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देख लो... आज हमको जी भर के

Bhola Tiwari Jul 06, 2019, 7:37 AM IST टॉप न्यूज़
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 दिनेश श्रीनेत

धीरे-धीरे गहराती उदासी में अगर थोड़ी सी शोखी और तंज़ घोल दिया जाए? कुछ अजीब सा कंट्रास्ट पैदा होगा न? एक विडंबना सी... फिल्म 'बाज़ार' का गीत "देख लो आज हमको जी भर के..." कुछ ऐसा ही है।

शायर मिर्जा शौक़ ने सीधे-सादे से शब्दों को यहां कुछ इस तरह से पिरोया है कि हर शब्द आपके मन को छूता हुआ निकल जाता है। इसे गौर से सुनें। इसके हर शब्द में एक किस्म की उलाहना है। "देख लो... आज हमको जी भर के, कोई आता नहीं है फिर मर के"। यह एक ऐसे इनसान को संबोधित है जो किन्ही वजहों से मजबूर है और जैसे उसकी मजबूरियों को शरारतन छेड़कर उसे रुलाया जा रहा है। 

सुर्ख़ जोड़े में सजी-धजी, आंखों में काजल लिए शबनम (सुप्रिया पाठक) सिरजू से आख़िरी बार मिलने आई है। तमाम खूबसूरती के बावजूद उसकी आंखों में एक किस्म की कातरता है। यहां भी कंट्रास्ट है। सिरजू (फारुख़ शेख) के बाल बिखरे हैं, शेव नहीं बनी, कमीज के बटन टूटे हैं, आंखे ऐसी हैं जैसे कितने दिनों से सोया नहीं। 

शबनम उससे सीधे पूछती है, "मैंने तुमको बरबाद कर डाला न?"

सिरजूः तुम मेरी जिंदगी को नए मानी दिए... नहीं तो क्या था इसमें?

शबनमः हम और तुम अगर गरीब न होते तो हमको कोई जुदा नहीं कर सकता था... है न?

सिरजूः हां, फिर हमको कोई जुदा नहीं कर सकता था...

शबनमः मुझे तुम्हें एक बार दूल्हा देखने की बड़ी ख्वाहिश थी.. देखो तो! नसरीन कैसे रो रही है हमारी शादी पर... जैसे हमारे मातम में आई हो।

शबनम (थोड़ा ठहरकर) हमें इजाजत दीजिए... मेरी नेकी, मेरी इज्जत, मेरी गरीबी का वास्ता हमें भूल जाइए। 

एक बात याद रखो सिरजू अगर हम तुम्हारे न हो सके तो... 

इसके बाद गीत शुरु होता है। 

देख लो आज हमको जी भरके

कोई आता नहीं है फिर मरके

हो गए तुम अगरचे सौदाई

दूर पहुँचेगी मेरी रुसवाई 

जगजीत कौर की आवाज ने इसमें कुछ ऐसा ही कंट्रास्ट पैदा कर दिया है। ख़य्याम ने इस सिचुएशन के लिए उनकी आवाज चुनकर इसे यादगार बना दिया है। जगजीत का तलफ़्फ़ुज़ बहुत अलग सा है। शायद इसी की वजह से उनकी आवाज में एक कच्चापन सोंधापन महसूस होता है। जगजीत ने बहुत कम लेकिन यादगार गीत गाये हैं - "तुम अपना रंज़ोगम अपनी परेशानी मुझे दे दो" भी उनका एक ऐसा ही यादगार गीत है। 'बाज़ार' में शायर बने नसीरुद्दीन शाह का एक संवाद है, "शादी जिस्म बेचने और खऱीदने का वो पेशा है जिसे कानून और समाज की हिमायत हासिल है।" इस पूरे गीत और सिचुएशन को उसी संवाद की रोशनी में देखा जा सकता है। यह सचमुच में एक थमे हुए वक्त का गीत है। आगे की पंक्तियां हैं- 

आओ अच्छी तरह से कर लो प्यार

के निकल जाए कुछ दिल का बुखार

इस गीत में मौजूदा वक्त को एक ऐसे आगत की रोशनी में देखा गया है, जो अवश्यंभावी है, क्रूर है। कुछ ऐसा है जो तय है। यदि हमें यह पता हो कि इस भविष्य को टाला नहीं जा सकता तो वर्तमान को देखने-बरतने का हमारा नज़रिया बदल जाएगा। शबनम (सुप्रिया पाठक) की आंखें एक निरीह मेमने जैसी लगती हैं, जिसे अगले दिन जिबह होना है, लेकिन अपने अंधेरे भविष्य के बावजूद वह मौजूदा वक्त के हर पल को जी लेना चाहती है। न सिर्फ अपने लिए बल्कि उस इनसान के लिए जिसे वह प्रेम करती है। और यहीं पर अपना प्रेम बरसाने के साथ वह थोड़ा सा छेड़ती भी है, सामने वाले थोड़ा दिल भी दुखा देना चाहती है। 

फिर हम उठने लगे बिठा लो तुम

फिर बिगड़ जाएं हम मना लो तुम

याद इतनी तुम्हें दिलाते जाए 

पान कल के लिए लगाते जाए 

कल किसी के न होने और सिर्फ उसकी याद बाकी रह जाने का ऐसा बयान कहां मिलता है? 


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