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जेण्डर डिस्फोरिया

Bhola Tiwari Jun 27, 2019, 7:51 AM IST टॉप न्यूज़
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 एस डी ओझा

आईने में पुरुष को जब अपना दाढ़ी मूंछ युक्त चेहरा या स्त्री को अपना दाढ़ी मूंछ विहीन चेहरा पसंद न आए तो समझ लीजिए कि ऐसे पुरुष स्त्री जेण्डर डिस्फोरिया के शिकार हो गये हैं । ऐसा क्यों होता है ? क्योंकि जब पुरूष तन में स्त्री मन और स्त्री तन में पुरूष मन समा जाए तब जेण्डर डिस्फोरिया की आवक हो जाती है । इस तरह का विकार बच्चों मे ढाई तीन साल की उम्र से हीं आने लगता है । बच्चों को अपने से विपरीत जेण्डर की सोहबत अच्छी लगने लगती है । यदि बच्चा पुरुष जेण्डर का है तो उसे औरत जेण्डर के बच्चों का साथ अच्छा लगेगा । यही बात औरत जेण्डर के बच्चों के साथ होगी । उन्हें पुरुष जेण्डर के बच्चों की सोहबत अच्छी लगेगी । 

आम तौर पर किन्नर इस मनोविकार से ग्रसित होते हैं । 84% किन्नरों की कद काठी शकल सब पुरुषों से मिलती जुलती है । उनकी दाढ़ी मूछें भी होती हैं । आवाज भी पुरुषों जैसी मोटी होती है । इसके बावजूद वो अपने को स्त्री मानते हैं । उनके हाव भाव में स्त्रैण प्रवृति झलकती है । हालांकि किन्नर थर्ड जेण्डर में आते हैं , पर वे भी जेण्डर डिस्फोरिया के शिकार होते हैं । कुछ सालों पहले तक डी आई जी रैंक के एक पुलिस ऑफिसर जेण्डर आइडेण्टिटी डिसआर्डर ( जेण्डर डिस्फोरिया ) से पीड़ित थे । वे वर्दी में रहते हुए भी नाखूनों पर नेल पाॅलिश , होठों पर लिपिस्टिक और आंखों में काजल लगाते थे । वे काफी दिनों तक मीडिया के आंखों के तारे बने हुए थे । अब जब वे रिटायर्ड होकर घर बैठ गये हैं तो कोई उनकी खोज खबर नहीं लेता । मीडिया भी उनसे मुंह मोड़ चुका है ।

कुछ मरीज जन्म से हीं जेण्डर डिस्फोरिया से पीड़ित होते हैं । उन्हें अपनी वर्तमान शारीरिक संरचना पसंद तो होती है , पर वे रहना विपरीत लिंगियों की तरह रहना चाहते हैं । यही केस डी आई जी साहब का था । वे जन्म से हीं जेण्डर आइडेण्टिटी डिसआर्डर से जूझ रहे थे । कुछ लोग ऐसे लोगों को समलैंगिक समझने की भूल कर बैठते हैं । जब कि वास्तव में ऐसा नहीं होता । जेण्डर डिस्फोरिया के मरीज भी विषमलिंगी हीं होते हैं । कुछ मरीज बाद में बनते हैं । कई घरों में बेटों की चाह होती है । बेटा न होने पर बेटी का हीं लालन पालन बेटे की तरह किया जाने लगता है । उसे बेटे के पोशाक में रखा जाता है । ऐसे में उनमें पुरुष की प्रवृति पनपने लगती है । कई घरों में कई बेटियों के बाद बेटा पैदा होता है । वह बेटा अपनी बहनों के संग रहकर अपने अंदर औरतों के गुण विकसित कर लेता है । उसकी चाल ढाल अदा सब औरतों वाली हो जाती है ।

कुछेक घरों में पिता की मृत्यु के बाद कोई एक लड़की घर की जिम्मेदारी सम्भाल लेती है । जिम्मेदारी सम्भालते सम्भालते उसमें पुरुषोचित गुण उभरने लगते हैं और वह लड़की जेण्डर डिस्फोरिया की मरीज बन जाती है । कुछ लड़कियों का परवरिश भी लड़कों की तरह होती है । ऐसी लड़कियों की चाल ढाल सब लड़कों की तरह हीं हो जाती है । कुछेक घरों में जब लड़के हीं लड़के होते हैं तो मां बाप किसी एक लड़के को लड़की की तरह पालने लगते हैं । उसे लड़कियों के कपड़े पहनाते हैं । ऐसे में उस लड़के में स्त्रियोचित गुण आने लगते हैं । कई बार जैण्डर डिस्फोरिया पागलपन की वजह से भी होता है । ऐसे में पागलपन का इलाज किया जाना चाहिए । पागलपन का इलाज होने के बाद जेण्डर डिस्फोरिया स्वतः हीं ठीक हो जाती है ।

जेण्डर डिस्फोरिया के मरीज का इलाज शुरूआती दौर में आसानी से हो जाता है । उसे विहेवियर थेरेपी के साथ साथ मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग भी की जाती है । लेकिन जब काफी समय निकल जाता है तो मामला पेचीदा होने लगता है । देर हो जाने के बाद जेण्डर डिस्फोरिया के मरीज वापस अपने जेण्डर में नहीं आ पाते । कई अपना सेक्स चेंज करा बैठते हैं और ताजिंदगी हारमोन के इंजेक्सन लेते रहते हैं । वे सर्जरी की लम्बी प्रक्रिया से गुजरते हैं । ऐसे लोगों का कभी मजाक नहीं बनाना चाहिए । वे भी हमारी आपकी तरह से इंसान हैं । उन्हें भी हमारी तरह हीं जीने का हक है । वे आपके प्यार के मुंतजिर हैं । उन्हें प्यार दीजिए । जीने दीजिए ।

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