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पक्षीराजन ! तुम खलनायक कैसे बन गए ?

Bhola Tiwari Jul 11, 2019, 5:30 AM IST टॉप न्यूज़
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 दिनेश त्रिनेत

शंकर की फिल्म 2.0 को स्पेशल इफेक्ट के परे देखा और परखा जाना चाहिए। स्पेशल इफेक्ट वैसे भी बुरे और कल्पना से खाली हैं। इसका नायक चिट्टी यानी रोबोट घोषित रूप से फिल्म में सिस्टम का पक्षधर बनकर सामने आता है। वहीं पक्षीराजन एक ऐसा किरदार है जिसे हम और आप अपने इसी समाज में देखते हैं और हमें हैरानी होती है कि यह खलनायक कब, कैसे और क्यों बन जाता है?

यह वो सिस्टम है जिसे हम राजनीति या शासन-प्रशासन कहते हैं। फिल्म में यह साफ तौर पर दिखाया भी गया है कि उसमें कुछ बड़े इंडस्ट्रियलिस्ट की दखलंदाज़ी है। उन उद्योगपतियों के अपने हित हैं। उन्हें अपने हितों के आगे इस बात से मतलब नहीं है कि इससे पर्यावरण या आमजन के हितों को क्या नुकसान पहुंचेगा। लेकिन यह फिल्म अपने ट्रीटमेंट में जल, जंगल और जमीन की लड़ाई लड़ने वालों को क्रूर खलनायक बनाकर पेश करती है। वह भी एक ऐसे देश में जहां हुए चिपको आंदोलन में औरतें बंदूकों के सामने पेड़ से चिपक कर उनको कटने से बचाने के लिए खड़ी हो जाती हैं। 

पक्षीराजन बने अक्षय कुमार प्रतीकात्मक रूप से उन्हीं जनआंदोलनों के प्रतिनिधि बनकर सामने आते हैं, और यह महज संयोग नहीं है कि फिल्म में मृत्यु से पहले उनका गेटअप देश के जानेमाने पक्षी विज्ञानी सालिम अली जैसा है। यह शख्स परिदों और अपने पर्यावरण के प्रति संवेदनशील है। उत्सुक और संवेदनशील युवा उसे ध्यान से सुन रहे हैं। वह रेडिएशन से परिंदों की प्रजातियों पर मंडरा रहे खतरे से चिंतित है। 

पक्षीराजन अपनी लड़ाई हर वैधानिक तरीके से लड़ने का प्रयास करता है। शासन के सामने अपनी मांग रखकर, कोर्ट में जनहित याचिका दायर करके और शांतिपूर्वक विरोध दर्ज करके। मगर यही पक्षीराजन मृत्यु के बाद अतिमानवीय शक्तियों वाला एक हिंसक खलनायक बन जाता है और यह फिल्म पूरे विमर्श को प्रकृति बनाम मनुष्य की लड़ाई में बदल देती है। 

इस वक्त जब उपनिवेशवाद और पूंजीवाद के बाद सारी दुनिया में अब प्रकृति और पर्यावरण ही आंदोलनों की अगली जमीन तैयार कर रहे हैं। परिंदों से प्यार करने वाला कब और और कैसे एक हिंसक राक्षस बन जाता है यह समझ से परे हैं। हमारे तो मिथक भी पक्षियों के प्रसंगों से भरे पड़े हैं। वाल्मीकि सारस के जोड़े पर बहेलिए के तीर से इतने द्रवित हो उठे कि हमारी संस्कृति भाषा सबसे बड़े कवि बन गए। 

दिलचस्प यह है कि भारत में पर्यावरण को लेकर हुए ज्यादातर आंदोलन अहिंसक और गांधीवादी विचारधारा से प्रभावित लोगों ने संचालित किए हैं। मगर यह फिल्म इस प्रतिरोध को एक हिंसक रूपक में बदलती है। यानी इस फिल्म को देखने के बाद शायद जीव-जंतुओं और नदियों और जंगल और साफ हवा की बातें करने वाले आपको छिपे हुए खलनायक नजर आने लगें। इस पक्षीराजन से निपटना न तो डा.वासीगरन के बस का है और न ही उसके बनाए रोबोट 2.0 के बस का। 

इसके बाद फिल्म में पक्षीराजन और रोबोट बीच युद्ध ही है। जिसमें इस कदर दुहराव है कि आप कुछ देर में उकताने लगते हैं। इसके स्पेशल इफेक्ट्स को जो भी समीक्षक बेहतर बता रहे हैं उन्हें या तो VFX की समझ नहीं है या उन्होंने बेहतर स्पेशल इफेक्टस वाली फिल्में ही नहीं देखी है। 

बहरहाल अंत तक आते-आते दो बातें साफ हो जाती हैं। जल, जंगल, जमीन की लड़ाई लड़ने वाले दरअसल निगेटिव एनर्जी वाले लोग हैं और इसलिए वे एक ऐसे राक्षस हैं जो व्यवस्था और आम नागरिक जीवन के लिए खतरा हैं। यानी उन्हें खत्म होना ही होगा और यही होता भी है। अंत में यह भी कहा जाता है कि पक्षीराजन आदमी बुरा था मगर उसकी सोच सही थी। शासन के प्रतिनिधि अच्छे दिनों का आश्वासन देते हैं। 

फिल्म पर्यावरण के प्रति थोड़ी सी संवेदना जताती है और इसका ही एक संवाद है जिसमें कहा जाता है कि हम पक्षियों के लिए कम से कम थोड़ा सा पानी तो रख सकते हैं। यानी कि यह फिल्म बड़े आंदोलन और बुनियादी बदलावों की मांग को सिरे से खारिज करती है और यह कहती है कि ऐसी मांग करने वालों को भी थोड़ी सी सुविधाएं दे देनी चाहिए वर्ना पक्षीराजन की तरह कभी भी किसी बड़े आंदोलन का प्रेत खड़ा हो जाएगा।

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