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नलका पानी छोड़ रहा है...

Bhola Tiwari Jul 11, 2019, 6:07 AM IST टॉप न्यूज़
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 कबीर संजय

हाल के दिनों में जिन भी गांवों में जाना हुआ या जिनसे भी गांवों के हालात पूछे सब में एक बार कॉमन मिली। नलका पानी छोड़ रहा है। गांव से तालाब तो पहले ही सूख चुके थे। अब नलका यानी हैंडपंप भी सूख रहे हैं।

अभी भी हमारे गांवों में पीने के पानी के लिए सबसे ज्यादा लोग हैंडपंप यानी चापाकल यानी नलके पर निर्भर हैं। पीने के पानी की आपूर्ति गांवों में सरकार की ओर से शायद ही कहीं होती हो। पुराने नलके जो बीसियों साल से पानी दे रहे थे। वे आखिर सूख क्यों रहे हैं। उनके सूख जाने के बाद होगा क्या। हमारे गांवों की प्यास कैसे बुझेगी। इन नलकों के सूखने का कारण क्या है।

अगर हम अपने बचपन को याद करें तो हमें अपने आसपास की बहुत सारी चीजें याद आएंगी। हमारे गांवों के इर्द-गिर्द बहुत सारी जमीने ऐसी थीं जो खाली पड़ी रहती थीं और उसमें पानी भरा रहता था। यह वेटलैंड यानी नमभूमि लगभग सभी जगहों पर दिखाई पड़ता था। इस पानी में लंबी-लंबी घासें उगा करती थीं। किनारे नरकट के झुरमुट होते थे। पक्षी यहां पर अपना आशियाना बनाते थे। हर समय इस पर न जाने कितनी ड्रैगन फ्लाई मंडराती रहती थीं। अंदर मेढक पलते थे। बचपन की रातें याद हैं जब रात के समय आसपास से आने वाली टर्र-टर्र की आवाजें हमें लुभाती रहती थीं। कोई मेढक अपनी मेढकी की आवाज देकर बुलाता था। रात में कोई पेड़ जुगनुओं की रोशनी से झिलमिलाता रहता था। 

लेकिन, क्या हमारे बच्चों ने भी यह वेटलैंड देखा है। मेढकों की आवाजें सुनी हैं। ड्रैगन फ्लाई या रामजी के सुग्गे पकड़े हैं। हमने इस वेटलैंड को बेकार समझा। लेकिन, वह हमारा कितना काम करता था। इस नम भूमि के चलते नीचे का पानी रिचार्ज होता था। यहां पर मंडरानी वाली ड्रैगन फ्लाई और मेढक मच्छरों के लार्वे और मच्छरों को खाते थे। यह ईकोसिस्टम अब हर जगह समाप्त हो गया। 

वेटलैंड का नाश इस कदर हुआ है कि पिछले वर्ष विश्व पर्यावरण दिवस को वेटलैंड दिवस के रूप में भी मनाया गया था। लेकिन, दिवस आते हैं और चले जाते हैं। हम अपनी दिनचर्या को पहले जैसे ही मनाते रहते हैं। 

पहले वेटलैंड समाप्त हुए, फिर तालाब या जोहड़ सूख गए, उन पर कब्जा हुआ, कोठियां खड़ी हो गईं। अब नलके सूख रहे हैं। पीने के पानी के लिए नई बोरिंग कराई जा रही है। लेकिन वह भी कब तक चलेगी, जल्दी ही वह भी सूख जाएगी। 

कहा तो यहां तक जा रहा है कि भूमिगत जल के नीचे जाने के चलते बहुत सारे पेड़ों की जड़ों को भी पानी नहीं मिल रहा है। वे भी सूख रहे हैं। आम के बारे में भी कुछ ऐसा कहा जा रहा है। हालांकि, इस पर अभी बहुत शोध किए जाने की जरूरत है। 

लेकिन, हमारे जीवन से कुछ बहुत जरूरी सा ऐसा था, जो अनुपस्थित होता जा रहा है। जिसकी कमी सच में हमें बहुत ज्यादा खलने वाली है।

तस्वीर सड़क मार्ग से दिल्ली से इलाहाबाद जाने के दौरान इटावा के बाद कहीं पर ली गई है। इसमें एक वेटलैंड है। जिसमें बहुत सारे पक्षी है और एक ईको सिस्टम है। पिक्चर क्रेडिट--- Savita Pathak

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