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अप्प दीपो भव'

Bhola Tiwari Jul 10, 2019, 5:26 AM IST टॉप न्यूज़
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 दिनेश त्रिनेत

हमारी आधी जिंदगी यह समझने में कट जाती है कि हम दरअसल जिस तरह जी रहे हैं वो सही है या गलत। जीवन अपना होता है मगर जीवन के हर मोड़ पर एक दुकानदार डुगडुगी बजाता हुआ खड़ा यह समझाता मिलता है कि जिंदगी को सही तरीके से कैसे जीना है। वो कोई मोटिवेशनल स्पीकर हो सकता है, कोई दार्शनिक, कोई लेखक, कोई पुजारी, संत, आध्यात्मकि गुरू, दोस्त, बॉस या आपका अपना बहुत करीबी भी। 

हम जीवन के बारे में अपनी समझ छोड़कर वैसा जीने की कोशिश करते हैं जैसा कि कोई दूसरा हमें बताता है कि हमें कैसे जीना चाहिए। काश ऐसा हो पाता। मनुष्य की चेतना को देखते हुए उसकी उम्र बहुत छोटी है। यदि उसकी उम्र दो सौ साल से ज्यादा होती तो शायद वह ढेर सारी गलतियां करने के बाद जब समझता तो बाकी जिंदगी उस समझ के साथ जीता। लेकिन अक्सर यह होता है कि जब तक हम अपनी जिंदगी को समझ पाते हैं वक्त निकल चुका होता है। हमारे पास तब तक काफी अफसोस इकट्ठा हो जाता है और साल गिनती के बचे रह जाते हैं। 

हमें सुखी और खुश कैसे रहना है यह समझने के लिए हर वक्त किसी और का चेहरा ताकते रहते हैं। हकीकत यह है कि कोई भी दो इनसान किसी एक तरीके से सुखी नहीं रह सकते। किसी के लिए सुख भोर में चुपचाप बैठकर पेड़ से गिरते पत्ते देखने में है तो किसी और के लिए उसी सुबह पसीना बहाने में। कोई महज सपने देखकर सुखी रह सकता है तो कोई सपनों को हकीकत में बदलकर। हम कैसे सुखी हो सकते हैं इसका जवाब सिर्फ और सिर्फ हमारे पास है। यह हमारे सिवा कोई और नहीं जान सकता। यह हमारे सिवा कोई और कैसे जान सकता है? 

हम पल भर के लिए आंखें बंद करें और खुद में झांके तो हम समझ जाते हैं कि दरअसल हमें जीवन से क्या चाहिए। लेकिन इस 'क्या चाहिए' के जवाब से हम जीवन भर भागते रहते हैं। इल्म, किताबें, धर्म और अध्यात्म हमें जवाब देने का उसी तरह वादा करते हैं जैसे कि नीम-हकीम अपनी पकड़ में आए मरीज को समझाते हैं कि उसमें कमजोरी जैसी कोई बात है जो सिर्फ उसी की दी गई जड़ी से ठीक होगी। हमारी सारी पढ़ाई और परवरिश हमें एक खास तरह से कंडिशन करती है और यह समझा देती है कि हम जो जानते और महसूस करते हैं उसके अलावा दुनिया में सब कुछ सही है। शायद यह आधुनिक शिक्षा सारी जिंदगी खुद को गलत मानना ही सिखाती है। 

बुद्ध ने कहा था 'अप्प दीपो भव' यानी कि अपने दीए खुद बनना। जो मैं कहता हूं, उसपर इसलिए भरोसा मत करना कि मैं कह रहा हूं। सोचना, विचारना, जीना। तुम्हारे अनुभव की कसौटी पर सही हो जाए, तो ही सही है।

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