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ध्वस्त मिनारें और बदले के अभियान

Bhola Tiwari Sep 11, 2021, 8:06 AM IST टॉप न्यूज़
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अजय श्रीवास्तव

नई दिल्ली : 11 सितंबर 2001,अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर की अलसाई सुबह,अभी बहुत से लोगों ने बिस्तर भी नहीं छोडा था कि तकरीबन 08:46 मिनट पर एक हवाई जहाज वर्ल्ड सेंटर की एक इमारत उत्तरी टावर से टकराता है।पलक झपकते हीं ये टावर आग के गोलों में तब्दील हो जाती है।भारी अफरातफरी के बीच लोग बदहवास अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर भागते हैं तभी 09:03 मिनट पर एक और जहाज दक्षिणी टावर से टकराता है।चंद मिनटों में दक्षिणी टावर भी धूं धूं कर जलने लगता है फिर वो होता है जिसकी कल्पना टावर को बनाने वालों ने भी नहीं की थी।दोनों टावर ताश के पत्तों के समान भहरा कर गिर जाते है।

हमला यहीं नहीं रूकता,थोडे अंतराल के बाद एक और जहाज वाशिंगटन के रक्षा विभाग के मुख्यालय जो हाई सिक्योरिटी जोन में था,वहाँ टकराती है और फिर वहाँ भी वही विनाशलीला शुरू हो जाती है जो वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के दोनों टावरों पर जहाज के टकराने पर हुई थी।लोगों के जिस्मों को चिथड़ों में तब्दील होने में समय नहीं लगता।जले हुए मानव शरीर के लोथड़े हर जगह बिखरे मिलते हैं।चौथा विमान भी हमले के लिए निकलता है मगर वह नाकामयाब होकर खेतों में गिर जाता है।

वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के उत्तरी टावर पर जब जहाज टकराती है तो लोग सोचते हैं कि ये दुर्घटना है मगर जब दक्षिणी टावर पर जहाज को टकराया जाता है तब लोगों को ये अंदेशा हो जाता है कि ये दुर्घटना नहीं आतंकी हमला है।सिलसिलेवार हमलों को देखकर रेडियो,टीवी पर ये घोषणा की जाती है कि लोग अपने घरों में रहें और कोई भी संदिग्ध व्यक्ति दिखने पर पुलिस को सूचित करें।इस आत्मघाती हमले में तीन हजार से ज्यादा लोग कालकवलित हो जाते हैं और घायलों की संख्या हजारों में आँकी जाती है।जिस समय ये हमला हुआ था,वर्ल्ड ट्रेड सेंटर में लगभग 18,000 लोग काम कर रहे थे।गनीमत ये रही कि जब उत्तरी टावर में आग लगी तो उत्तरी टावर के साथ दक्षिणी टावर में काम कर रहे अधिकांश लोग बाहर आ गए थे नहीं तो इंसानी जिंदगियों के नुकसान का हिसाब लगाना भी मुश्किल होता।मरने वाले लोगों में 70 अलग अलग देश के वो मासूम नागरिक थे जो बेहतर जिंदगी की तलाश में सपनों के देश अमेरिका आए थे।उन मासूमों को ये नहीं पता था कि उनके आखिरी पल वहीं बितने वाले हैं जहां वो शानदार जिंदगी के सुनहरे ख्वाब को लेकर आए थे।

आपको बता दें कि वर्ल्ड ट्रेड सेंटर न्यूयॉर्क के मैनहटन में बने दो टावर रूपी इमारतों का ज़ोडा था।इसके एक टावर का निर्माण सन् 1966 में शुरू हुआ था जो सन् 1972 में पूर्ण हुआ।दूसरा टावर सन् 1973 में तैयार हुआ।दोनों की भव्यता देखने लायक थी और वहाँ टूरिस्टों का भारी जमवाडा रहता था।अमेरिका के गर्व थे ये दोनों टावर जिस पर अलकायदा की नजर सन् 1996 से हीं थी।गौरतलब है कि वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर ये पहला हमला नहीं था।इसके पहले सन् 1993 में आतंकियों ने इसके बेसमेंट के गैरेज में बम विस्फोट कर चुके थे जिसमें छह लोगों की मौत हुई थी और हजार के लगभग घायल थे।मामले की तहकीकात एफबीआई के तेजतर्रार अधिकारियों ने की थी और सात लोगों को पकडा था।

इस हमले में अमेरिका को अरबों डाँलर का नुकसान उठाना पडा था।वर्ल्ड ट्रेड सेंटर मे रखे दुर्लभ कलाकृतियों की कीमत करीब दस करोड़ डाँलर आंकी गई थी।करोड़ों के कम्प्यूटर,फर्नीचर और अन्य चीझें नष्ट हो गईं।धन के अलावा जो चीझ सबसे अधिक प्रभावित हुई वो अमेरिका की साख थी।सबसे सुरक्षित देश का दंभ भरने वाले अमेरिका की सुरक्षा व्यवस्था तार-तार हो गई थी।दहशत का ये आलम था कि अमेरिका के विभिन्न अस्पतालों में मानसिक तनाव से प्रभावित लोगों की संख्या लगभग दोगुनी हो गई थी।सर्वेक्षण में पाया गया कि लोगों ने डर को भगाने के शराब और नशीली दवाओं का सेवन करना शुरू कर दिया था।जो चर्च में नहीं जाते थे उन्होंने भी चर्च में जाना शुरू कर दिया था।

एफबीआई की जाँच में पता चला कि इस हमले के पीछे अल-कायदा है और फिर उसके सरगना ओसामा बिन लादेन की तलाश शुरू हुई।ये वही ओसामा बिन लादेन था जिसे अमेरिका ने सोवियत संघ के अफगानिस्तान पर कब्जे की लडाई में हर तरह की मदद की थी।तालिबान और अल-कायदा मूलरूप में एक हीं हैं जो अफगानिस्तान युद्ध की उपज हैं।आपको याद होगा सन् 1978 में सोवियत संघ,अफगानिस्तान के शासक की मदद की गुहार पर अफगानिस्तान में प्रवेश किया था।उन दिनों अफगानिस्तान में साम्यवादी सरकार थी और उसे मुजाहिदीन लगातार अस्थिर कर रहे थे।सोवियत संघ के खिलाफ लडाई में अमेरिका सीधे न उतरकर पाकिस्तान के कंधे पर बंदूक रखकर लडाई लडने की योजना बनाई।सोवियत संघ के खिलाफ लडाई लड़ने के लिए पाकिस्तान को सैन्य और आर्थिक मदद दी जाने लगी।अमेरिका ने अपनी कुटनीति से इस लडाई को इस्लाम के खिलाफ रूस की लडाई कहकर प्रचारित किया।पाकिस्तान ने अपने लडाकों से यह कहा कि इस्लाम खतरे में है और आपको इस्लाम के लिए जेहाद करना है।अमेरिका और पाकिस्तान की ये मुहिम रंग लाई और अनपढ़ नौजवान जेहाद करने के लिए तैयार हो गए।बहुत से इस्लामिक देशों ने इस लडाई के लिए मोटी रकम दी,जिससे आधुनिक हथियार खरीदे गए।

दस साल तक चले इस सघर्ष में सोवियत संघ धीरे धीरे कमजोर पड़ता गया और सन् 1990 में सोवियत संघ ने अफगानिस्तान से हटने का निर्णय लिया।कहने को तो सोवियत संघ वापस लौट रहा था मगर ये उसकी बडी हार थी और सोवियत सेना के लौटने के तुरंत बाद तालिबान ने अफगानिस्तान की सत्ता पर कब्जा कर लिया।तालिबान प्रमुख मुल्ला उमर और अल कायदा प्रमुख लादेन इस युद्ध के हीरो थे और फिर अफगानिस्तान को इस्लामिक राष्ट्र बना दिया गया।

जिस साँप को अमेरिका ने इतने दिनों तक दूध पिलाया वो हीं एक दिन उसे डंस लिया।वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमले के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ने तालिबानी प्रमुख मुल्ला उमर से लादेन को सौंपने के लिए कहा था,जिसे मुल्ला उमर ने इंकार कर दिया।तब अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला कर तालिबान को सत्ता से बेदखल किया था।

जाँच आगे बढी तो ये पता चला कि इस पूरे आँपरेशन की कमान लादेन ने अपने दाहिने हाथ खालिद शेख मोहम्मद को दे रखी थी और वो सन् 1996 से हीं इसकी तैयारी कर रहा था।खालिद शेख मोहम्मद ने इस आँपरेशन के लिए तकरीबन पचास लोगों को ट्रेंड किया जिसमें 19 लोगों को विभिन्न तरीक़े से अमेरिका भेजा और ये सभी आत्मघाती थे।19 हाइजैकर्स में से 15 सऊदी अरब के थे और बाकी यूएई,इजिप्ट और लेबनान के रहनेवाले थे।हमले वाले दिन एयरपोर्ट की सुरक्षा को भेदते हुए आतंकियों ने चार जहाज का अपहरण कर लिया,जो विभिन्न जगहों से न्यूयॉर्क आए थे और इन पर यात्री बैठे हुए थे।आतंकियों ने यात्रियों से भरे जहाज को विभिन्न जगह टकराया था।

अमेरिका ने इन हमले के तुरंत बाद अल-कायदा के मुखिया ओसामा बिन लादेन को जिंदा या मुर्दा पकड़ने के लिए 2.5 करोड़ डाँलर कख इनाम रखा था।अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ने ओसामा को पकड़ने के लिए हीं अफगानिस्तान में तालिबानी शासन को तहस नहस कर दिया मगर वहाँ भी लादेन पकडा नहीं जा सका,पकडा जाता भी कैसे वो आंतकवाद के पनाहगाह पाकिस्तान के एबटाबाद में जो छूपा था।

अमेरिका का मोस्टवांटेड लादेन को पकडऩे के लिए एफबीआई के ऐजेंट जंगली कुत्तों की तरह अफगानिस्तान में मारे-मारे फिर रहे थे।उनकी एक छोटे सी सूचना पर भी कार्रवाई होती थी मगर वो हमेशा बचकर निकल जाता था या वो सूचना हीं बोगस होती थी।एक गलत सूचना के आधार पर अमेरिकी सेना ने तोराबोरा की पहाडियों पर कई हजार टन बारूद गिराये थे मगर नतीजा तब भी सिफर रहा था।अफगानिस्तान के कबाइली इलाकों में लोगों को पैसे देकर लादेन के ठिकाने खोजे जाते थे मगर लादेन अफगानिस्तान में था हीं कहाँ,वह तो अपने सुरक्षित पनाहगाह के वातानुकूलित घर में आराम फरमा रहा था।

एक आँपरेशन के दौरान गिरफ्तार किये गए एक आतंकी से एफबीआई के एजेंटों को ये सूचना मिलती है कि लादेन पाकिस्तान के एबटाबाद में छूपा हुआ है।

एफबीआई के एजेंट लगातार एक साल लादेन के घर की निगरानी करते हैं और आनेजाने वाले एक एक आदमी पर नजर रखी जाती है।लगभग छह महीने के फालोअप पर ये तो तय हो जाता है कि इस सुरक्षित बंगले में लादेन हीं छूपा है जो कभी बाहर नहीं निकलता।साल भर की निगरानी में एफबीआई के एजेंट एक दो बार लादेन की झलक भर देख सके थे,वो भी स्पष्ट नहीं।वह जिस घर में रहता था उसकी बाउंड्री की दीवारें बहुत ऊँचीं थीं।परिवार का कोई भी सदस्य जब तक बहुत जरूरी न हो घर से बाहर नहीं निकलता था,लादेन तो बिल्कुल हीं नहीं।

शक के यकीं में बदलने के बाद लादेन को पकड़ने का प्लान तैयार किया जाने लगा।ये आँपरेशन अमेरिका के लिए कितना महत्वपूर्ण था ये इस बात से समझा जा सकता है कि आँपरेशन से जुडी हर रणनीति राष्ट्रपति बराक ओबामा से साझा किया जा रहा था और उनकी राय ली जा रही थी।

आँपरेशन को नाम दिया गया "जेरोनिमो"।गौरतलब है कि अमरीकी मूल के लडाके जेरोनिमो ने सन् 1887 में गोरे अमरीकियों का विरोध करने वाले अमरीकी मूल के आखिरी जत्थे का नेतृत्व किया था।ये जेरोनिमो हीं था जिसने अमेरिकी सेना को लंबे समय तक चकमा दिया था।शायद अमेरिका ओसामा बिन लादेनको 21 वीं सदी का जेरोनिमो मानता था,यद्यपि इस आँपरेशन का नाम जेरोनिमो क्यों रखा गया ये उन्होंने कभी नहीं बताया।

कार्रवाई वाले दिन दोपहर को व्हाइट हाउस में ओबामा मंत्रिमंडल के कुछ महत्वपूर्ण मंत्रियों की बैठक हुई,जिसमें ये बताया गया कि आज ओसामा को पकड़ने का आँपरेशन किया जाएगा।मंत्रिमंडल की सहमति मिलने के तुरंत बाद व्हाइट हाउस में एक संचार केंद्र बनाया गया जो एडमिरल मेक्रावेन से जुडा था।आँपरेशन कितना महत्वपूर्ण था वो इस बात से समझा जा सकता है कि उस दिन एडमिरल मेक्रावेन पूर्वी अफगानिस्तान के जलालाबाद शहर में थे और विभिन्न तैयारियों का जायजा ले रहे थे।संचार केंद्र को "सर रूम" का नाम दिया गया और उससे पेंटागन और सीआईए मुख्यालय के विशेष कक्ष को जोडा गया।सारी तैयारी मुक्कमल होने के बाद सीआईए प्रमुख मेक्रावेन को ये आदेश देते हैं कि "गो इन देअर एंड गेट बिन लादेन"।

रात ग्यारह बजे आँपरेशन का शुभारंभ होता है,23 सदस्यों की अमेरिकी नौसेना की सील टीम दो ब्लैकहाक हेलीकॉप्टर में बैठ जाती है।इनके साथ एक प्रशिक्षित कुत्ता भी होता है जो सील कमांडो की तरह बुलेटप्रूफ जैकेट पहनकर हेलीकॉप्टर में सवार हो जाता है।लगभग आधे घंटे की यात्रा के बाद हेलीकॉप्टर लादेन के घर के ऊपर मंडराने लगते हैं।हेलीकॉप्टर को इस तरह से डिजाइन किया गया था कि उससे कम से कम आवाज निकले और वो पाकिस्तानी रडार की पकड के बाहर रहें।ब्लैकहाक हेलीकॉप्टर के उडान भरने के 45 मिनट बाद उसी रनवे से चार चिनूक हेलिकाँपटरों ने लक्ष्य की तरफ उडान भरी।चार में से दो हेलीकॉप्टर पाकिस्तानी सीमा के पास रूक गए और शेष दो अपने लक्ष्य की तरफ बढ गए।

आपको बता दें ये पहले से तय नहीं था मगर राष्ट्रपति ओबामा के कहने पर इन्हें बैकप के रूप में भेजा गया था।राष्ट्रपति का मानना था कि अगर ये आँपरेशन असफल होता है तो सैनिकों को किसी भी तरह अफगानिस्तान पहुँचाया जा सके,जहाँ से ये आँपरेशन संचालित हो रहा था।

दो ब्लैकहाक हेलिकाँपटरों में से एक लादेन के घर लैंडिंग के समय दुर्घटनाग्रस्त हो गया,उसके पंख कंक्रीट के मजबूत दीवार से टकराकर क्षतिग्रस्त हो गए थे मगर पायलट की सुझबुझ से उसकी सफल लैंडिंग करा दी गई मगर वो फिर से उडान भरने में अक्षम हो गया था।दूसरा हेलीकॉप्टर सफलतापूर्वक लैंड हो गया और नेवी शील के प्रशिक्षित कमांडो ने तुरंत कार्रवाई शुरू कर दी।दरवाजे को तोड़कर शील कमांडो अंद घुसे तभी लादेन की बीबी की निद्रा तेज आवाज के साथ खुल गई।उन्हें समझ में आ गया था कि कुछ अनहोनी हो गई है।आवाज सुनकर लादेन भी जागा और वह देखने के लिए बाहर निकला।जब तक वो लोहे के दरवाजे को बंद करने का प्रयास करता एक कमांडो उसके रूम में घुस चुका था।

दूसरी तरफ से एक टीम घर में घुसी तो उसका सामना लादेन के 23 वर्षीय बेटे खालिद से हो गया,जो तेजी से सीढ़ी उतर रहा था।खालिद को तुरंत गोली मार दी गई।इधर लादेन के कमरे में कमांडो कार्रवाई शुरू हो गई थी।अपने को घिरा हुआ देखकर लादेन चुपचाप खडा हो गया,वो जान चुका था कि अब बचना नामुमकिन है मगर उसकी अमल लादेन के सामने खडी हो गई।कमांडो ने तुरंत उसके पैर में गोली मारी जिससे वो वहीं गिर पडी।अब लादेन और कमांडो आमने सामने थे।कमांडो ने बिना समय गवाएं लादेन पर डबल टैप शाँट लगाया जो उसके सीने और बाईं आँख को बेधते हुए बाहर निकल गई।लादेन के शरीर को बिल्कुल ठंडा करने के लिए उसके सीने में एक और गोली मारी गई,यद्यपि उसके प्राण पखेरू पहले फायरिंग में हीं हो गए थे।

कमांडो चाहते तो निहत्थे लादेन को जिंदा भी पकड सकते थे मगर ये पहले से हीं तय था कि लादेन को वहीं गोली मारनी है और ये तय करना है कि उसके प्राण निकल गए हैं।लादेन की हत्या के बाद उसके शरीर को हेलिकॉप्टर में लादकर अफगानिस्तान ले आया जाता है और डीएनए की जाँच कर ये पुख्ता कर लिया जाता है कि ये लादेन हीं है।

पूरे आँपरेशन को अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा व्हाइट हाउस में बैठकर देखते हैं और जब सभी हेलीकॉप्टर अफगानिस्तान में पहुंच जाते हैं तो वो खुशी से चिल्ला कर कहते हैं कि हमने अपना बदला ले लिया।लादेन के शव को इस्लामिक रीतिरिवाज से समुद्र में दफना दिया जाता है।जमीन पर न दफनाने का फैसला इसलिए लिया गया कि जमीन पर उन्हें दफनाए जाने के बाद उसकी कब्र उनके चरमपंथी समर्थकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन जाती।

जब अमरीकी कमांडो सफलतापूर्वक आँपरेशन पूरा करके चले गए तब पाकिस्तान को ये खबर मिली थी। इस तरह अमेरिका ने अपने निर्दोष नागरिकों की मौत का बदला लिया था।

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