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वादा करके न आना बुरी बात है

Bhola Tiwari Jul 10, 2019, 5:00 AM IST टॉप न्यूज़
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 एसडी ओझा

मुजरों की शुरूआत मुगल काल से हुई थी . मुगल बादशाहों के हरम में नाचने गाने वालियां उनके मनोरंजन के लिए मुजरा का मुजाहरा करती थीं . मुजरे में नाच के साथ साथ गायन भी होता था . तबले की थाप , हारमोनियम के सुर , गाने के बोल के साथ घूंघरू की आवाज अजब समां उपस्थित करते थे. मुजरा दिल्ली से चला तो तहजीब के शहर लखनऊ पहुंचकर परवान चढ़ा , जहां से पूरे भारत में एक उफान के साथ उभरा. मुजरों में पहले अभद्रता की जगह नहीं होती थी. मुजरों की महफिल में आने वाले लोग व तवायफें शरीफ खानदान से होते थे . इन तवायफों के कोठों पर शरीफजादे तहजीब का ककहरा पढ़ने के लिए आया करते .

प्रसिद्ध तवायफ उमराव जां लखनऊ की थीं , वे अपने कलाम खुद लिखती थीं . उस पर धुन बनाती थीं . फिर गाती थीं . उमराव जान को हमने कभी नहीं देखा , पर उन्हीं के नाम पर बनी फिल्म में रेखा की अदायगी देख हम उस अनदेखे उमराव जां के दीवाने हो गये थे. इस फिल्म में एक जगह रेखा बैठकर मुजरा करती है . असल उमराव जां खड़ी होकर मुजरा करती होगी , क्योंकि यह परम्परा बाद में तवायफ जद्दन बाई से शुरू हुई . जद्दन बाई लखनऊ मे बानी सराय में रहती थीं . यहीं पर उनकी मुलाकात कलकत्ता के मोहन बाबू से हुई . मोहन बाबू आए थे डाक्टर बनने ,पर वे जद्दन बाई के मोहपाश में बंधकर रह गये . दोनों ने इलाहाबाद जाकर शादी कर ली. इन दोनों की हीं संतान थी नर्गिस , जो हिंदी फिल्मों की बहुत बड़ी हीरोईन बनी .महाराष्ट्र की केसर बाई केरकर और मोघूबाई कोरडुकर अपने जमाने की प्रसिद्ध मुजरे वाली थीं. उम्रदराज होने के कारण इन दोनों ने बाद में मुजरा छोड़ दिया था. छप्पन छुरी भी एक प्रसिद्ध मुजरे वाली थी . उनके किसी सिरफिरे आशिक ने छुरी से उनके चेहरे पर छप्पन घाव किये थे . तब से उनका नाम हीं छप्पन छुरी पड़ गया. उनका रुप रंग उजड़ गया , पर उनकी मधुर आवाज बरकरार रही . उनकी आवाज रात के अंधेरों में दो कोस तक सुनी जा सकती थी . 

ढेला बाई गया की थीं , पर उनकी सुंदरता व गायन की चर्चा पूरे बिहार में होती थी . छपरा के जमींदार हलिवंत सहाय ने पूरबी गीतों के बेताज बादशाह महेंदर मिसिर की मदद से ढेला बाई का अपहरण करा लिया . ढेला बाई की मां मीणा बाई रोती कलपती हीं रह गयीं . ढेला बाई ने इसे हीं अपनी नियति मान लिया . बाद के दिनों में जब हलिवंत सहाय इस दुनिया से कूच कर गये तब महेंदर मिसिर को अपनी गल्ती का भान हुआ . 

महेंद्र मिसिर ने हलिवंत सहाय के परिजनों से ढेलाबाई को उनका उचित हक दिलवाया . ढेलाबाई के नाम से एक मंदिर बना , जो आज भी विद्यमान है. मंदिर तो बलिया की प्रसिद्ध तवायफ शनीचरी के नाम से भी बना है, जिसमें शनीचरी घंटों बैठकर पूजा करती थी .शनीचरी बलिया की मशहूर मुजरे वाली थी. उसका मुजरा सुनने के लिए दूर दूर से लोग आते थे. रुप व गुणों की खान शनीचरी अपने अंतिम समय में आध्यात्मवादी हो गयी थी.

बात सन् १९२१ के आस पास की है , गांधी जी स्वराज फंड के लिए चंदा इकट्ठा कर रहे थे . उन दिनों की प्रसिद्ध मुजरे वाली गौहर जां से भी गांधी जी ने चंदा मांगा . गौहर जां ने दो टूक कहा कि वे स्वराज फंड के लिए एक खास मुजरा आयोजित करेंगी और उससे प्राप्त सारी आय को स्वराज फंड को दान कर देंगी , पर उनकी एक शर्त गांधी जी को माननी पड़ेगी . गांधी जी को उस खास मुजरे का खास मेहमान बनना पड़ेगा . गांधी मान गये. नियत तिथि को मुजरा हुआ . किसी राजनीतिक मीटिंग में व्यस्त होने के कारण उस मुजरे में गांधी जी शरीक नहीं हो पाये. कुल आय उस मुजरे से २४०००/- हुयी. यह रकम उन दिनों एक बड़ी रकम हुआ करती थी. गांधी जी के न आने से गौहर जां अन्यमनस्क हीं रहीं, वे अंत तक गाती रहीं व उनका इंतजार करती रहीं . अंत में गौहर ने एक मार्मिक गजल पेश की ,जिसका आशय फिल्म "साज और आवाज "के गीत जैसा था-

क्या सुहाना समाँ , क्या हसीं रात है,

वादा करके न आना बुरी बात है .

अब तो हद हो चुकी है ,चले आइए ,

दिल की महफिल सजी है, चले आइए.

दूसरे दिन गांधी जी के नुमाइंदे मौलाना शौकत अली स्वराज फंड के चंदे के लिए पहुंचे . गौहर जां ने खूब खरी खोटी उनको सुनायी . गौहर ने कहा कि ऐसे तो गांधी जी बड़ी बड़ी बातें करते हैं, पर मुझ तवायफ से किया गया एक छोटा वादा तक नहीं निभा पाए . गौहर जां ने मौलाना शौकत अली को आधा पैसा हीं दिया .वे चाहतीं तो एक पैसा भी नहीं देती ,क्योंकि गांधी जी ने अपना वादा नहीं निभाया था. गौहर जां अपने वादे की पक्की निकलीं.

सन् १९५८ से मुजरे का अधोपतन शुरू हो गया था. इसमें अश्लीलता का समावेश होने लगा था .

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