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बिहारी होने की परिभाषा को बदलिए !!

Bhola Tiwari Jul 11, 2019, 8:25 AM IST टॉप न्यूज़
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नीरज कृष्ण

भगवान की कसम खा कर कहता हूँ भाई, हम वो बिहारी नहीं हैं जो लालू ने दिखाया है आपको। हम वो बिहारी हैं जैसा दिनकर, नागार्जुन, विद्यापति ने आपको बताया होगा। सच कह रहा हूँ, हम वैसे नहीं ठठाते हैं जैसा लालू ठठाते थे, हम वैसे मुस्कुराते हैं जैसे बुद्ध मुस्कुराते थे। वो लाठी हमारी पहचान कभी नहीं रही जिसे लालू ने चमकाया था, बल्कि हमारे पास तो वो लाठी थी जिसे थाम कर मोहनदास, 'महात्मा' बन गए। साहब, हम कभी 'बिहारी टाईप' भाषा नहीं बोलते रहे हैं। हम मैथिली-भोजपुरी-मगही-अंगिका-बज्जिका बोलते हैं।

यकीन कीजिये, हम चारा नहीं खाते, गाय पालते हैं। आप मानिए प्लीज़ कि लालू हमारे 'कंस' महज़ इसलिए ही नहीं हैं की वे पशुओं का चारा खा गए। वे हमारे लिए बख्तियार खिलजी इसलिए हैं क्यूंकि उन्होंने हमारी पहचान को जला डाला, हमारी पुस्तकें जला डालीं, हमारी सभ्यता, संस्कृति सबको लालूनुमा बना डाला।

तय मानिए प्रिय भारतवासियों, हम भी उसी देश के निवासी हैं जिस देश में गंगा बहती है। लालू के 'बथानीटोले' का बिहार दूसरा था जहां खून की नदियाँ बह गयी थी, हमारा तो दिनकर वाला सिमरिया है जहां के गंगा किनारे विद्यापति गाते थे 'बर सुखसार पाओल तुअ तीरे....!

नयनों में नीर भर कर हम अपने उसी बिहार को उगना की तरह तलाशते हुए द्रवित हो पुकार रहे हैं 'उगना रे मोर कतय गेलाह।' ठीक है अब चारा वापस नहीं आयेगा। हम जैसे लोगों का भविष्य लौट कर नहीं आयेगा। लेकिन प्लीज़, प्लीज़ प्लीज़ हमारी पहचान लौटा दीजिये। 'भौंडे बिहारीपना' की बना दी गयी मेरी पहचान को सदा के लिए बिरसा मुंडा जेल में ही बंद रहने दीजिये मेरे भाई। 

त्राहिमाम.... त्राहिमाम।

 अवश्य पढ़ें.....कम से कम वे पाठक अवश्य जिन्हें......बिहारी शब्द एक 'हास्य' का शब्द लगता है, उन बिहारियों को.....जो बिहार छोड़ कर चले गए और सबसे ज्यादा गाली वही देते हैं......भाई मेरे एक बार अतीत के पन्नों को पलट कर पढ़ लो.....क्या थे.....और आज क्या बना दिये गए......हम।

गर्व से कहो ......'हम बिहारी हैं'।

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