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सड़क बनती है मगर बाढ़ बिकती है

Bhola Tiwari Jul 08, 2019, 7:42 AM IST टॉप न्यूज़
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 दिनेश मिश्रा

सुना है बिहार सरकार तटबंधों, ख़ासकर बागमती नदी के तटबंधों, को ऊंचा करने पर गम्भीरता से विचार कर रही है। उसने 1987 और 2008 की बाढ़ के बाद यह काम पहले भी किया है।

1987 की बाढ़ के बाद कोसी के तटबंधों को नवहट्टा से कोपड़िया के बीच 6 फ़ुट यह कह कर ऊंचा किया गया था कि तटबंधों के अंदर नदी की पेटी ऊपर उठ रही है जिससे उसकी पानी को बहा कर ले जाने की क्षमता घट गई है। 6 फुट ऊंचा कर देने पर इस समस्या का निदान हो जाएगा।

उस वक्त जो फ़्लड मानिटरिंग के प सुपरिंटेंडिंग इंजीनियर थे उनसे मैंने एक दिन पूछा था कि दिल्ली आइ.आइ.टी. ने तटबंधों के अन्दर 1962 और 1974 में बालू के जमाव का अध्ययन किया था। इस अध्ययन के अनुसार महिषी से कोपड़िया के बीच तटबंधों के बीच नदी की पेटी प्रति वर्ष 5 इंच के हिसाब से ऊपर उठ रही है। यह अगर सच है, और सच न होने की कोई वजह भी नहीं है, तो 1963 से लेकर अब तक यानी 1988 तक नदी की पेटी 125 इंच ऊपर उठ चुकी होगी। यानी नदी की पेटी उठी करीब ग्यारह फ़ुट ऊपर होगी और बांध ऊंचा होगा 6 फ़ुट तो फिर आप तटबंध को 6 फ़ुट ऊंचा करके क्या हासिल कर पाएंगे? उनके पास इसका कोई जवाब नहीं था। उन्होंने अपने टेकनिकल ऐडवाइज़र को बुलवा कर कहा कि इनके सवाल का जवाब दीजिये। उनके पास भी इसका जवाब नहीं था। तब एस.ई. साहब का कहना था कि , 'लोग आपकी रिपोर्ट अब पढ़ने लगे हैं, इसको ठीक करवाइये।'

सवाल यह है कि तटबंध ऊंचा कर देने मात्र से क्या नदी में पानी आना कम हो जाएगा? जवाब है नहीं। क्या नदी के पानी में बालू की मात्रा कम हो जाएगी, इसका भी जवाब है, नहीं। क्या तटबंध ऊंचा करने से कंट्री साइड में जल-जमाव कम हो जाएगा इसका भी जवाब है नहीं। और अंत में, क्या कोई भी इंजीनियर इस बात की गारंटी दे पाएगा कि उसका बनाया हुआ तटबंध कभी टूटेगा नहीं, जवाब फिर होगा नहीं। अब तटबंध बन भी जाय तो क्या फ़ायदा होगा। तटबंध ऊंचा बन जाने कर आवाजाही में कुछ सहूलियत तब तक के लिए जरूर होगी जब तक तटबंध सलामत रहता है। सड़क बनती है मगर बाढ़ बिकती है जिसे बनाने वाले मुँहमाँगे दामों पर बेचते हैं। मौसम शुरू होने वाला है। इंतजार कीजिए।

तटबंधों का टूटना एक शाश्वत सत्य है। वह बनेगा तो टूटेगा जरूर। सवाल सिर्फ़ कब और कहाँ का ही बच जाता है। 1987 में बिहार की नदियों के किनारे के तटबंध 104 स्थानों पर टूटे थे जिनमें से 77 जगहों पर असामाजिक तत्वों यानी जनता ने काटे थे और बाकी 27 जगह तत्कालीन सरकार ने अपना सामाजिक दायित्व निभाते हुए टूटने दिये थे। तब से अब तक यह तटबंध लगभग 400 स्थानों पर टूट चुके हैं।

बाढ़ नियंत्रण को लेकर बिहार में अब कोई बहस नहीं होती। तटबंध गले में बँधे वो साँप हैं जो न भी काटें तो भी उनका आतंक बना ही रहता है। कुछ नहीं तो उनकी फुफकार तो बर्दाश्त करनी ही पड़ेगी। बाढ़ पर बहस अगर होती भी है तो रिलीफ को लेकर। रिलीफ़ एक अलग स्कैंडल है जिस पर अलग से चर्चा होनी चाहिए।

कुसहा में 2008 में तटबंध टूटा था उसकी चपेट में पाँच जिँलों के 35 प्रखंडों की करीब 33 लाख की आबादी आई थी। ग्यारह हज़ार गाँव उसमें फँसे थे और 587 लोग और हज़ारों जानवर मारे गये थे। तब भी कोसी के तटबंधों को ऊंचा किया गया था और सरकार ने तीस साल तक निश्चिंत रहने का वायदा किया था।। उम्मीद की जानी चाहिए कि नदी आने वाले 20 वर्षों तक हमारी सरकार का कहा मानेगी।

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