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30 साल बाद की दुनिया अलग होगी

Bhola Tiwari Jul 06, 2019, 7:26 AM IST टॉप न्यूज़
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कबीर संजय

आज से बीस-पच्चीस साल पहले मेरी जैसी औसत समझ वाले तमाम लोग चिंता करते थे कि दुनिया से अगर पेट्रोल खतम हो जाएगा तब क्या होगा। लेकिन, अब जाकर समझ में आया कि दुनिया का सारा पेट्रोल, कोयला और प्राकृतिक गैस अगर जला दी गई तो फिर यह इसकी चिंता करने वाला भी शायद कोई नहीं रहेगा। यह दुनिया ही खतम हो जाएगी।

फासिल फ्यूल यानी पेट्रोल, कोयला और प्राकृतिक गैस एक दिन समाप्त हो जाएंगे। इस बात से किसी को संदेह नहीं है। इसी कारण से इसके विकल्प की तलाश का काम भी सालों से किया जा रहा है। जबकि, इसके भंडारों पर कब्जे के षड्यंत्र भी तमाम किए जा रहे हैं। तेल के कुएँ पर कब्जे के लिए दुनिया ने युद्ध भी देखे हैं। अभी भी दुनिया की राजनीति के संचालन का काफी हिस्सा इसी फासिल फ्यूल से जुड़ा हुआ है। 

पृथ्वी के बनने-बिगड़ने के लाखों सालों के दौरान यह फासिल फ्यूल तैयार हुआ है। इसमें से कुछ तो ठोस होकर कोयला बन गया, कुछ गैस और कुछ द्रव होकर पेट्रोलियम। इसी को जलाकर हमारी दुनिया का सारा कार्यव्यापार चल रहा है। जिस गति से हम इसे जला रहे हैं उसी गति से हमारी दुनिया का तापमान भी बढ़ रहा है। 

अब समय आ गया है कि इस पर सोचा जाना चाहिए कि पहले फासिल फ्यूल खतम होगा कि पहले हमारी दुनिया खतम होगी। क्योंकि, दुनिया के तापमान में अगर दो डिग्री का भी इजाफा होता है तो समुद्र के किनारे रहने वाले तमाम शहर डूब जाएंगे। ऊंचे शिखरों पर जमी सारी बर्फ पिघल जाएगी। इनसे निकलने वाली नदियां सूख जाएंगी। सिंचाई और पेयजल के लिए इन पर आश्रित सारी सभ्यताएं तबाह हो जाएंगी। उपजाऊ मैदान रेगिस्तान में तब्दील हो जाएंगे। इस हरी-भरी दुनिया की शकल भूरी हो जाएगी। जिस गति से हम चल रहे हैं, उसमें यह अगले तीस सालों में ही होने वाला है। 

पर किसे फुरसत है। दुनिया भर में ऑटोमोबाइल सेक्टर के पूंजीपति भारी मुनाफा कमा रहे हैं। वे सबसे ताकतवर और प्रभावशाली कारपोरेट हैं। दुनिया भर की सरकारें इस लिहाज से नीतियां बनाती हैं कि उनके मुनाफे पर आंच नहीं आनी चाहिए। भले ही इसकी कीमत पर्यावरण और दुनिया के आम लोग चुकाते रहे। भले ही इससे दुनिया के खतम हो जाने का खतरा ही क्यों न उत्पन्न हो जाए। 

सोचिए, निजी परिवहन को हतोत्साहित करके सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देने में आखिर बाधा क्या है। क्यों नहीं कारों की खरीद-फरोख्त पर रोक लगा दी जाती। सरकार इस बात की जिम्मेदारी क्यों नहीं लेती कि आप जहां तक जाना चाहते हैं, वहां तक हम सार्वजनिक परिवहन से पहुंचाएंगे। 

सोचिए, जब ट्रेनें आठ-आठ घंटे लेट होती हैं, जब महीनों पहले प्रयास करने पर भी उसमें आरक्षित टिकट नहीं मिलता, जब ट्रेन में होने वाली भीड़-भाड़, गर्मी और उमस से लोगों की मौत हो जाती है। तब ऐसे में किस चीज को बढ़ावा दिया जाता है। 

सिर्फ और सिर्फ निजी परिवहन को। और वो भी सिर्फ ऑटोमोबाइल लॉबी को सपोर्ट कने के लिए। 

(तस्वीर इंटरनेट से ली ई है)

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