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जंग टलती रहे तो बेहतर

Bhola Tiwari Jul 07, 2019, 8:07 AM IST टॉप न्यूज़
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एस डी ओझा

9 अप्रैल 1965 को भारत और पाकिस्तान आपस में भिड़ गये थे । शुरूआत कच्छ से हुई । कच्छ का यह इलाका बहुत हीं सुनसान था । इधर चरवाहे गधे चराने के लिए आते थे । कभी कभार कोई गश्ती पुलिस दल यहां से होकर गुजर जाता था । ऐसे हीं एक गश्ती पुलिस दल को पाकिस्तान द्वारा 18 किलोमीटर लम्बी कच्ची सड़क बनाने का पता चला था । यह सड़क कहीं कहीं भारत की सीमा के अंदर भी एक से डेढ़ किलोमीटर पैठ करती थी । पहले फ्लैग मीटिंग हुई । जब कोई हल नहीं निकला तो भारत ने एक कंजर कोट में नयी चौकी खोल दी । इस चौकी का नाम सरदार चौकी रखा गया ।

कच्छ का इलाका पाकिस्तान के लिए सुगम और भारत के लिए दुर्गम था । पाकिस्तान ने दो बजे दिन को मोर्टार और मशीनगन से हमला कर दिया । यह हमला बहुत हीं जोरदार था , जिसका सामना भारत के मुट्ठी भर सैनिक नहीं कर सकते थे । लिहाजा भारतीय सैनिकों ने सरदार चौकी छोड़ दी । उन्होंने दो मील पीछे विजियोकोट में आकर मोर्चा ले लिया । 14 घंटे बाद सीज फायर हुआ । पाकिस्तानी सैनिक लौट गये । भारतीय सैनिक फिर से सरदार चौकी पहुंच गये । फिर " जैसै थे " वाली पोजीशन हो गयी। 

फिर पाकिस्तान ने छम्ब की तरफ से हमला किया । छम्ब क्षेत्र में भी हमारी पोजीशन ठीक नहीं थी । यह भी दुर्गम क्षेत्र था हमारे लिए । छम्ब हमारे हाथ से निकल गया । इस क्षेत्र में मेजर भूपेन्द्र सिंह फिलौरा ने अद्भुत साहस का परिचय दिया था । उन्हें वीर चक्र से सम्मानित किया गया । जब प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री हाॅस्पिटल में उनसे मिलने पहुंचे तो भूपेन्द्र सिंह फिलौरा की आंखों में आंसू आ गये । यह देख शास्त्री जी ने कहा कि ऐसे वीर पुरुष का रोना ठीक नहीं । फिलौरा ने स्पष्ट किया कि वे इसलिए रो रहे हैं कि वे घायल होकर विस्तर पर पड़े हैं और अपने प्रधान मंत्री को सैल्यूट तक नहीं मार सकते । बाद के दिनों में हमारे सैनिक जम कर छम्ब क्षेत्र में लड़े और अपनी ज्यादा से ज्यादा जमीन छुड़ाने में कामयाब हुए ।

ऐसे हीं एक वीर पुरुष थे कर्नल तारा पोर । कर्नल तारा पोर ने अपने मातहत मेजर चीमा को निर्देश दिया था कि यदि उनकी मृत्यु हो गयी तो उनकी प्रेयर बुक उनकी मां को , अंगूठी उनकी पत्नी को और पेन उनके पुत्र को सौंप दिया जाय । साथ हीं यह भी कहा था कि उनका दाह संस्कार युद्ध स्थल में हीं किया जाय । वे अपनी इस अंतिम इच्छा के व्यक्त करने के 05 दिन बाद पाकिस्तानी टैंक के एक गोले के शिकार हो गये । उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से नवाजा गया । उन्हें युद्ध स्थल पर हीं जलाया गया । चिता से उठता धुआं भारत की लोकेशन बता रहा था । पाकिस्तान उस लोकेशन पर गोलीबारी भी कर रहा था । उसी गोलाबारी के बीच कर्नल तारा पोर की अन्त्येष्टि हुई । एक जांबाज की अंतिम इच्छा तहे दिल से पूरी की गयी ।

वर्की मोर्चे पर पाकिस्तान के मेजर अजीज भट्टी भी 05 दिन तक भारतीय सेना का मुकाबला करते रहे थे । वे मुकाबले में हरदम आगे रहे । आखिर में उन्हें भारतीय टैंक का एक गोला लगा । वे शहीद हो गये । उन्हें मरणोरांत निशान ए हैदर प्रदान किया गया था । भारतीय ब्रिगेडियर कंवलजीत सिंह ने मेजर भट्टी की भूरी भूरी प्रशंसा की थी । उनका टैंक से फायर बिल्कुल एक्युरेट जगह पर गिरता था । लगता था कि उधर का ऑफिसर सही डिग्री में भारतीय लोकेशन की स्थिति बता रहा था और इधर टारगेट बरबाद हो जाता था ।

अब भारतीय सेना ने लाहौर की तरफ कूच करने का फैसला लिया । यह फैसला भी लीक हो गया , लेकिन पाकिस्तान ने इसे गम्भीरता से नहीं लिया । उसका मानना था कि भारत ने उनका ध्यान कच्छ व छम्ब से भटकाने के लिए ऐसा किया है । भारत बढ़ते बढ़ते लाहौर के नजदीक तक पहुंच गया । यही इस युद्ध का टर्निंग प्वांइट था । पाकिस्तान को लाहौर के जाने का डर सताने लगा । ताशकंद समझौता हुआ । दोनों सेनाएं अपनी अपनी जगह लौट गयीं । जो नुकसान हुआ दोनों तरफ का उसका व्यौरा नीचे दिया गया है । भारत के लिए यह युद्ध न तो 1962 का युद्ध था जिसके लिए उसे शर्मसार होना पड़े और न 1971 का युद्ध था जिसके लिए जीत का उन्माद मनाया जाय ।

इस युद्ध का फायदा यह हुआ कि पाकिस्तान को अपनी औकात का पता चल गया । जिस पैटन टैंक पर पाकिस्तान को नाज था , उसके अब्दुल हमीद जैसे रणबांकुरों ने परखचे उड़ा दिए । इसी से त्रस्त होकर पाकिस्तान के सर्वोच्च सैनिक शासक अय्यूब खां ने एक मीटिंग में कहा था कि 50 लाख कश्मीरियों के लिए हम अपने 10 करोड़ पाकिस्तानियों की बलि नहीं चढ़ा सकते । 22 दिन तक चलने वाली यह लड़ाई ताशकंद समझौते के साथ खत्म हो गयी । जो जहां था फिर वहीं पहुंच गया , पर दोनों तरफ से अपार जन धन की हानि हुई। अंत में साहिर लुधियानवी की एक नज्म यहां दी जा रही है -

टैंक आगे बढ़ें या पीछे हटें ,

कोख धरती की बांझ होती है ।

फतह का जश्न हो या हार का सोग,

जिंदगी मय्यतों पर रोती है ।

इसलिए ऐ शरीफ इंसानों !

जंग टलती रहे तो बेहतर है ।

आप और हम सभी के आंगन में , 

शम्मा जलती रहे तो बेहतर है ।

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