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क्या भगत सिंह हो जाना इतना सरल है !!

Bhola Tiwari Jul 10, 2019, 6:19 AM IST टॉप न्यूज़
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नीरज कृष्ण

आज के दौर में भगत सिंह सबको प्रिय हैं पर हर कोई कहता है कि पडोसी के घर भगत सिंह पैदा हो, हमारे घर नहीं। अगर शहादत के अंजाम से पड़ोस के घर में भगत सिंह के पैदा होने की बात की जाती है तो क्या शहीद भगत सिंह की जिंदगी का यही एक मात्र अंजाम है, तब फिर भगत सिंह की बात ही क्यूँ की जाती है।

आज हमें फिर से सोचना होगा कि क्या हम वाकई में भगत सिंह को जानते भी हैं या नहीं। कोई भगत सिंह कैसे बन जाता है अपने विचारों की यात्रा से या फंसी पर चढ जाने से।

आज हर राजनितिक दल का नेता उनके शहादत दिवस के मौके पर उन्हें याद कर रहा है, उनकी तस्वीरों के साथ ट्वीट कर रहा है। मेरा उनसे एक सवाल है क्या उनके दलों में किसी नौजवान को या कार्यकर्त्ता को भगत सिंह बनने का अवसर है या कोई भी दल का कोई भी नेता ऐसा है जो अपनी सोच से भगत सिंह के विचारों के आस-पास भी हो। उनके विचारों को, उनकी तस्वीरों को ट्विट करना अच्छा लगता है कि कोई उन्हें याद कर रहा है, पर क्या यह पर्याप्त है।

प्रश्न यह उठता है कि जब भगत सिंह हमें प्रेरित करते हैं तो पैदा क्यूँ नह होते हैं। या फिर हमारे बीच में कोई भगत सिंह उपलब्ध भी है पर हम उन्हें देखना ही नहीं चाहते हैं। लोग आज फेसबुक एव अन्य सोशल मीडिया पर लिख रहे हैं “लगता है मुझे फिर आना पड़ेगा”। युवाओं ने चे ग्वेरा की तरह भगत सिंह को भी टी-शर्ट पर लिखकर सीने पर चिपका लिया है, पर क्या सीने से लगा भी पाए हैं? 

आज भगत सिंह एक प्रोडक्ट है, तस्वीरों के जरिये भगत सिंह के साथ जोश पैदा किया जाता है, पर हकीकत में क्या युवाओं में यह जोश नजर आता है।

आज हर राजनीतिक दल के लोग उन्हें अपना लेते हैं लेकिन प्रश्न उठता है कि यदि भगत सिंह आज जिन्दा होते तो किस दल को अपनाते एवं कौन सा दल उन्हें पद या नेतृत्व देता।

सरदार भगत सिंह ने कहा था कि “जो चीज आजद विचारों को बर्दास्त नहीं कर सकता, उसे समाप्त हो जाना चाहिए” । भगत सिंह ने यह बात नौजवान भारत सभा कि लाहौर घोषणा का एक हिस्सा है। जब यही बात किसी विश्वविद्यालय में कोई छात्र बोलता है तो हम अपने टैक्स के पैसे जोड़ने लगते हैं। भगत सिंह ने उसी घोषणा पत्र में कहा था कि ‘दुनिया के नौजवान क्या-क्या नहीं कर रहे हैं और हम भारतवासी क्या कर रहे हैं-“पीपल की एक डाल टूटते ही हिंदुओं की धार्मिक भावनाएं चोटिल हो उठती है.....बुतों को तोड़ने वाले मुसलामानों के ताजिये नामक कागज के बुत का कोना फटते ही अल्लाह का प्रकोप जाग उठता है – और फिर वह नापाक हिन्दुओं के खून से कम किसी वस्तु से संतुष्ट नहीं होता। मनुष्य को पशुओं से अधिक महत्व दिया जाना चाहिए- लेकिन यहाँ भारत में लोग पशु के नाम पर एक-दूसरे का सर फोड़ते हैं।(भगत सिंह—1928)

क्या आज का नौजवान यह विचार रखते हुए किसी पार्टी में रह सकता है। क्या भगत सिंह का टी-शर्ट पहनने से आदर्श मानाने वाले भगत सिंह की तरह मुखरता से सोच सकते हैं कि धर्मों ने हिन्दुस्तान का बेडा गर्क किया है। 1928 में ही भगत सिंह ने कहा था कि संप्रदायीक दंगों में नेताओं और अख़बारों का हाँथ है। 1928 में उन्होंने कहा था कि ‘पत्रकारिता का व्यवसाय जो किसी समय बहुत ऊँचा समझा जाता था आज बहुत गन्दा हो गया है।

किसानों एवं मजदूरों के लिए भगत सिंह के विचारों को हम दीवारों पर ही लिख देने के लायक समझते हैं या वह भी नहीं समझते हैं। हमने अपने प्रतीकों को इतना घिस दिया है कि अब उनके विचार हमें उकसाते नहीं हैं।

आजकल, जयंती एवं पुण्यतिथि की बाढ़ आ गयी है। आज यह समझना मुश्किल हो गया है कि कल जिसे हम अपनी प्रेरणा का स्त्रोत बता रहे थे आज भगत सिंह को अपनी प्रेरणा बता रहे हैं.....और कल किसी और को बताएँगे। हम इतने महापुरुषों से प्रेरणा पाने वाले लोग हो गए हैं कि .......भगत सिंह बनाना मुश्किल हो गया है।

1928 में उन्होंने छात्र-राजनीति पर अपने विचार व्यक्त करते हुए लिखा है कि- ‘आजकल बहुत शोर सुना जा रहा है कि पढ़ने वाले छात्रों को राजनीति में नहीं आना चाहिए’। उन्होंने कहा है कि ‘मैं मानता हूँ कि विद्यार्थियों का काम पढ़ाई करना है, लेकिन क्या देश की परिस्थितिओं का ज्ञान और सुधार के उपाय सोचने की क्या उच्च शिक्षा में शामिल नहीं है। नौजवान, राजनीति का विज्ञान हासिल करें और जब जरुरत हो राजनीति मन कूद जाएँ। प्रश्न यह उठता है कि जो छात्र अपनी बुनियादी मांग को पूरा नहीं करा पते हैं उन्हें क्या हक है भगत सिंह के टी-शर्ट को पहने का।

यह कैसे संभव है कि अचानक भगत सिंह हर दल को प्रिय हो गए है, जबकि उनके विचारों पर चलने का साहस किसी भी दल/व्यक्ति में नहीं दीखता है- तो फिर ये कौन लोग हैं जो भगत सिंह को लिए फिर रहे हैं।

“व्यक्ति को मारना आसान है, विचार को नहीं।“(भगत सिंह) पर हमारे देश में आज सब कुछ उल्टा-पुल्टा हो रहा है कि विचारों को मार दिया जा रहा है और व्यक्ति जिन्दा हो रहा है। भगत सिंह के विचारों को मानने वाले लोग ही आज भगत सिंह के आदर्श की प्रतिमा को उखाड़ते चल रहे हैं या उसका समर्थन कर रहे हैं।

चलते -चलते 

सरदार भगत सिंह की कुल आयु थी 23 वर्ष 05 माह 26 दिन मात्र। जरा हम अपने अतीत में झाँक कर देखें तो कि इस उम्र में हमारी मानसिक स्थिति एवं विचार क्या रहे होंगे। आज तक के इतिहास में इतनी छोटो उम्र का इतना समझदार और सुलझा हुआ कोई अन्य दूसरा क्रन्तिकारी पैदा नहीं हुआ जिसने उस दौर में जितना लिखा उसका आज तक समूचा संकलन भी हमलोगों के सामने नहीं आ सका। भगत सिंह बना नहीं जा सकता है बल्कि भगत सिंह पैदा होता है।  

यदि, कभी मौका मिला तो भगत सिंह के लाहौर नेशनल कॉलेज में उनके शिक्षक का संस्मरण आपलोगों के समक्ष प्रस्तुत करूँगा।

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