता है कि या तो वो बिक नहीं रहा था या फिर प्रोडक्ट में ही कोई डिफेक्ट है। 

शादियों में जाने के बाद लोग भविष्य में होने वाली शादियों के गणित में उलझे रहते हैं। पचास पार के प्रौढ़ एक जगह बैठकर विवाह चर्चा करते ही नजर आते हैं। जिस तरह कारपोरेट और मीडिया में सारा खेल वैल्यू प्रपोजिशन का है, उसी तरीके से लड़कों की भी वैल्यू बढ़ाने के लिए उनकी ब्रैंडिंग करनी पड़ती है। यदि लड़का मल्टीनेशनल कंपनी में इंजीनियर या सरकारी नौकरी में है तो उसकी कीमत अपने-आप तय हो जाती है। कई बार तो उम्मीद से ज्यादा रेट लग जाते हैं। अगर कोई छोटी मोटी नौकरी कर रहा है तो वैल्यू बढ़ाने के लिए कुछ और उपाय करने पड़ते हैं। 

इसमें लड़के के भाई, चाचा, मौसियां और बूआ से काफी मदद मिलती है। जैसे, लड़के का भाई डिग्री कालेज में प्रोफेसर है। उसकी बूआ बाबा बटेसर नाथ इंटर कालेज, खोखरहवां की प्रिंसिपल है। चाचा दुबई में रहते हैं। इस तरह से लड़के की मार्केट वैल्यू बढ़ाने का प्रयास किया जाता है। 

बदलते जमाने के साथ लड़कियों की मार्केट वैल्यू भी बढ़ाने की कोशिश होने लगी है। "अरे लड़किया पूना में है... आईटी कंपनी में... 60 हजार महीना कमाती भी है।" इसके तुरंत बाद एक डिस्क्लेमर जोड़ना पड़ता है, "लेकिन संस्कार बहुत अच्छे हैं और बड़ों की इज्जत करती है..."। इससे लड़के की कीमत तो कम नहीं होती मगर उसके बढ़ते प्राइस इंडैक्स को रोकने में मदद मिलती है।   

लड़के के पैदा होते ही पिता की आंखों में चमक आ जाती है। मां के अरमान, जो शादी के दो साल बाद शीत निद्रा में पहुंच चुके थे, जाग उठते हैं। लड़के को पढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाती। इसलिए नहीं कि वह बहुत काबिल बन जाए बल्कि इसलिए कि मार्केट उसके सही रेट लग सकें। इसके लिए कई बार मैनेजमेंट कोटा के जरिए बेटे पर अतिरिक्त इन्वेस्टमेंट करना पड़ता है। इसमें प्रॉफिट का रेशियो घट जाता है मगर कुल मिलाकर घाटे का सौदा नहीं होता। इनके साथ मामला फल और सब्जियों जैसा होता है। सही समय पर बिक गए तो चोखा दाम, देर हुई तो कीमत गिरने लगती है और ज्यादा देर हो गई तो जैसे फल और सब्जियां सड़ने लगती हैं, वैसे ही इनको भी कोई नहीं पूछता। इससे पहले कि लड़का नौकरी के लिए धक्के खाए और उसकी मार्केट वैल्यू गिरने लगे, कोशिश होती है कि नोएडा या चेन्नई के महंगे कालेज या इंस्टीट्यूट के एसोसिएशन को दिखाकर बढ़ाई गई उसकी मार्केट वैल्यू को कैश कर लिया जाए और झटपट शादी कर दी जाए। 

अच्छी मार्केट वैल्यू वाले बेटे के माता-पिता अलग ही नजर आते हैं। वहीं जिन लड़कों की मार्केट वैल्यू कम होती है वे थोड़े दीन-हीन से दिखते हैं। अब अगर लड़का बिल्कुल नालायक निकल जाए तो भी कोई दिक्कत नहीं। बाजार में डुप्लीकेट नाइकी के जूते और डुप्लीकेट लीवाइस की जींस भी तो बिकती है। उसके भी खरीददार होते हैं। यदि लड़का कुछ नहीं करता तो तय मानिये कि या तो वो ठेकेदारी करता है या फिर उसके दुबई वाले चाचा उसे जल्दी ही बुलाने वाले होते हैं और छह महीने बाद उसे डेढ़ से दो लाख की नौकरी मिलने वाली होती है। शादी करीब आती है तो बेटे की आवारागर्दी को भी प्रॉफिट मेकिंग बना दिया जाता है। पिता लड़कीवालों के सामने बड़े गर्व से कहते हैं, "दिन भर भागता रहता है, फुरसत से बैठता ही नहीं..."

एक और डील चलती है। लड़के की छोटी बहन की शादी का खर्च कहां से आएगा? वो आएगा लड़के के दहेज से। यदि बहन की शादी हो गई है तो उसमें हुए खर्च की भरपाई की जाएगी। प्राइस का टैग लगाने में इससे भी काफी मदद मिलती है। मार्केट में पोजिशनिंग की धौंस दिखाकर भी कीमत तय की जाती है। यानी प्रोडक्ट हल्का है तो क्या हुआ, कंपनी बहुत बड़ी है। "देखिए, इतना बड़ा परिवार है। इतनी प्रतिष्ठिता इस इलाके में..." । देखते-देखते रेट बढ़ जाते हैं। कुछ लोग सिर्फ प्रोडक्शन की कॉस्ट निकालते हैं। कहते हैं कि जितनी मेरे बेटे की लागत है बस उतना ही दे दो.. यानी पढ़ाई पर हुआ खर्च, खिलाने-पिलाने पर हुआ खर्च, पैदा करने की प्रक्रिया के दौरान हुआ खर्च आदि। 

कई जगह डिस्काउंट सिस्टम भी चलता है। 20 से 30 प्रतिशत तक डिस्काउंट आसानी से मिल जाते हैं। "देखिए, फलां जी के साथ इतने में सौदा तय हो गया था, मगर अब आपकी बात हम टाल नहीें सकते..." बहुत बार मार्केट से प्रोडक्ट की शॉर्टेज दिखाकर भी कीमत बढ़ाई जाती है। "देखिए, रिश्ते तो बहुत आ रहे हैं। मेरी मिसेज जी तो परेशान हो गई हैं। कहती हैं जल्दी से कहीं तय कर दो। तो बस हमें हर हाल में नवंबर में डेट फाइनल कर देनी है।" कुछ मामलों में बेटे को ऐपल के फोन या बोस के स्पीकर की तरह इतना महंगा बताया जाता है कि खरीदने वाले की हिम्मत छूट जाए। इस स्ट्रेटजी से भी अच्छे दाम लगते हैं। 

कई बार तो लड़की के पिता को साफ-साफ दिख रहा होता है कि लड़का गधा है और उसका भविष्य में कुछ नहीं हो सकता मगर सब जानते-बूझते भी वह सारे झूठ को सही मानने का नाटक करता रहता है, क्योंकि उसे भी लगता है कि फाइनली यह सौदा पट जाएगा और इससे कम में बाजार में कोई मिलने से रहा। अपनी बेटी चाहे कितनी भी प्यारी हो मगर पिता की आर्थिक हैसियत ही बेटी का भविष्य तय करती है। 

शादियों में होने वाले लेनदेने के आधार पर एक इंटर्नल रेटिंग सिस्टम तैयार किया जाता है। उसके आधार पर ही रिश्तेदारों की रेटिंग होती है। इसी रेटिंग के आधार पर भविष्य में उनसे संबंधों का निर्वहन किया जाता है। 

आम तौर पर लड़के के पिता का काम होता है एक घर बनाना और लड़कों का काम होता है शादी करके उस घर को सामान से भरना। जैसे ड्राइंग रूम की खाली दीवार को 40 इंच के फुल एचडी टीवी से सजाना, तखत की जगह डबल बेड लाना, प्लास्टिक की कुर्सियों की जगह सोफे लाना आदि आदि। 

माता-पिता का अंतिम कर्तव्य होता है मौजूदा बाजार ट्रेंड के मुताबिक अपने बेटे का सबसे अच्छा रेट लगाना, सही तरीके से मोलभाव करके सौदा पटाना और शाम को बलात्कारी होने की संभावनाओं से भरे किसी महात्मा के सत्संग में मोह-माया छोड़ने के प्रवचन को भक्तिभाव से सुनना। बचे हुए समय में अपने ड्राइंगरूम में बैठकर चाय की चुस्कियों के साथ देश की सीमाओं की सुरक्षा की चिंता करना, पाकिस्तान को गालियां देना, करप्शन पर चिंता जताना जैसे काम भी निपटा लिए जाते हैं। 

बाकी बेटों की मेहरबानी से देश की अर्थव्यवस्था ठीक-ठाक चलती रहती है।

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