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काबिल वही, जो आज से बीस साल आगे देखें

Bhola Tiwari Jul 09, 2019, 5:19 AM IST टॉप न्यूज़
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 प्रवीण झा

आज यूरोप के कुछ देशों में उच्च शिक्षा चयन का आखिरी दिन है। भारत में भी कमोबेश समय यही है। यह एक महत्वपूर्ण घड़ी है, जब एक विषय या विधा चुननी है। यहाँ लगभग दस प्रतिशत लोग अपना विकल्प नहीं चुन रहे, अगले साल चुनेंगे। भारत में भी अनिश्चितता बनी रहती है।इसका मूल सूत्र जो तमाम लोग कहते हैं कि अपना इंटरेस्ट चुनो। यह बड़ा ही सतही सुझाव है, लेकिन अच्छा सुझाव है। दूसरा सूत्र है कि वो चुनो, जिसमें स्कोप हो। अब स्कोप भी एक बड़े टाईम-फ़्रेम में रख कर सोचना होगा। पाँच-छह साल बाद शिक्षा खत्म होगी, उसके दस साल बाद किसी मुकाम पर पहुँचे, और पता लगा कि स्कोपे गायब।

काबिल वही है, जो आज से बीस साल आगे देखता है। तीस वर्ष पूर्व, जब सब विज्ञान पढ़ रहे थे, एक काबिल लड़का वाणिज्य चुनता है। ध्यान दें कि लड़का काबिल था। विज्ञान को लात मार वाणिज्य चुनता है, इसलिए नहीं कि और कोई विकल्प नहीं था। जाहिर है, वहाँ उस वक्त उतनी भीड़ नहीं थी, वो तेजी से सीढ़ियाँ चढ़ता गया। उसके विज्ञान पढ़ने वाले मित्र भीड़ में खो गए। यह तो बस उदाहरण है। 

मैं जब यमुना-पार रहता था, तो हर बुजुर्ग को कहते सुनता कि जब हम यहाँ आए, यहाँ कोई न रहता था। अब देखो। अट्टालिकाएँ बन गयी। यही जज़मेंट व्यवसाय में भी रखनी चाहिए। यह नहीं कि भेड़धसान में घुस गए। 

कैरियर ऑप्शन : सदाबहार विकल्प

स्वास्थ्य, उत्पादन और शिक्षण को मूलभूत और अपेक्षाकृत स्थाई सेक्टर माना गया है। हालांकि आर्थिक मंदी का प्रभाव इन पर भी पड़ेगा। पर बीस क्या, सौ वर्ष बाद भी किसी न किसी रूप में यह तीनों जॉब रहेंगे ही। इसलिए यह सदाबहार विकल्प माने गए हैं। सर्वोत्तम नहीं, सदाबहार।

अभी जब आर्थिक मंदी और ‘कॉस्ट-कटिंग’ की शुरूआत यूरोप में हुई, तो प्रॉडक्शन-यूनिट फिर भी बच गई। छँटनी प्रबंधन और सहायक यूनिटों की पहले हुई। हालांकि उत्पादन घटा तो वहाँ भी कैंची चली, पर उत्पादन शून्य होना तो अंत ही है। जरूरतें बदल सकती है, पर उत्पादन कुछ-न-कुछ होता रहेगा। इसको सीधे शब्दों में कहूँ तो जैसे मेकैनिकल या इन्डस्ट्रियल (इलेक्ट्रिकल/केमिकल) इंजीनियर जो किसी समय कम लोग बनना चाहते, वो सदाबहार बच गए। आगे भी रहेंगे। 

स्वास्थ्य-सेक्टर भी भौगोलिक सीमा से परे सदाबहार रहा है। विश्व के किसी कोने, किसी गाँव में भी इसका कुछ अंश मिल ही जाएगा। विश्व में सबसे अधिक मैनपॉवर इसी सेक्टर को चाहिए। हम सब कुछ ऑटोमेट कर लें, पर नर्सिंग में फंसे ही रहेंगे। एक साधारण और प्रायोगिक विकल्प था कि दवाई की दुकान के बदले ATM हो। डॉक्टर का खास प्रिस्क्रिप्शन कोड दबाते ही और क्रेडिट कार्ड स्वाईप करते ही दवा निकल कर आ जाएगी। लगभग फूलप्रूफ़। पर समस्या है कि यहाँ ‘लगभग’ की गुंजाइश नहीं। इसलिए एक मनुष्य तो रखना ही होगा, जो दवा चेक कर ले।

ठीक वैसे ही शिक्षण-सेक्टर पूरी तरह बंद होना कठिन है। वो किसी न किसी रूप में सौ वर्ष बाद भी रहेगा ही। 

इन तीनों को मैं सबसे कमाऊ सेक्टर नहीं, सबसे सुरक्षित सेक्टर ही कह रहा हूँ। इसमें एक-दूसरे से प्रतियोगिता हो सकती है, पर इनका शून्य हो जाना या खत्म हो जाना अगले कई दशकों तक नहीं नजर आता।

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