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कितनी तन्हा हो गयीं तन्हाइयां

Bhola Tiwari Jun 29, 2019, 4:58 AM IST टॉप न्यूज़
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एस डी ओझा

अस्कोट पिथौरागढ़ जिले का एक टाऊन है । यहां पर कत्यूरी वंश के राजाओं का शासन 1279 से शुरू हुआ था । अभयदेव पाल इस रियासत के पहले राजा थे , जिनका शासन अस्कोट से ढाई किलोमीटर दूर लखनपुर से होता था । बाद में 1615 में इस रियासत के राजा महेन्द्र पाल प्रथम ने लखनपुर से राजधानी अस्कोट में स्थानांतरित की । आजकल अस्कोट डीडीहाट तहसील और कनालीछीना विकास खण्ड का एक हिस्सा है । राजा महेन्द्रपाल प्रथम ने अस्कोट में एक बहुत सुंदर महल का निर्माण करवाया था । यह महल आज भी अस्कोट में मौजूद है , जिसे देखने का मुझे दो बार सौभाग्य प्राप्त हुआ है । कत्यूरी वंश के अंतिम राजा टिकेन्द्र बहादुर पाल थे । इस महल में कत्यूरी वंश के कुल देवता नारिंग देवल की भी प्राण प्रतिष्ठा हुई है ।

नारिंग देवल के कारण इस महल का नाम देवल दरबार पड़ा । अस्कोट क्षेत्र में अस्सी कोट (किले ) थे । इसलिए इसे अस्सी कोट कहा गया , जो बाद में अस्कोट के नाम से मशहूर हो गया । अस्कोट राजा के राज्य का विस्तार तिब्बत तक था । इनके खेत हमने "काला पानी " तक देखें हैं । काला पानी में देवी काली का एक मंदिर है , जिसके नीचे से एक जल स्रोत निकलता है । पानी का रंग कुछ कालिमा लिए हुए होता है , जिस वजह से इसका नाम काला पानी पड़ा । काला पानी पर नेपाल भी अपनी दावेदारी दिखाता है । एक बार कुछ लड़के लड़कियों का ग्रुप यहां आया था, जिन्होंने Indian Army go back का नारा लगाया । देश के आजाद होने के बाद भी अस्कोट के राजा का समांतर में सरकार चलती रही थी । 1967 में कहीं जाकर भारत सरकार ने इसका विलय अपने में किया था । कैलाश यात्रा पर जाने वाले यात्रियों के भोजन और रात्रि विश्राम का इंतजाम देवल दरबार में हीं होता था । अब इस काम का जिम्मा कुमाऊँ मण्डल विकास निगम का है ।

अस्कोट क्षेत्र में कस्तूरी मृगों का अभयारण्य है । इस अभयारण्य के कारण हीं कैलाश मान सरोवर यात्रा मार्ग पर मोटर रोड नहीं बन पा रही थी । मामला कोर्ट में बहुत दिनों तक विचाराधीन था । अब शायद रोड बननी शुरू हो गयी है । कैलाश यात्रा अब सुगम हो जाएगी । यह क्षेत्र में हिम तेंदुए और काले भालू के लिए भी प्रसिद्ध है । इस क्षेत्र की एक जनजाति है बन रावत , जो सरकारी संरक्षण के अभाव में लुप्त प्राय होने वाली है । अस्कोट क्षेत्र में लगभग 142 गाँव हैं । इनमें से अधिकांश गांव अभी भी सड़क मार्ग से नहीं जुड़ पाएं हैं । अस्कोट का अभी भी विकास होना बाकी है । 70 सालों में यह ब्लाॅक मुख्यालय तो क्या तहसील भी नहीं बन पाया है । यहां ढंग का कोई बाजार भी उपलब्ध नहीं है । जरुरी सामान के लिए यहां के लोगों को 20 किलोमीटर दूर डीडीहाट जाना पड़ता है ।

कत्यूरी वंश के अंतिम राजा टिकेन्द्र बहादुर पाल के पुत्र भानु राज पाल देवल दरबार को पुरातत्व विभाग को सौंपना चाह रहे थे । वे 1997 से प्रयास रत थे । जब सरकार ने कोई रुचि नहीं दिखाई तो उन्होंने 2001 में इस भवन का लाखों रुपया खर्च कर जीर्णोद्धार कराया है । जब सरकार नहीं चेतेगी तो कोई अपने पुरखों की विरासत को यूँ हीं मिटने के लिए छोड़ तो नहीं देगा । रजवार ( कुमाऊँ में रजवार राजा को कहते हैं) लोगों का राज्य जब सरकार ने ले लिया है तो उनकी विरासत को सम्भालने का जिम्मा भी सरकार की हीं होनी चाहिए । मैंने अंतिम बार 2005 में देवल दरबार को देखा था । एक अजीब सा सन्नाटा पसरा था । कत्यूरी वंश की महान गाथा को समेटे हुए यह भवन आज अपनी किस्मत पर आंसू बहा रहा है । उस दिन मुझे फिराक गोरखपुरी का एक शे'र याद आ गया था -

अब तो उनकी याद भी आती नहीं, 

कितनी तन्हा हो गयीं तन्हाइयां ।

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