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जब भूखे गजराज ने औरंगजेब के महल को तहस-नहस कर दिया

Bhola Tiwari Jul 04, 2019, 9:03 AM IST टॉप न्यूज़
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प्रवीण झा 

(जाने माने चिकित्सक नार्वे)

पहले सामंत हाथी रखते ही थे। गाँव में जिसके पास हाथी, वह बड़ा जमींदार। हाथी बिक गया, यानी जमीन बिक गए। हमारे समय में हाथी लगभग खत्म हो रहे थे, कहानियाँ बच गयी थी। यह सुनते कि एक हाथी पाँच किलो चावल खा जाता, और खाने न दो तो उत्पात मचा देता। एक बार सोनपुर मेला गया तो वहाँ का हाथी मेला याद है। ऊँट बिक रहे थे, लेकिन हाथी नहीं। हाथी बेचने पर शायद पाबंदी थी, पर हाथी थे जरूर सजे-धजे। मेरे ख्याल से जिनके पास बच गए होंगे, वह मेले घुमाने ले आते होंगे।

एक शाहजहाँ के हाथी की कहानी पढ़ी, जो औरंगज़ेब के महल में आने से इंकार कर रहा था। औरंगज़ेब को गुस्सा आया तो हाथी को तीन दिन भूखा रख, बुलवाया। हाथी आया तो सही पर लंका-दहन की तरह पूरा महल तहस-नहस कर गया। इतना ही नहीं, महल के दरवाजे पर एक हाथी की बड़ी तस्वीर उकेरी थी। उसे लगा कि यह औरंगज़ेब का हाथी है। हाथी ने उसे मार-मार कर दीवाल ही तोड़ दी और दिल्ली बाज़ार में घूम-घूम कर उत्पात करने लगा।

आखिर औरंगज़ेब ने हार कर हाथी को शाहजहाँ के पास आगरा भिजवा दिया। हाथी वहाँ अपने कैद मालिक के पास ही रहा और उसने दम ठीक उसी दिन तोड़ा जिस दिन शाहजहाँ का इंतकाल हुआ। उस हाथी का नाम था- ख़ालिक-दाद।

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