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समय से चार कदम आगे बेंगलुरू

Bhola Tiwari Jul 11, 2019, 8:08 AM IST टॉप न्यूज़
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 प्रवीण झा

तोता-रंग की छोटी बिजली ‘रेवा’ गाड़ियाँ। बेंगलुरू समय से आगे ही चल रहा था। दो दशक पहले ही इलेक्ट्रिक गाड़ी दौड़ने लगी थी, जब भारत में यह कहीं नजर नहीं आती। पर अब यह फ्लॉप हो गयी। जो गति पेट्रोल-कार में है, वो इन धीमी गाड़ियों में कहाँ? ‘रेवा’ के सृजक चेतन मैनी जी, जो कभी अमरीका में सूर्य की रोशनी से गाड़ी चला कर रेस जीते थे, वो भारत में हार गए। कंपनी छोड़ गए। पता नहीं, अब कहाँ हैं?

वहीं दूसरी ओर, यहाँ देख रहा हूँ, हर तीसरे घर में बिजली गाड़ी आती जा रही है। मैं भी खरीदने की फिराक में हूँ। जगह-जगह चार्जिंग प्वाइंट लग गए। हर कंपनी में, हर ग्रॉसरी दुकान के बाहर, हर दसेक कि.मी. पर। पार्किंग मुफ्त, और आधे घंटे में फटाफट बैट्री चार्ज। नई गाड़ियाँ तो 100 कि.मी. प्रति घंटा पर दौड़ रही हैं। ‘टेसला’ कंपनी की तो लाजवाब मॉडल है। 

2025 तक पेट्रोल-डीजल गाड़ी बंद हो, इसके दो तरीके थे। एक, कि बिजली-गाड़ी की गति तेज हो। दूसरा, कि सड़क पर गति-सीमा कम की जाए। नॉर्वे ने कलेजे पर पत्थर रख दूसरा तरीका ही अपनाया। यहाँ 100 से अधिक स्पीड पर गाड़ी नहीं दौड़ा सकते। ‘किक’ तो तेज गाड़ी चला कर मिलता है, पर भारत में भी उस ‘किक’ की जरूरत नहीं। गति कम, दुर्घटना कम। ऊपर से पेट्रोल का खर्च खत्म, प्रदूषण खत्म। और क्या चाहिए? खाली ‘गो ग्रीन’ कहने से नहीं, बल्कि पेपरलेस और ईंधन-विहीन दुनिया गढ़ने से ही होगा।

(तस्वीर इंटरनेट से ली गई है)

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