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मुनाफा आधारित मृत समाज

Bhola Tiwari Jul 11, 2019, 6:10 AM IST टॉप न्यूज़
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 कबीर संजय

हम एक मुनाफा आधारित मृत समाज की रचना कर रहे हैं। जिसमें समाज मर रहा है। जिंदा है तो सिर्फ मुनाफा। वह फूल-फूल रहा है। समाज अंतिम सांसें गिन रहा है। 

पहले से इसकी तुलना करें तो समाज की चिंता कुछ हद तक दिखाई पड़ती थी। पहले बड़े-बड़े राजमार्गों के किनारे ऊंचे-ऊंचे दरख्तों के पेड़ लगाए जाते थे। बरगद, पाकड़, पीपल, आम, महुआ, नीम जैसे तमाम पेड़ों की कतारें सड़क के किनारे दूर तक दिखाई पड़ती थीं। इनमें से कई की छाया इतनी घनी होती थी कि उस पर चबूतरे भी बना दिए जाते थे। कोई आकर मटका भर पानी भी रख जाता था। इधर से गुजरने वाले इसी चबूतरे पर अपना अंगौछा बिछाकर सो भी जाते थे और थकान उतरने पर फिर से अपना रास्ता पकड़ लेते थे।

लेकिन, अब आप बड़े-बड़े हाईवे, एक्सप्रेस वे से गुजरिए। आपको एक मृत सड़क मिलेगी। दूर-दूर तक लंबी-चौड़ी सड़क। खूब आग उगलता हुआ सूरज। अपने-अपने एसी के डिब्बे में कैद तेजी से भागती कारें। उन्हे बाहर के ऊंचे-ऊंचे दरख्तों की चिंता नहीं है। उसकी छाया की जरूरत नहीं है। अपने छोटे से डिब्बे का तापमान तो वे एसी चलाकर ठीक कर लेंगे। खूब ठंडा, चिल्ड एसी। लेकिन, बाहर का तापमान उतना ही ज्यादा गरम कर देंगे। हाईवे वालों को चिंता बस इसी बात की है कि कोई टोल दिए बिना निकल न जाए। दाम तो चुकाओ भाई। यहां इनसान की कीमत नहीं, सिर्फ रफ्तार की कीमत है।

पहले इन रास्तों पर भी ऊंचे दरख्तों की कतारें हुआ करती थीं। फिर लोगों की गाड़ियों का आकार बड़ा हो गया। उनकी रफ्तार और बढ़ गई। सड़क के चौड़ीकरण की जरूरत आ गई। कटते समय पेड़ रोते-चिल्लाते-कलपते तो हैं नहीं। न कोई उनके लिए रोने-चिल्लाने और कलपने के लिए आता है। सबसे आसान हैं इन्हें काटकर किनारे कर देना। 

दरख्तों के कटे हुए ठूंठ हमारी पूरी समाज व्यवस्था पर सवाल खड़ा करते हैं। क्या हम बिना दरख्तों के जी पाएंगे। सिर्फ अपना-अपना सोचकर हम कहां तक जा सकते हैं। अपनी गाड़ी का एसी चलाओ, बाकी दुनिया जहान जाए भाड़ में। 

पेड़ों की छाया में तापमान आमतौर पर पांच डिग्री तक कम हो जाता है। लेकिन, इसकी परवाह कम ही लोगों को होने वाली है। 

दरख्त लगाओ और कई साल बाद उसकी छाया पाने से ज्यादा आसान है, एसी का नॉब घुमाओ और तुरंत ठंडा हो जाओ। 

सवाल यह है कि जब सौ साल पुरानी इमारत को धरोहर मान लिया जाता है तो फिर सौ साल पुराने पेड़ को धरोहर मानकर उसकी हिफाजत क्यों नहीं की जाती।

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