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यूँ हीं नहीं हुर्रियत नेता नरम पड़ें हैं

Bhola Tiwari Jun 28, 2019, 6:00 PM IST टॉप न्यूज़
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अजय श्रीवास्तव

कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने कहा है कि हुर्रियत कांफ्रेंस के नेता बात करने के लिए तैयार हैं।उन्होंने बातचीत में नरमी के संकेत भी दिये हैं।कश्मीर के जामा मस्जिद में भाषण देते हुए हुर्रियत नेता मीरवाइज उमर फारूक ने कहा,"भारत के लोगों ने मोदी और उनकी पार्टी को सत्ता में वापस लाने के लिए भारी मतदान किया,यह जनादेश मोदी को काफी समय से लंबित कश्मीर समस्या के समाधान में निर्णायक भूमिका निभाने का मौका देता है।"

आपको याद होगा 2017 में एनआईए ने टेरर फंडिंग के मामले में कश्मीर में एक बडा अभियान चलाया था, जिसमें लगभग सभी हुर्रियत नेताओं की संलिप्तता उजागर हुई थी।आँल हुर्रियत कांफ्रेंस के चेयरमैन सैयद अली शाह गिलानी, यासिन मलिक, गिलानी के दामाद अल्ताफ फंटूश, गिलानी के पीआरओ अयाज अकबर, मेहराजुद्दीन, अब्दुल गनी बट्ट, मीरवाइज उमर फारूक, शब्बीर शाह आदि सभी बडे नामों को टेरर फंडिंग के मामले में बेनकाब किया था।

नरेंद्र मोदी ने शुरू में हीं समझ लिया था कि अगर कश्मीर में कुछ करना है तो हुर्रियत के नेताओं पर लगाम लगाना होगा।केंद्र सरकार ने एनआईए समेत अन्य सभी उस एजेंसियों को सक्रिय कर दिया था जो कश्मीर में आतंकवादी कृत्यों, सुरक्षा बलों पर पथराव, स्कूलों में आगजनी और सरकारी प्रतिष्ठानों को क्षतिग्रस्त करने के पीछे वित्तपोषण करती हैं।एनआईए ने जाँच में पाया कि ये सारी घटना प्रायोजित है और पाकिस्तान इसके लिए फंड हुर्रियत नेताओं को देता है।हुर्रियत नेता के पास फंड हवाला द्वारा पहुँचता है।केन्द्र सरकार ने कश्मीर के विभिन्न बैंकों, हवाला आपरेटरों, दलालों पर शिकंजा इतना कस दिया कि ये अलगाववादी नेता पाई पाई के मोहताज हो गए।कश्मीर में रोजगार है नहीं, युवा लडकों को पत्थर फेंकने के लिए सौ दो सौ रूपये हर रोज दिये जाते थे, फंडिंग रूक जाने से वे भी बेवजह पत्थर फेंकने को तैयार नहीं हैं,शायद व्यवसायिकता का असर यहाँ भी देखने को मिल रहा है।

पिछली बार भी सरकार ने हुर्रियत कांफ्रेंस के नेताओं पर शिकंजा कस के रखा था,इसबार तो गृहमंत्री अमित शाह बने हैं।ये कश्मीर में आतंकवाद के शुरूआत होने के बाद पहली बार है कि केन्द्रीय गृहमंत्री के कश्मीर आगमन पर हुर्रियत कांफ्रेंस ने कश्मीर बंद नहीं बुलाया है।नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने उनकी दुखती रग को कसकर पकड़ लिया है जो अभी तक नहीं हुआ था।

बाजपेयी जी के समय भी शायद साल 2000 में हुर्रियत कांफ्रेंस का नरम धड़े बातचीत के लिए तैयार हो गया था, उस समय भी नरम धडे की नुमाइंदगी मीरवाइज उमर फारूक कर रहे थे मगर कट्टर हुर्रियत नेता सैयद अली शाह गिलानी इसके लिए तैयार नहीं हुए।गिलानी पाकिस्तान को इस वार्ता में एक पक्ष के रूप में शामिल करना चाहते थे मगर भारत सरकार इसके लिए राजी नहीं था।

आपको बता दें 09 मार्च 1993 में आँल पार्टीज हुर्रियत कांफ्रेंस की स्थापना का मकसद राजनीतिक जरिए से कश्मीर के अलगाव के लक्ष्य को हासिल करना है।हुर्रियत जम्मू कश्मीर में सक्रिय चरमपंथी संगठनों का प्रतिनिधित्व करती है।इसे बनाने की जरूरत इसलिए महसूस हुई क्योंकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंसक गतिविधियों को मान्यता नहीं दी जाती है, लिहाजा हुर्रियत कांफ्रेंस के जरिए कश्मीर समस्या के अंतराष्ट्रीयकरण और राजनीतिक समाधान के रास्ते ढूंढे जाएं।हुर्रियत नेताओं का काम कश्मीर में सेना की भूमिका पर सवाल उठाना, भारत के राष्ट्रीय पर्व का वहिष्कार करना और वहाँ के चुनावों का वहिष्कार करने तक सीमित है।

कांग्रेस शासन में सभी हुर्रियत नेताओं को सरकारी सुरक्षा दी जाती थी, एक आरटीआई में पता चला है कि हर साल करीब दस करोड़ रू इनके सुरक्षा पर खर्च होता है।हुर्रियत नेता जब दिल्ली या कश्मीर से बाहर जाते हैं तो उनके होटल का खर्च, खाने-पीने का खर्च उनके लावलश्कर के साथ केन्द्र और राज्य सरकार मिलकर वहन करती है।

पुलवामा हमले के बाद केन्द्र सरकार ने सभी हुर्रियत नेताओं के पास से सरकारी सुरक्षा हटा लिया है जो स्वागत योग्य कदम है।देश के साथ गद्दारी करनेवाले को सरकारी सुरक्षा देना देश के साथ गद्दारी करने के बराबर है।नरेंद्र मोदी सरकार ने इनके टेटुओं को दबा दिया है और अब ये बिलबिला रहें हैं।सभी नेताओं के पाकिस्तान कनेक्शन उजागर हैं जो ताउम्र जेल में रहने के लिए काफी है।ये जो मीरवाइज उमर फारूक हैं उनके घर से एनआईए ने पाकिस्तानी हाटलाइन फोन बरामद किया था।उनके घर से हाइटेक कम्युनिकेशन सैटअप जब्त किया गया था, इसका जवाब भी उन्हें देना है।

केन्द्रीय गृहमंत्री ने अपनी पहली आधिकारिक यात्रा के तौर पर जम्मू-कश्मीर को चुना है जो इस राज्य के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दोहराता है।पहली बार गृहमंत्री के जम्मू कश्मीर पहुँचने पर कश्मीर बंद का ऐलान नहीं होना बहुत कुछ कहता है।जो कश्मीर की राजनीति को पास से जानते हैं वो इस बात का मतलब अच्छी तरह समझ रहे हैं।मैं जानता हूँ इससे बहुत कुछ नहीं बदलेगा मगर देश के अंदर देश के दुश्मनों को खामोश कर देना भी बडी बात है और इसमें सरकार सफल है।पाकिस्तान कभी भी कश्मीर में अमनचैन वापस लाने नहीं देगा मगर अब लगता है भारत को सिर्फ बाहरी मोर्चे पर लडाई लडनी होगी।

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