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इतवार का विवादित मुद्दा

Bhola Tiwari Jun 29, 2019, 5:21 AM IST टॉप न्यूज़
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प्रवीण झा

(जाने माने चिकित्सक नार्वे)

लेनिन की मूर्ति पर गप्पबाजी चल रही थी। यह भी सोशल मीडिया में समय बिताते लग ही गया है कि किसकी क्या प्रतिक्रिया होगी। तो इसमें खास रस नहीं रहा। रस तब आता है जब कोई अपनी ट्रेडमार्क धारा के विपरीत चल गूगली फेंक दे। फिर क्लीन बोल्ड। अगर पता ही है कि फलाँ गेंद फेंकेगा, स्पिन कर लेग साइड आएगी, तो फिर बल्लेबाज तैयार ही रहता है। 

खैर, लेनिन, स्टालिन नामके बच्चे और कई हस्पताल के स्टाफ़/मित्र मेरे रहे। एक तो रूज़वेल्ट भी थे। जमशेदपुर के केनेडी भी। एडॉल्फ़ हैं। अब तो तैमूर भी है। अब यह सोचिएगा कि उस नाम के लोग एक खास विचारधारा के हैं, या सब ईसाई हैं, तो वो भी नहीं। केरल के ब्राह्मण और पद्मनाभ मंदिर नियमित जाने वाले भी लेनिन हैं। हाँ! कभी प्रभाव पड़ा। पेरियार आंदोलन हुआ। कांग्रेस को मात देकर कम्युनिस्ट आए। सोवियत से मधुर संबंध भी रहे। मेरे एक मुक्केबाज मित्र के कोच रूसी थे। रूस में राज कपूर की फिल्में चलती थीं। और दरभंगा के सर्कस में भी रूसी महिला आईं थी। अब बच्चे उस वक्त जन्मे तो ये नाम मिले। इससे धर्म-विरोधी या संस्कृति-विरोधी हो गए? साधु नाम के आदमी के आतंक से तो कई बिहार छोड़ भागे होंगें। अब पता नहीं कहाँ हैं राज-साले साहब। 

केरल में आज भी नियमित रीति से पूजा होती है। सबरीमाला पर यही लेनिन-स्टालिन चढ़ते मिलेंगें। गुरूवायुर घूम आइए। एर्नाकुलम। त्रिशूर। मन्नरसाला के नागराज। विशुद्ध संस्कृत जाप करते लोग। जींस पहने के मंदिर नहीं घुसने देगा। कपड़ा उतरवा लेगा। कर्मकांडी पूजा। किस कोण से धर्म भ्रष्ट है या खत्म हुआ? अपना उत्तर का मंदिर देख लीजिए। इतने छोटे राज्य में कर्मकांडी हिंदू और हार्डकोर ईसाई (ऑर्थोडॉक्स, कैथोलिक दोनों)। और इकलौता राज्य जहाँ मुस्लीम लीग भी है। इनमें खिट-पिट है, मार-काट भी है, पर मजाल है कि एक भी सामाजिक-आर्थिक इन्डिकेटर गिर जाए। यह और बात है कि इसका ‘डार्क साइड’ ही हिंदी बेल्ट में पढ़ रहा हूँ। यह निराशावाद है, और कुछ नहीं। केरल को घटिया, हिंसक, और निम्न राज्य सिद्ध कर हम भारत को ही गिरा रहे हैं। हम खंड-खंड कर अखंड की परिभाषा नहीं गढ़ सकते कि भारत के फलाँ क्षेत्र में मवाद है। अश्वमेध यज्ञ तो राज्य के बाहर विजय के लिए होता है। अपने ही राज्य में घोड़ा दौड़ा कर विजय-पताका नहीं फहराते। चुनावी जीत का जश्न उचित है, पर अपने ही नागरिकों (राजनीतिज्ञ नहीं, नागरिक) से घृणा या उन पर फतह का भाव उचित नहीं। अपने ही शरीर के अंश से कैसा पूर्वाग्रह? लेनिन नाम का बच्चा लेनिन नहीं, वो तो मेरे हस्पताल का वार्ड-बॉय था। मरीजों की देख-भाल करता था। उसे हेय नजर से न देखें। देखना है तो उस पापी को देखें, जिसका नाम भले ही राम हो, मुहम्मद हो या साधु हो, पर हो दुष्ट। नाम में क्या रखा है?

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