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स्वर्ग किसे चाहिए ?

Bhola Tiwari Jul 07, 2019, 6:41 AM IST टॉप न्यूज़
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 दिनेश श्रीनेत

स्वर्ग की परिकल्पनाएं मनुष्य की सबसे निकृष्ट सोच का नतीजा हैं। ये हमारी दुनिया से परे किसी और दुनिया का वर्णन करती हैं और हमारी अतृप्त इच्छाओं को कल्पना में साकार करती हैं। कोई भी धर्म हो- उसमें बयान किेए गए स्वर्ग, जन्नत या पैराडाइज़ हों- उसकी परिकल्पना में मनुष्य की उन्हीं वासनाओं को जगाया जाता है, जिनका हमारे धर्म जीवन भर निषेध करने का प्रवचन देते हैं। यानी मन के भीतर लालसा, वासना, कामना भरी होती है, लेकिन हम जीवन में उसे नकार रहे होते हैं। शायद यही वजह है कि बहुत ज्यादा धार्मिक लोग ज्यादा पाखंडी होते हैं। वे विरोधाभासी विचारों का पुतला होते हैं। उनके विचारों में निरंतर दोगलापन और अवसरवादिता नजर आती है। 

वास्तविक संसार का निषेध करके किसी और दुनिया के प्रति भरोसा कायम करना ही दरअसल इंसान द्वारा रचा गया सबसे बड़ा झूठ है। जब तकनीकी और तर्क का प्रवेश हमारे जीवन में हो चुका हो तो यह झूठ सिर्फ स्वर्ग के लिए नहीं रचा जाता है। स्वर्ग जैसी व्यवस्थाओं को रचने का स्वप्न तैयार किया जाता है। 

दुनिया में कभी कोई आदर्श स्थिति होगी यह भी एक झूठ है। खुद से बोला गया झूठ, जिसे हम सब भीतर ही भीतर जानते हैं। 

इनसान आदर्शोन्मुख हो सकता है, मगर कोई ऐसी व्यवस्था नहीं हो सकती, जहां सारे द्वंद्व मिट जाएंगे। लेकिन राजनीतिक विचारधाराएं मसीहा बनकर एक आदर्श संसार का स्वप्न दिखाती हैं। वे हमारे वास्तविक संसार से हमें दूर ले जाकर कल्पनालोक में भ्रम रचती है। इनसान को स्वर्ग नहीं चाहिए। वह ईश्वर से अलग ही इसी शर्त पर हुआ था। 

वह अपनी चेतना को किसी ईश्वर का गुलाम नहीं बनाकर रखना चाहता था। 

मिल्टन के 'पैराडाइजड लॉस्ट' में शैतान ने ईश्वर की सत्ता के खिलाफ विद्रोह किया था। वह इस सृष्टि का पहला विद्रोही था। उसी ने सर्प बनकर निषिद्ध फल को चखने का लालच दिया था। वह ईव थी जिसके भीतर अपने लिए चेतना जगी और उसने एडम को भी प्रेरित किया। वे स्वर्ग से निष्कासित हुए मगर खुशी-खुशी। उन्हें अपना एक संसार बसाना था। 

स्वर्ग से बाहर होना इनसान की असफलता नहीं सफलता थी। 

स्वर्ग या स्वर्ग जैसी कोई भी व्यवस्था परजीवी होती है। उसकी बुनियाद अत्याचार और भेदभाव पर टिकी होती है। एचजी वेल्स के उपन्यास 'टाइम मशीन' का नायक हजारों साल बाद की एक आदर्श दुनिया में पहुंचता है। जहां न किसी को कोई काम करने की जरूरत है, न उनकी जिंदगी में कोई तकलीफ है। लेकिन धीरे-धीरे उसके सामने इस स्वर्गिक व्यवस्था के पीछे का अंधेरा सामने आता है। उपन्यास एक वर्ग संघर्ष को सामने लेकर आता है। जहां दो वर्ग मोरलॉक्स और इकोई हैं। एक शोषक है और दूसरा शोषित। 

इस दुनिया में अगर कभी कोई स्वर्ग होता तो वह हमेशा शोषण पर आधारित होगा। चाहे वह एक राष्ट्र हो या सर्वहारा का अधिनायकवाद हो या पूंजीवाद के चरम से फूटती खुशहाली। 

प्रकृति सहअस्तित्व पर टिकी है। दिल धड़कता है और थम जाता है। जीने के लिए हम हर पल सांस लेते और छोड़ते हैं। आदर्श व्यवस्था वही होगी जहां पर हम कुछ पाने के बदले कुछ देना चाहेंगे या कुछ नहीं पाने पर भी बहुत कुछ देना चाहेंगे। खुद से, अपनी दुनिया से, अपनी छोटी-छोटी इच्छाओं से, अपनी वासनाओं से प्यार करेंगे। कपटी लोगों द्वारा रची गई किसी काल्पनिक दुनिया के मायाजाल से दूर रहकर।  

हमें वह धरती चाहिए जिस पर हम और हमारी आने वाली पीढ़ियां अपनी मृ्त्यु से पहले हँस सकें, नृत्य कर सकें, गा सकें, अपने ही जैसे किसी अन्य इनसान से प्रेम कर सकें। 

हमें स्वर्ग नहीं चाहिए!

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