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छुक छुक रेलगाड़ी

Bhola Tiwari Jul 04, 2019, 7:57 AM IST टॉप न्यूज़
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एस डी ओझा

16 अप्रैल 1853 को चली थी भारत की पहली रेलगाड़ी । इस गाड़ी ने कुल 35 किलोमीटर का सफर तय किया था । मुम्बई से ठाड़े तक सफर करने वाली इस ट्रेन में कुल 14 बोगियां थीं । यात्री भी कम नहीं थे । 500 में सौ हीं कम थे यानी कि 400 । इंजन भाप का था । समय था अपराह्न 3:35 । 35 किलोमीटर की दूरी तय करने में कुल जमा समय सवा घण्टे लगे थे । गाड़ी से " छुक छुक " की आवाज आ रही थी । इसलिए इसका नाम लोगों ने " छुक छुक रेलगाड़ी " रखा । आज का दिन इतिहास में अमर हो गया ।

आज भारतीय रेल का नेटवर्क 74500 किलोमीटर से अधिक है । इस नेट वर्क पर 15000 से अधिक गाड़ियां दौड़ती हैं । 7 हजार से ऊपर रेलवे स्टेशन हैं । 2 करोड़ से ऊपर रोजाना यात्री इस रेलगाड़ी से यात्रा करते हैं । अमेरिका , रुस और चीन के बाद नेट वर्क के मामले में भारत का नम्बर आता है । भारत कहीं पर इन देशों से बीस तो कहीं उन्नीस नजर आता है , पर यह इन देशों से प्रतिस्पर्धा में डटा हुआ है । आज भारतीय रेलवे में 14 लाख से ऊपर मुलाजिम काम करते हैं । इसका मतलब कि रोजगार मुहैय्या करने में यह विभाग अग्रणी है । वैसे चीन भारत से आगे निकल चुका है । पहले इसका नेट वर्क भारत से काफी कम था ।

1891 तक रेलगाड़ी के प्रथम क्लास से हीं शौचालय सलग्न होता था । बाकी शेष क्लास में शौचालय सलग्न नहीं होता था । शौचालय हर डिब्बे के साथ सलग्न कराने का श्रेय बंगाल के ओखिल चंद्र सेन को जाता है । उन्होंने रेलवे को पत्र लिखा कि वे जब नीचे अपनी शंका से निपट रहे थे तभी ट्रेन उन्हें छोड़कर चली गयी । उनकी शिकायत पर ब्रिटिश सरकार ने गौर फरमाया । 1909 से हर बोगी में शौचालय का चलन शुरू हो गया था । 1951 में भारतीय रेल का राष्ट्रीय करण हो चुका था । 3 अगस्त 2002 को आॅन लाइन बुकिंग सेवा की सुविधा भी शुरू हो गयी थी । अब आरक्षण के लिए लम्बी लाइन लगाने की झंझट से मुक्ति मिल गयी है ।

बात 1947 के पहले की है । उस समय देश में अंग्रेजों का बोल बाला था । एक बोगी में एक भारतीय बुजुर्ग बैठे थे । वे निर्विकार भाव से बैठे थे । अंग्रेज भी उसी डिब्बे में थे । अंग्रेज उस बुजुर्ग का मजाक बना रहे थे । तभी बुजुर्ग फुर्ती से उठे और उन्होंने चेन पुलिंग कर दिया । सभी हैरान थे , पर बुजुर्ग शांत थे । पुलिस गार्ड के साथ आई । बुजुर्ग से चेन पुलिंग की वजह पूछी गयी । बुजुर्ग ने कहा कि आगे ट्रेन की पटरी पर कुछ गड़बड़ है । बुजुर्ग को ट्रेन की आवाज में हुई तब्दीली से हीं पता चल गया था । जांच के दौरान कुछ दूर चलने पर वास्तव में पटरी के नट बोल्ट खुले पड़े थे । उन बुजुर्ग का नाम था एम विश्वश्वरय्या । वे जाने माने इंजीनियर थे । उनकी सूझ बूझ से एक बहुत बड़ा हादसा टल गया था । उनका मजाक बनाने वाले अंग्रेज भी उनके आगे नत मस्तक थे । 1955 में उन्हें भारत के सर्वोच्च पुरस्कार" भारत रत्न " से नवाजा गया था ।

रेल गाड़ी के भयंकर हादसे से बचाने वाले विश्वश्वरय्या आजीवन एक्टिव रहे थे । वे रिटायर्ड होकर भी काम करते रहे । वे सौ साल के हो चुके थे । एक बार उनकी लम्बी उम्र का राज जब किसी ने पूछा तो वे तपाक से बोले - " मौत मेरे घर आकर दस्तक देती है । मैं उससे कह देता हूं कि विश्वश्वरय्या घर पर नहीं हैं । वह वापस चली जाती है ।" एक बार मौत आयी । विश्वश्वरय्या ने मौत से यह कहने में देर कर दी कि विश्वश्वरय्या घर पर नहीं हैं । जरा सी देर के कारण हीं मौत ने उन्हें धर दबोचा । वे 101 साल की उम्र में मरे । शायद तब से हीं भारतीय रेल की अनवरत लेट लतीफी शुरू हो गयी थी । गौरतलब है कि भारतीय रेल जब भी समय से होती है तो इसे सुखद आश्चर्य के रुप में देखा जाता है ।

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