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उत्तर बिहार और अकाल – दिमाग खराब है क्या? लेकिन यह सच है.

Bhola Tiwari Jul 05, 2019, 7:48 AM IST टॉप न्यूज़
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उत्तर बिहार और अकाल – दिमाग खराब है क्या? लेकिन यह सच है.

11 जून 1960 आर्यावर्त-पटना. सम्पादकीय 

दिनेश मिश्रा

...दरभंगा, मुजफ्फरपुर और सहरसा में (उस वर्ष) पड़े अकाल जैसी सूरत का हवाला देते हुए अखबार लिखता है कि, “उत्तर बिहार के अन्य क्षेत्रों की स्थिति भी अच्छी नहीं कही जा सकती, हाँ वैसी नहीं है जैसी इन तीन जिलों की है. उत्तर बिहार में लोग अधिक संख्या में गरीब हैं और बराबर जो वहाँ खेती मारी जाती रही है उसके कारण उनकी स्थिति बहुत बुरी हो चुकी है. यह स्थिति वर्षों से चली आती है इसलिए उन्हें असाधारण स्थिति का अनुभव अब नहीं हो पाता है किन्तु यह बात निसंकोच कही जाएगी कि न्यूनाधिक रूप में सारे उत्तर बिहार में अन्न संकट की स्थिति उत्पन्न हो चुकी है और एक बहुत बड़े भाग में यह स्थिति उत्पन्न है जिसे दुर्भिक्ष की संज्ञा दी जा सकती है. जहां चारो ओर जीवित नरकंकाल दिखाई देते हों, जहां लोगों को सीप और घोंघा खाने के लिए विवश होना पडा हो, जहां स्त्रियों के जेवर पेट की ज्वाला शांत करने के लिए गिरवी पड़ गए हों अथवा कौड़ी के मोल बेच देने पड़े हों, जहां ज़मीन का खरीदार नहीं मिलता हो और जहां अन्न के अभाव में जीने की आशा नहीं रह गयी हो वहाँ दुर्भिक्ष नहीं तो और क्या है?

"...श्री हरिनाथ मिश्र (पूर्व स्वास्थ्य मंत्री) ने दुर्भिक्ष क्षेत्रों के भ्रमण का जो अनुभव हाल के वक्तव्य में बताया है...वह तो और भी ह्रदयद्रावक है. उन्होनें बताया है –“मैंने उन क्षेत्रो की जो दुर्दशा देखी है वह भूलने की नहीं. मैं जहां जाता , भूतों की भाँति सहस्रों नरकंकाल मझे घेर कर यह जानना चाहते थे कि उनके अभिशप्त जीवन की घड़ियों को कुछ और आगे ले चलने के लिए कुछ किया जा रहा है अथवा नहीं?.. वे आशा और निराशा के बीच जीवन से किस प्रकार खेल रहे हैं और “अन्न के अभाव में एक भी आदमी को मरने नहीं देने का” भीषण व्रत लेने वाली सरकार इन वुभुक्षितों की किस रूप में सहायता कर रही है.

"किन्तु दुर्भाग्य की बात तो यह है कि उत्तर बिहार के वुभुक्षितों की प्राण रक्षा करने के बदले सरकार वस्तुस्थिति पर पर्दा डालना चाहती है, उसके अफसर वस्तुस्थिति को छिपाते हैं और सहायता का केवल ढोल ही पीटा जाता है; वह वस्तुतः उचित रूप में दी नहीं जाती. दुर्भिक्षग्रस्त उत्तर बिहार का वास्तविक चित्र प्रकाश में आ जाने पर यह यह आशा की जाती थी कि सरकार की ओर से शीघ्र समुचित सहायता व्यवस्था की जाएगी और जो क्षेत्र अधिक संकटग्रस्त हैं उन्हें दुर्भिक्षग्रस्त घोषित करने में संकोच नहीं किया जाएगा. किन्तु यह सब न तो हो रहा है न होने की आशा ही की जाती है.”

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