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जब गुरु नानक से नाराज होकर चले गए थे मरदाना

Bhola Tiwari Jun 27, 2019, 7:00 AM IST टॉप न्यूज़
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सिख धर्म के पहले अनुयायी - भाई मरदाना .

एस डी ओझा

भाई मरदाना आज से तकरीबन 560 वर्ष पूर्व गुरू नानक के गाँव तलवंडी में पैदा हुए थे . इनके पिता का नाम बदरुद्दीन व माता का नाम लक्खा था . इनका परिवार मुस्लिम दलित की श्रेणी में आता था . बचपन से हीं इनका नानक के साथ एक अलौकिक प्रेम था . इन पर " एक ज्योति दुई मूरति " वाली कहावत चरितार्थ होती थी .

बचपन में भाई मरदाना गुरू नानक के साथ पशु चराने जाया करते थे . चारागाह में पशुओं को चरने के लिए छोड़ ये ध्यान लगाया करते थे . गुरू नानक की आवाज मधुर थी . गुरू नानक और भाई मरदाना दोनों ने मिलकर भारतीय शास्त्रीय रागों पर आधारित शबद गायन प्रणाली का विकास किया . भाई मरदाना गुरू नानक के शबदों पर रबाब (सारंगी जैसा एक वाद्य यन्त्र) पर अच्छी धुन निकाल लेते थे . इसलिए इनका नाम भाई मरदाना रबाबी हो गया .

भाई मरदाना रबाबी लगभग 20 वर्षों तक गुरू नानक के साथ परछाईं की तरह लगे रहे और गुरु नानक व भाई बाला के साथ लगभग 4 हज़ार km की यात्रा तय की . गुरू नानक , भाई मरदाना व भाई बाला सबने मिलकर ईरान , इराक़ , अरब अमीरात आदि देशों का दौरा किया . गुरू ग्रन्थ में भाई मरदाना के तीन श्लोक संकलित हैं . भाई मरदाना गुरू नानक के सच्चे भक्त थे , पर तुनक मिजाज भी . एक बार गुरू नानक से नाराज़ होकर भाई मरदाना उनका साथ छोड़कर चले गए थे . लेकिन बाद में भाई मरदाना को अपनी गलती का एहसास हुआ और फिर वो गुरू नानक के पास लौट आए थे .

इस प्रकार भाई मरदाना ने एक रबाबी परिवार की परम्परा कायम की , जो स्वर्ण मन्दिर में शबद कीर्तन किया करते थे . इस परिवार के 17 वीं पीढ़ी के भाई लाल जी का 7 नवम्बर सन् 2012 को लाहौर में निधन हुआ है , जो देश बटवारे के समय पाकिस्तान चले गए थे और वहाँ गुरुद्वारों में शबद कीर्तन कर रहे थे .

अभी फिरोज पुर में भाई मरदाना के नाम की संगीत अकादमी खुलने की चर्चा हो रही है . यदि ऐसा हो गया तो वह इस सिख इतिहास पुरुष को सच्ची श्रद्धांजलि होगी . वो ईश्वर की सत्ता को स्वीकार करते थे , पर वो एकेश्वर वाद को मानते थे . उनका कहना था कि हवा , पानी व आग को बनाने वाला भगवान है . उसी के इशारे पर सारे काम होते हैं .

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