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हम शुतुरमुर्गी जिंदगी जीने के आदि

Bhola Tiwari Jul 09, 2019, 6:24 AM IST टॉप न्यूज़
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नीरज कृष्ण

पिछले दो दिन पूर्व एक बार यह खबर पिछले वर्ष की भांति फिर सुर्खियों में थी। एक लाचार और बेबस पति साइकिल पर अपनी पत्नी की लाश को ढोता रहा, कुछ इसी तरह की एक घटना बिहार में घटी जहां बाप अपने बीमार पुत्र को हांथों में लेकर चल रहा है और दूसरा परिजन अपने हाँथ में ऑक्सीजन का सिलेंडर, भूख से तड़प-तड़प कर एक बच्ची फिर मर गयी.....और उसके ठीक एक दिन पूर्व ही सदन में एक बड़ी महत्वपूर्ण पंक्ति गुंजायमान थी.....नारी तुम नारायणी.......हाहा हाहा। बलात्कार जैसे अमानुषिक घटनाएं.....तो अब दिनचर्या की खबर बन गयी है।नियति बन गयी है। नारायणी के लिए...…।

पिछले 26 जुलाई 2018 को लिखी गयी सीधी बात आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी उस दिन रही होगी। इसलिए अपने मूल आलेख में कोई रद्दोबदल नही करते हुए सरकार से है.........

सीधी बात 

डिजिटल इंडिया का 'भारत' !!

पिछले ही वर्ष 19 अक्टूबर 2017 में झारखण्ड में एक लगभग 9 वर्ष की लड़की भात- भात कहते हुए मर गयी, 21 अक्टूबर 2017 को एक रिक्शा वाला भूख से तड़प-तड़प कर मर गया और आज उस घटना के 08 माह के भीतर ही दिल्ली की तीन छोटी मासूम बच्चियां भूख से तड़प-तड़प कर मर गयी, (हमारे संवेदनशील समाचार पत्र ने इसे अंतिम पन्ने की खबर बनाया है) यह उस सभ्य समाज एवं मानवता के चेहरे पर जोरदार थप्पड़ है जो रोज डिजिटल इंडिया की पैरोकार बने फिरते हैं।

देश में व्यापक पैमाने पर गरीबी और भुखमरी फैली हुई है। केन्द्र एवं राज्य सरकार की जि‍तनी भी योजनाएं गरीबों के लि‍ए हैं वे नौकरशाही और दलीय स्वाीर्थ की बलि‍ चढ चुकी हैं। बंदरबांट के कारण राज्य में खाद्य का पर्याप्त भंडार होने के बावजूद सही वि‍तरण व्यवस्था को राज्य-सरकारें अभी तक सुनिश्चित नहीं करा पायी है।

आजादी के 70 वर्षों के बाद भी देश में अन्न के समुचित भण्डारण की व्यवस्था नहीं उपलब्ध कराई जा सकी है, जिसके अभाव में बारिश के पानी से ज्यादातर अन्न या तो सड़-गल जाते हैं या फिर उसे सरकारी उपक्रमों द्वारा जानबूझ कर सडा दिया जाता है ताकि बंदरबांट के माध्यम से उसे सड़े हुए अनाज को शराब बनाने वाली बड़ी मछलियों को आसानी से सौंप दी जाय। शायद ही आपको जानकारी हो कि जिस जुट के बोडे में हमारे कच्चे खाद्यान को संगृहीत किया जाता है वह भी हमारे पास बांग्लादेश से बन कर आती है, इसी विकास की रफ्तार पर हम सुपर पवार बनने का मिथ्या ख्वाब पाल रखे हैं..... या हमें भरमाया जा रहा है। 

आज हम विभ्रम के दौर से गुजर रहे हैं। भारत का मध्यवर्ग अपनी पतनोन्मुखी भूमिका में आ गया है। यह वर्ग 'करप्सन' को 'कर प्रसन्न' कहता है। घूस की रकम को 'स्पीड मनी' बताता है। सरकारी कर्मचारी प्रति वर्ष अरबों रुपया घूस के रूप में डकार जाते हैं। न्याय के मंदिर में बैठे देवता प्रति वर्ष करोडो रुपए नजराने के तौर पर पाते हैं।

इस वर्ग के आराध्य त्रिदेव- नेता, अफसर और सेठ- कितने भ्रष्ट हैं, इसका अनुमान लगाना असंभव है। पानी में रहकर मछली कितना पानी पी जाती है, इसका आकलन करना तो संभव हो सकता है लेकिन इस त्रिमूर्ति के भ्रष्टाचार की थाह तो ब्रह्मा-विष्णु-महेश भी नहीं पा सकते। भारत की सिविल सोसाइटी पर इसकी अजगरी जकड़न है। भारत में मजदूरों की संख्या, 2001 की जनगणना के अनुसार 40.2 करोड़ है। शहरों में ये मजदूर गंदी बस्तियों में रहते हैं। कुल शहरी आबादी का 25 प्रतिशत स्लम्स में रहता है। आज भी देश में 30 करोड़ लोग गरीबी की रेखा के नीचे हैं। इस वर्ग की प्रति व्यक्ति आय एक डालर प्रतिदिन से कम है। अगर इसमें दो डालर प्रतिदिन कमाने वालों को शामिल कर लें तो देश में इन लोगों की कुल संख्या 60 करोड़ के आसपास होगी।

अर्जुन सेन गुप्ता आयोग के अनुसार 84 करोड़ लोगों को प्रतिदिन 20 रुपए भी नहीं मिलते। 34 करोड़ लोगों को दो दिन में एक बार खाना नसीब होता है।

आज भारत दुनिया के सबसे अधिक गरीब, अशिक्षित और कुपोषित लोगों का देश बन गया है। 25 करोड़ लोग हर दिन भूखे पेट सोते हैं। हर तीसरी महिला शारीरिक रूप से कमजोर है। 5वर्ष से कम आयु में कम वजन के बच्चों में 40 प्रतिशत भारतीय हैं। इस वर्ग के 5 करोड़ 70 लाख बच्चे कुपोषित हैं। यदि इसे प्रतिशत में (48) देखा जाए तो यह इथियोपिया (47) से भी अधिक है। दुनिया में क्षय रोग (टी.बी.) के सबसे अधिक 4 करोड़ मामले भारत में हैं। विश्व में स्कूल न जाने वाले कुल 15 करोड़ बच्चों में से 13 करोड़ भारतीय हैं। सात भारतीय महिलाओं में से छह अशिक्षित हैं। 64 करोड़ भारतीयों के पास शौचालय की सुविधा नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक तनाव लोगों के प्राण ले रहा है। शहरों की स्थिति कोई अच्छी नहीं है। झुग्गी-झोपड़ियों और अवैध कब्जों पर बनाई गई बस्तियों की बढ़ती तादाद शहरों के नारकीय जीवन को प्रतिबिंबित करने के लिए काफी है। 10 करोड़ लोगों को झुग्गी-झोपड़ी भी नसीब नहीं है, ये बेघर लोग हैं। सड़क, फुटपाथ, स्टेशनों, पार्कों, पुलों के नीचे और रेलवे पटरियों के पास रहते हैं।देश के खाद्यान्न और शाक-सब्जियों का 40 प्रतिशत भाग खेत से उपभोक्ता तक पहुंचने के दौरान बर्बाद हो जाता है।''

असली भारत बेरोजगारी, गरीबी, भुखमरी से पीड़ित रहने वाला कुपोषण का शिकार बीमार भारत है। कुपोषण से 45 प्रतिशत बच्चे भयंकर रूप से पीड़ित हैं और 60 फीसद का वजन उनकी आयु के अनुपात से कम है। यही हाल महिलाओं का है। पर्याप्त पोषण के अभाव में प्रतिवर्ष लाखों गर्भवती महिलाएं रक्त की कमी के कारण मृत्यु का शिकार होती हैं।

नौजवानों के स्वास्थ्य की स्थिति संतोष जनक नहीं है। देश में करोड़ों व्यक्ति निराश्रित हैं, जिनमें से 39.2 प्रतिशत शारीरिक रूप से विकलांग हैं। 29.9 प्रतिशत क्षय, दमा, कैंसर आदि से पीड़ित हैं। 11 प्रतिशत लोग मानसिक रोगों के शिकार हैं। इन निराश्रितों का पांचवां हिस्सा दान एवं भीख पर आश्रित है। बाकी लोग या तो रद्दी इकट्ठा करते हैं या मामूली चोरी-चकोरी, गिरहकटी, उठाई गीरी और वेश्यावृत्तिा से पेट पालते हैं।

इन सब परिस्थितियों के पश्चात देश में भूख से होने वाली मौंते हमारे अंतर्चेतना को बहुत ज्यादा झझकोरती नहीं हैं क्यूंकि शहरों में हम शुतुरमुर्गी जिंदगी जीने के आदि हो गए हैं। समस्याए या तो हमें दिखती नहीं हैं या हम देखना ही नहीं चाहते हैं।

बहुत बचपन में जब मैं कक्षा 5 या 6(1980-81) का छात्र था जमशेदपुर स्थित आर्य समाज विद्यालय का तब विद्यालय आने-जाने के क्रम में प्रायः देखा करता था एक व्यक्ति टिस्को कंपनी के उस नाले के पास बैठ कर चावल के दाने को चुन चुन कर अलग करता रहता था जो पानी के साथ बह कर मुख्य नाले की तरफ बहा करती थी, संभवतः वह पानी या तो टिस्को कंपनी के कैंटीन से या उस स्थान से बहते हुए निकलती थी जहाँ या तो लोग खाना खाते थे या बर्तन धुलता था। उस समय न मुझे कुपोषण का अर्थ पता था न भुखमरी की परिभाषा। उस समय के भारत और आज के डिजिटल इंडिया(अब बुद्धिजीवी लोग इसे न्यू इंडिया भी कह रहे) में मुझे तो कोई खास सामाजिक परिवर्तन नहीं दिख रहा है यद्धपि तकनीकी परिवर्तन अवश्य हुए हैं।

भूख से मौत होने और उसको सरकार द्वारा झुठलाने का मामला नया नहीं है। वो तो भला हो मीडिया का जो समय समय पर समाज व सरकार को आईना दिखाता रहता है।

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