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अंगरेजी में सोचना बंद करें

Bhola Tiwari Jul 08, 2019, 7:30 AM IST टॉप न्यूज़
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दिनेश त्रिनेत

वक्त के साथ चलना है तो अंगरेजी में सोचना बंद करना होगा। अंगरेजी में सोचने की बीमारी अगले कुछ सालों में बढ़ेगी और उसके नतीजे हास्यास्पद और बेवकूफियों से भरे होंगे। पिछले 20-30 सालों में प्रादेशिक स्तर पर शिक्षा की ऐसी दुर्दशा हुई है कि उसने अपनी भाषा में सोचने-पढ़ने की परंपरा को लगभग नष्ट होने के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है। मध्यवर्ग अपने बच्चों को 'गिटपिट फैक्टरी' से निकली उस भीड़ में धकेल रहा है जो न तो ठीक से हिन्दी जानती है, न अंगरेजी और ही अपनी देशज भाषा। 

दरअसल भाषा सिर्फ संप्रेषण का जरिया नहीं है, वह सोचने और समझने का टूल भी है। वह यथार्थ को समझने का माध्यम भी है। भाषा गहरे जातीय अनुभवों से होकर आकार लेती है। यदि हम भाषा को नहीं जानते तो अपने आसपास और अपने जातीय अनुभवों से भी वंचित रह जाते हैं। हम एक अजनबी भाषा में अपने यथार्थ और अनुभव को नहीं देख-परख सकते। 

जब हम हिन्दी भाषी अपनी खुद की भाषा की क्लिष्टता पर चौंकते हैं या हंसते हैं तो यह बात और प्रासंगिक हो जाती है। वास्तव में हम भाषा अंगरेजी की गढ़ रहे होते हैं और उस पर हिन्दी का मुलम्मा चढ़ाना चाहते हैं। जब नतीजे हास्यास्पद होते हैं तो दोष हिन्दी को देते हैं कि आज की जेनरेशन हिन्दी नहीं समझती। भाषा को अपनी ताकत अपनी स्मृतियों से मिलती है और ताजगी अपने वर्तमान से निरंतर संवाद करने से। सारे टीवी चैनल आज हिन्दी में हैं। दक्षिण की फिल्में हिन्दी में डब करके दिखाई जाती हैं। भारतीय गाने अफगानिस्तान, चाइना और जापान तक में पॉपुलर हैं। 

आज की पीढ़ी हिन्दी नहीं समझती तो गुलजार की लोकप्रियता का क्या करें? सलीम-जावेद के डॉयलॉग को कहां ले जाएं? अब देखिए की गुलजार किस तरह लोगों से कनेक्ट होते हैं। वे धूल-मिट्टी से सने शब्द उठाते हैं और फिर बड़े करीने से किसी कारीगर की तरह उसे हल्की छांट-तराश के साथ अपने गीतों में पिरोते हैं। "दिल हूम हूम करे" और :चप्पा चप्पा चरखा चले" जैसे उदाहरण जाने कितने हैं। बताने की जरूरत नहीं।  

भारत में अंगरेजी अब गुलाम मानसिकता और जहालत का अवशेष भर है। ब्रिटिश अंगरेजी की नफासत कब की खत्म हो चुकी है और यूनीवर्सिटी के कुछ बूढ़े प्रोफेसरों के गले में मेडल की तरह लटक रही है। ग्लोबल इंग्लिश, इंटरनेट वाली इंग्लिश अपनी ऊर्जा दूसरी भाषाओं से ग्रहण कर रही है। भला हो बॉलीवुड का कि आज की तारीख में लगभग पूरा भारत हिन्दी समझता है मगर अभी भी एक जिद के तरह अंगरेजी को देश में कनेक्टिविटी की भाषा के तौर पर स्थापित करने का प्रयास किया जाता है। 

देश को संचालित करने वाली ताकतें अब अंगरेजी से नहीं अपनी क्षेत्रीय भाषागत ताकत के दम पर आ रही हैं। चाहे राजनीति हो या कारोबार। वहीं अंगरेजी माध्यम से पढ़ लोग अच्छे नौकर बन रहे हैं। जो साफ्टेवयर पर इनोवेशन नहीं दोयम दर्जे का काम करके दुनिया को सस्ते मजदूर का प्रलोभन भले दे रहे हों मगर इस अंगरेजी पढ़ी पीढ़ी की रचनात्मक ऊर्जा लगभग खत्म है। वह न अपने आसपास को समझ पा रही है न कुछ नया रच पा रही है। ये डिकेंस और एलियट को नहीं जानते। अंगरेजी इनकी ताकत नहीं, इनकी सीमा है। इनकी लाचारगी है। वह उन्हें दोयम दर्जे के फिक्शन, सिनेमा और नॉलेज का एक्सेस दे पाती है।

ब्लैक लिटरेचर ने अपनी स्मृतियों को जीवंतता देने के लिए खुद की भाषा में साहित्य रचने पर जोर दिया। दुनिया के महान उपन्यासकार सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं से नहीं आते। सन् 1978 में साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार पाने वाले इसाक बेशविस सिंगर यहूदी भाषा में लिखते थे जिसे बोलने वाले सिर्फ दो लाख लोग बचे हैं। भाषा की ध्वनियों और लय में भी किसी समाज की सामूहिक चेतना के स्वर मौजूद रहते हैं। तो अंगरेजी में सोचना बंद करें। धूल-मिट्टी, पसीने से लथपथ भाषा ही जिंदा रहेगी क्योंकि उसमें ही ऊर्जा है।

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