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लोकतंत्र में राम

Bhola Tiwari Jun 29, 2019, 8:55 AM IST टॉप न्यूज़
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नीरज कृष्ण

पंचायत चुनावों की घोषणा हुई। दशरथ परिवार अपनी प्रतिष्ठा को लेकर ख़ासा चौकन्ना था। समूचे अयोध्या में राजनीति का पानी उफान पर था। नगरवासी चुनाव की तारीख करीब आने की प्रतीक्षा में अपना धैर्य खो रहे थे। राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न जिस तरफ भी अपनी होंडा सिटी दौड़ाते, लोग उत्तेजक नारे लगाते और अपने समर्थन का इजहार करते। लोग जानते थे कि चुनाव के समय में 15 दिन का समय बड़े ऐशो आराम से बीतने वाला है। पिछले चुनाव की तरह सब कुछ होगा –मुर्गा, दारु, नाच।

उधर आधी दुनिया कौशल्या, सुमित्रा, कैकेयी को ललचाई नज़रों से देखने में अत्यंत व्यस्त थी। चूँकि पिछले चुनाव में एक एक सोने की अंगूठी, साड़ी और चांदी की पायल सबको भेंट स्वरुप प्राप्त हुई थी। तीनों रानियाँ अपनी अपनी तरफ से आधी दुनिया को आश्वासन दान देने में मशगूल थीं। सभी बच्चे, बूढ़े और जवान यह तय कर रहे थे कि चुनाव में वोट के बदले प्राप्त होने वाली राशि का किस तरह सदुपयोग करेंगे।

यह सब चल ही रहा था कि महान कूटनीतिज्ञ मंथरा तीर्थ कर वापस लौट आयी थी। उन्होंने कैकेयी को अपने खोमचे में लिया और कहा – तू पागल है ? हर बार कौशल्या का ये अपराधी लड़का — ‘राम’ – नगर प्रमुख बन जाता है. आखिरकार अब तो लोकतंत्र है। सबको मौका मिलना चाहिए। हमारे भरत में क्या कमी है ? राम पी.एच.डी. है तो भरत भी कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय से एम.बी.बी.एस. है। कैकेयी की बांछे खिल गईं। उन्होनें तुरंत दशरथ से संपर्क कर अपनी बात बताई। दशरथ को दिल का दौरा पड़ने लगा। वह रानी की मूर्खता समझ गए थे। उन्होंने कैकेयी को समझाने की नाकाम कोशिश भी की। उन्होंने कैकेयी से कहा कि सदैव ज्येष्ठ पुत्र ही समाज का मुखिया होता है क्योंकि समाज सदैव ज्येष्ठ पुत्र को ही मुखिया मानता है। सशक्त कैकेयी ने आधुनिक नारी का मतलब समझाते हुए कहा कि महाराज अब दुनिया बदल गयी है, अब ऐसा नहीं होता है. जो पैसा खर्च करता है वही चुनाव जीत जाता है। इतने दिनों से चुनाव होते देख रही हूँ. आप जिसको चाहें राज्यकोष का धन खर्च कर, नगर प्रमुख बना सकते हैं। आज राम, रावण, भरत, और कालनेमी के चरित्र की बात नहीं होती। महाराज आज हर आदमी अपने वोट के बदले कुछ धन प्राप्त करना चाहता है।

दशरथ महल से बाहर निकल गए और अपने भाग्य को कोसने लगे। उधर सीताराम धोबी दूसरे मोर्चे पर डटा हुआ था। लोग उसकी भी जयकार कर रहे थे क्योंकि उसका बड़ा भाई आई.ए.एस. था और सीताराम धोबी ठेकापट्टी में अपना करियर बनाना चाहता था। चुनाव कांटे का था। वह सरेआम राम विरोधी था। कहता था — कैसा आदर्श ? कहाँ का आदर्श ? और कब आदर्श का पालन किया राम ने ? इनसे ज्यादा आदर्शवादी तो मैं रावण को मानता हूँ। लक्ष्मण को शक्ति-बाण लगने पर उसकी लंका से ही वैद्य सुषेन आए। रावण ने विजय और धर्म में धर्म को चुना। उसकी सत्ता में जितना अधर्म था उतना ही आज भी है। रावण की बहन का तो नाक कान काट लिया गया। क्या यह आधुनिक भारत में आधी दुनिया के साथ बदतमीजी नहीं है ? राम मनुष्य होते तो छुपकर बाली की हत्या नहीं करते, आमने-सामने युद्ध करते। ये कौन सा आदर्श है – ”जेहिं विधि होय नाथ हित मोरा” ! वह यह भी कहता कि सीता ने ही कौन सा इतना बड़ा आदर्श निभा दिया कि उसे सती बोला जा रहा है ! लक्ष्मण के रेखा खींचने के बाद भी वह भाग गयीं रावण के साथ, क्योंकि उसे जंगल नहीं रावण का राज महल चाहिए था। सुख चाहिए था, जंगल में सुख कहाँ था ! यह सब सुनकर राम को दुःख तो बहुत होता था परन्तु सीताराम धोबी की हत्या का मतलब वह बखूबी समझते थे। इसलिए वो गुपचुप तरीके से उसकी सुरक्षा भी करते थे। क्योंकि दुनिया जानती थी कि सीताराम धोबी राम विरोधी है और वह अपने कामरेड मित्रों की वजह से और भी ज्यादा मुखर हो गया है। उसका यह भी कहना था कि वह सामान्य सीट पर भी चुनाव लड़ेगा और यदि सीट पिछड़ी होती है तब भी लड़ेगा।

इधर माता कैकेयी की बात सुनकर किंकर्तव्य विमूढ़ हो गए राम। एक तरफ परिवार, दूसरी तरफ प्रतिष्ठा, तीसरी तरफ समाज और चौथी तरफ केंद्र व प्रदेश की सरकारें। राम को जब कोई मार्ग नहीं दिखा तो उन्होंने गुरु वशिष्ठ से संपर्क किया। गुरुदेव वहाँ के विश्वविद्यालय के कुलपति थे। राम ने गुरुदेव के निजी सचिव को फोन लगाया। दूसरे दिन शाम का एप्वाईंटमेंट फिक्स हो गया। राम अपने ड्राईवर के साथ गुरुदेव के समक्ष प्रस्तुत हुए और पैर छूकर प्रणाम किया। गुरुदेव पहले से सारा माजरा समझ गए थे। दशरथ ने फोन करके उन्हें सब कुछ बता दिया था। राम भाव विहोर होकर गुरुदेव से अपनी अंतरात्मा की बात बताने लगे। गुरुदेव ने कहा — चिंतन करो राम ! चिंता मत करो। चिंता आयु घटाती है, जबकि चिंतन से बुद्धि बढती है। गुरु ने राम को समझाया कि वो इस बार के चुनाव परिणाम भी जानते हैं. इसलिए उपाय यही है कि राजपरिवार का कोई भी व्यक्ति चुनाव न लड़े। सो तुम अपने किसी विश्वासपात्र को चुनाव लड़ाओ राम !

गुरु को प्रणाम कर राम राज महल में लौट आये. सीता ने पूछा अब क्यों चिंतित हैं ! गुरुदेव ने कुछ उपाय नहीं बताया क्या ? राम ने तौलिए से पसीना पोछते हुए कहा कि बताया तो परन्तु उपाय सरल नहीं है सीते ! विश्वासपात्र हो और आदमी हो ऐसा तो कभी संभव न था न ही आज है। यदि विश्वासपात्र मनुष्य होते तो लंका पर चढाई करते वक्त मुझे बंदरों और भालुओं की मदद क्यों लेनी पड़ती ! आज भी मेरे पास सिर्फ हनुमान ही हैं जो मेरे विश्वासपात्र हैं। सीता ने कहा, तो फिर क्यों न हनुमान को ही प्रत्याशी बनाकर लड़ा दिया जाय चुनाव ! राम को सीता की बात जाँच गयी, लेकिन उन्हें संदेह था कि पता नहीं महल के अन्य लोग हनुमान का समर्थन करेंगे या नहीं। प्रातः दस बजे इसी मसले पर बैठक बुलाई गयी. हनुमान का जिक्र आते ही लोगों के चेहरे गुस्से से तमतमा गए। उधर हनुमान का नाम आने से वानर समाज में ख़ासा आक्रोश था। वानर सुग्रीव को टिकट देने की मांग करने लगे। लक्ष्मण ने राम को समझाया — अरे भैया ! पागल हो गए हैं क्या ? हनुमान लाख अच्छे हों मगर इंसान नहीं बन्दर हैं। यह लोकतंत्र है, बन्दरतंत्र नहीं कि आप इंसानों को छोड़कर बंदरों को समाज का मुखिया बना दें। यह सुनकर हनुमान को दिल का दौड़ा पड़ गया। उन्हें नजदीक के एक पशुचिकत्सालय में भर्ती कराया गया।

राम स्वयं को पराजित देख गुरुदेव के पास चले गए। उन्होंने सारी घटना गुरुदेव को बताई। गुरुदेव मुस्कुराने लगे। फिर उन्होंने कहा – शांत हो जाओ राम। मुझे ही कुछ उपाय ढूँढना होगा। गुरुदेव ने अपनी तरकीब लगाई. उन्होंने मुख्यमंत्री को फोन लगाया और कहा — महोदय, समूचे आर्यावर्त की प्रतिष्ठा का विषय बन गया है अयोध्या चुनाव। इसके महत्व को समझते हुए वहाँ की सीट को पिछड़ी घोषित कर दीजिए। मैडम ने कहा ओ.के. मैं अपने निजी सचिव को बोल देती हूँ। गुरुदेव ने मैडम को धन्यवाद कह फोन का रिसीवर रख दिया तो राम उछल पड़े। गुरुदेव से राम ने पूछा। गुरुदेव पिछड़ी में कौन हमारा है, तो गुरुदेव ने कहा तुम्हारा भक्त केवट, राम !

केवट का नाम सुन राम को थोड़ी चिंता हुई। उन्होंने गुरुदेव से कहा, लेकिन केवट तो सीताराम धोबी के साथ हो गया है। गुरुदेव ने कहा धोबी की ऐसी की तैसी। केवट भी सत्ता सुख चाहता है. उसे तुम यह अवसर देकर सदा के लिए अमर हो जाओगे और सीताराम धोबी की राजनीतिक हत्या भी हो जायेगी। लेकिन बीच में केवट ने विद्रोह कर दिया तब क्या होगा गुरुदेव ? गुरुदेव ने कहा उसकी चिंता मत करो राम। उसकी ठेके की एक मोटी फाइल है मेरे पास राम गुरु के पैरों में गिर गए. केवट की जीत हुई। राम की जय जयकार हुई। राम ने केवट से एक करोड़ रुपयों के कागजात पर अंगूठे लगवा लिए जो चुनाव में खर्च हुए। केवट जय श्री राम कहता है। जनता उसका गुणगान करती है। हम तो केवट जी का पी.ए. बनना चाहते हैं। आप भी केवट जी से ही उम्मीद करिये कि वह हम सबका विकास अवश्य करेंगे।

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