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जब ग़ुरूर हावी हो जाए, कुछ देर पुस्तकालय में खड़े हो

Bhola Tiwari Jun 28, 2019, 5:16 AM IST टॉप न्यूज़
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पुस्तकालय क्यों जाएँ? 

प्रवीण झा

(जाने माने चिकित्सक नार्वे)

मैं लगभग एक दशक से पुस्तकों के मामले में डिज़िटल व्यक्ति हूँ। और इसकी आदत इसलिए भी पड़ी कि मुझे कोई शब्द या संदर्भ मिल जाए, मैं उस पर दो-चार घंटे खपा लेता हूँ। यह डिज़िटल माध्यम में सुलभ है। लेकिन पिछले दो वर्षों से कुछ ऐसी स्थिति हुई कि नियमित पुस्तकालय जाना हुआ। किताबें डिज़िटल मिल नहीं रही थी, और पुस्तकालय से कुछ लगाव भी होता गया। यह भी नहीं कि पूरी की पूरी किताबें पढ़ लीं। मुझे जो संदर्भ चाहिए, वह पन्ना ढूँढा, पढ़ा, नोट किया और वापस रख दिया। यह सुविधा खरीदी किताब में कम मिलती है। आदमी कितनी किताबें खरीदे और कितने पन्ने पढ़े? 

कुछ लोग कहेंगे कि न मैं शोधी हूँ, न मुझे संदर्भ ढूँढना है। मुझे तो बस मौज करनी है, जिंदगी जीनी है। एक दफे एक सामुदायिक पुस्तकालय से मैंने अल्फ़ाबेटिकल ऑर्डर में फ़िल्में लानी शुरू की, और A से E तक सारी फ़िल्में देख ली। इसके बाद जगह बदल गयी तो F से आगे की फ़िल्में रह ही गयी। पुस्तकालयों में कॉमिक्स-उपन्यास तो फोकट में मिलते ही हैं, और मिलने भी चाहिए।

दरअसल किताबों के मध्य खड़े होकर हमारा कद अचानक छोटा हो जाता है। हमें किताबें यूँ घूरती हैं कि अभी तुम ज्ञान में बच्चे हो। तुमने कुछ न पढ़ा, न सीखा। तो जब ग़ुरूर हावी हो जाए, कुछ देर पुस्तकालय में जरूर खड़े हो जाना चाहिए।


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