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हेल्थ केयर और डिजिटल इंडिया

Bhola Tiwari Jun 27, 2019, 7:43 AM IST टॉप न्यूज़
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प्रवीण झा

(जाने माने चिकित्सक नार्वे)

हाल ही में राहुल गाँधी ने सिंगापुर में पूरे विश्व की MRI मशीनों को जोड़ने की बात कही जिसे बहुत से लोगों ने महज हास्य विनोद का विषय माना। उन्होंने ये भी कहा कि इस कदम से ना सिर्फ भारत में बल्कि समूचे विश्व की स्वास्थ्य सेवाओं में क्रन्तिकारी परिवर्तन लाया जा सकता है। अब कांग्रेस अध्यक्ष ने यह बात खुद सोची या उन्हें किसी वैज्ञानिक सलाहकार ने सुझाई, ये अपने आप में एक रहस्य ही है लेकिन सभी MRI मशीनों को जोड़ने की इस पहेली को मैं ज़रूर सुलझाना चाहूँगा।

सबसे पहले तो आप में से कुछ लोगों को यह जानकर आश्चर्य होगा कि उन्होंने जो कहा, और जिस बात का मजाक उड़ाया गया, वो कुछ हद तक व्यावहारिक है और मूर्त रूप ले भी चुकी है। 

भारत की सिलिकान वैली बंगलौर की किसी बहुमंजिला इमारत में आप बहुत से डॉक्टर्स को अपने क्यूबिकल्स में बैठ लगभग सारी दुनिया से आई इमेजेज पढ़ते देख सकते हैं। अमेरिकी अस्पतालों और प्राइवेट क्लीनिक से लेकर अफ्रीका के उप-सहारा के क्षेत्रों तक की इमेजेज चौबीसों घंटे भारतीय डॉक्टर्स तक पहुँचती हैं और वो पढ़ते हैं। ‘टेली-रेडिओलाजी सोल्यूशंस’ दुनिया की सबसे बड़ी टेली-रेडिओलाजी कंपनियों में से एक है जो वास्तव में ‘MRI इमेजेज’ को जोड़ती है और स्वास्थ्य क्षेत्र में क्रांति ला रही है। और अब ये एक दशक पुरानी बात हो चुकी है।

एक और मामला देखिये, एक सीरियस मरीज उत्तरी बंगाल के किसी छोटे से शहर से MRI करवाता है। वहां मशीनें हैं, टेकनीशियन है मगर उस रिपोर्ट को पढ़ने वाला कोई एक्सपर्ट नहीं। लेकिन इसके बाद भी मरीज सिर्फ एक डायग्नोसिस के लिए कलकत्ता जाने के बजाय एक घंटे के भीतर अपनी रिपोर्ट पा जाता है और इलाज करवा लेता है। ये संभव होता है क्योंकि चेन्नई में बैठे किसी एक्सपर्ट ने अपने फेवरेट फुटबाल गेम से ब्रेक लेकर उसकी रिपोर्ट पढ़ी और अपने सुझाव भेज दिए। अब स्थिति यह है कि रेडिओलोजिस्ट को सिर्फ अपने लैपटॉप में एक वेब-बेस्ड सॉफ्टवेयर चाहिए और वो सारी दुनिया की इमेजेज पढ़ सकता है। टेली-रेडिओलाजी ने तो ये सुविधाएँ मोबाईल और ipad तक लाकर इसमें क्रांति ला दी है।

यूरोप में, सारे अस्पताल और पाली-क्लीनिक एक हेल्थ-लिंक से सॉफ्टवेयर से जुड़े हैं जिसमें इमेज, मरीज की हिस्ट्री और प्रिस्क्रिपशन ट्रांसमिट करने की सुविधा है। वहां एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल तक झोला भर के xray फिल्म और MRI फिल्म लेकर भटकने की जरूरत नहीं होती। पूरा सिस्टम ‘फिल्म-लेस’ है यानि इमेजेज सर्वर से प्राप्त की जा सकती हैं। वहां सिर्फ एक विशिष्ट पहचान संख्या(आधार सरीखी) दर्ज कर मरीज की सारी केस हिस्ट्री मिल जाती है और दो तंत्रों, PACS(Picture archiving and communication system) और HMS (Hospital management system) के संयोजन से इमेजेज प्राप्त की जा सकती हैं।

इमरजेंसी केसेज और रात के मामलों में ये वरदान की तरह साबित हुआ है। अमेरिका, भारतीय डॉक्टर्स की मदद इसलिए नहीं लेता कि वो एक सस्ते विकल्प हैं बल्कि इसलिए लेता है क्योंकि रात को विशेषज्ञों की उपलब्धता कम होती है। अमेरिका में रात में होने वाले MRI, भारतीय दिन में पढ़ सकते हैं। इसी तरह यूरोप के MRI आस्ट्रेलिया से पढ़े जा सकते हैं। भारत को दूसरे देशों के डॉक्टर्स की ज़रुरत नहीं लेकिन यह सारी इमेजेज को संयोजित कर अपने विशेषज्ञों का पूरा लाभ उठा सकता है। MRI चाहे जहाँ भी हो, इमेज को सिंगल या मल्टिपल सर्वर में भेजा जाये, जिसे दिन और रात की शिफ्ट में काम कर रहे रेडिओलोजिस्ट पा सकें, पढ़ सकें।  

दक्षिण भारत में डायग्नोस्टिक सेंटर्स की एक चेन विजया डायग्नोस्टिक सेंटर और मध्य प्रदेश/छत्तीसगढ़ में BSR डायग्नोस्टिक चेन इस मॉडल का कुशलतापूर्वक प्रयोग कर रहे हैं। उन्होंने अपने सारे डायग्नोस्टिक सेंटर्स को एक सर्वर से जोड़ दिया है। हैदराबाद स्थित सेंटर में एक सेंट्रल रूम है, जिसे स्पेस स्टेशन कहा जा सकता है, और बहुत से रेडिओलोजिस्ट पूरे आंध्र प्रदेश से इमेजेज पढ़ते रहते हैं। उन्होंने सारी MRI इमेजेज को संयोजित कर दिया है। 

लेकिन इस पूरे विचार और इसके ट्रांसमिशन को कुशलतापूर्वक और सहयोगपूर्ण ढंग से किये जाने की आवश्यकता है। भारत में, जहाँ स्वास्थ्य में प्राइवेट क्षेत्रक का प्रभुत्व है, अलग अलग अस्पतालों की इमेजेज को जोड़ना मुश्किल है। इसके लिए या तो सरकार को आगे आकर इसका वित्तपोषण और विनियमन करना होगा, या फिर स्वास्थ्य क्षेत्र की भलाई के लिए प्राइवेट अस्पतालों को मिलजुलकर आगे बढ़ना होगा। हाँ निश्चित तौर पर MRI मशीनों या मैगनेट को जोड़ना संभव नहीं है और अगर कोई ऐसा कहता है तो वो मजाक का पात्र ही बनेगा। लेकिन अगर उसका मतलब वर्क-स्टेशन या इमेजेज को जोड़ने से है तो यह एक बुद्धिमत्तापूर्ण, व्यवहार्य और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्य विचार है। भारत ने भले ही एक दशक पहले ही प्राइवेट क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन सरकारी स्वास्थ्य क्षेत्र को जोड़ने में यह काफी पीछे रह गया है। हेल्थकेयर को सुनियोजित इन्फोर्मेशन नेटवर्क और विशेषज्ञों की सेवाओं के कुशलतापूर्ण सुविधाओं के साथ डिजिटल इंडिया का एक महत्त्वपूर्ण भाग होना चाहिए। 

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