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अंततः बर्लिन की दीवार गिर गयी थी

Bhola Tiwari Jun 26, 2019, 8:38 AM IST टॉप न्यूज़
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एस डी ओझा

जर्मनी के पराभव के बाद सोवियत संघ , अमेरिका , फ्रांस और इंगलैण्ड का संयुक्त रुप से जर्मनी पर अधिकार हो गया । जर्मनी को दो भागों में विभक्त कर दिया गया । पूर्वी जर्मनी और पश्चिमी जर्मनी । इसी तरह से जर्मनी की राजधानी बर्लिन का भी बंटवारा पूर्वी बर्लिन और पश्चिमी बर्लिन के रुप में हुआ । जर्मनी का पूर्वी भाग सोवियत संघ के संरक्षण में था तो पश्चिमी भाग अमेरिका , फ्रांस और इंग्लैण्ड के हिस्से में आया था । समाजवाद और पूंजीवाद के ध्वजवाहक सोवियत संघ और अमेरिका में वर्चस्व की होड़ लगी थी । दिनांक 26 जून 1963 को अमेरिकी राष्ट्रपति जाॅन एफ कैनेडी ने पश्चिमी जर्मनी में एक ऐतिहासिक भाषण दिया था , जिसमें जर्मन भाषा में एक वाक्य कहा था । इस वाक्य का अर्थ था - " मैं बर्लिन वाला हूं " । इस एक वाक्य में कैनेडी बहुत कुछ कह गये थे । उनकी मंशा थी कि वे लोकतांत्रिक व्यवस्था को मानने वाले बर्निल वाले हैं । वे बताना चाह रहे थे कि वे पूर्वी और पश्चिमी बर्लिन की एकजुटता चाह रहे हैं । सोवियत संघ को यह बात चुभ गयी । उसने इस वाक्य का मजाक बना दिया । गौरतलब हो कि बर्लिनर एक तरह का ब्रेड भी होता है । मैं बर्लिन वाला हूं का बन गया " मैं बर्लिनर वाला हूं "। मैं ब्रेड वाला हूं ।

जर्मनी में हिटलर के समय से पूंजीवाद था । सोवियत संघ का समाजवाद पूर्वी जर्मनी के लोगों को पसंद नहीं आया । बड़ी संख्या में पूर्वी बर्लिन से कारीगर , डाक्टर , प्रोफेशर और व्यवसायी भागकर पश्चिम बर्लिन में इकट्ठे होने लगे । इससे सोवियत संघ को आर्थिक और राजनीतिक नुकशान होने लगा । कैनेडी के भाषण के बाद सोवियत संघ और चौकन्ना हो गया था । वाल्टर उल्ब्रिख्त के सुझाव पर सोवियत संघ के प्रमुख ख्रुश्चेव ने मंजूरी दे दी थी । उल्ब्रिख्त का सुझाव था कि बर्लिन में एक दीवार खड़ी कर दी जाय ताकि पलायन बंद हो सके । इस योजना को बेहद गोपनीय रखा गया था । इसकी जानकरी केवल 60 लोगों को हीं थी । पहले तार बाड़ लगाया गया । बाद में दीवार खड़ी कर दी गयी ।

यह दीवार समाजवादी अत्याचार की प्रतीक बनकर रह गयी । प्रत्यक्षतः सोवियत संघ ने यह बहाना बनाया कि दीवार खड़ी करने का मकसद दोनों तरफ हो रही जासूसी को रोकना था , पर इस दीवार के बनने के बाद दिलों का भी बंटवारा हो गया । मां से बेटा बिछड़ा तो पिता से पुत्र भी बिछड़ा । लोग इस दीवार के आस पास आकर रोते थे । अपने परिजनों को ढूंढते थे । हांलाकि दीवार बनने से पलायन रुक गया था । जहां 1949 से 1962 तक 25 लाख लोगों ने पलायन किया था , वहीं दीवार बनने के बाद मात्र 5 हजार लोगों ने पलायन किया । लोग जान हथेली पर लेकर दीवार पार करते थे । सुरंग बनाकर , दीवार पर लगे तार बाड़ को फांद कर और गर्म हवा के गुब्बारे की सवारी कर । बाज दफा वे लोग सोवियत संघ के सुरक्षा बलों की गोली के भी शिकार हो जाते थे । वैसे अमेरिका सोवियत संघ को दीवार बनने से रोक नहीं पाया था ।

1980 के दशक में सोवियत संघ के पतन के साथ सीमा नियमों में कुछ ढील दी गयी । जर्मनी में राजनीतिक उदारीकरण शुरु हुआ था । अंततः हर दीवार गिरती है । इस दीवार को भी गिरना था । यह दीवार भी गिरी । 13 अगस्त 1961 को बनी यह दीवार अंततः 9 नवम्बर 1989 को गिरा दी गयी । इस दीवार को गिरने में कुल 28 साल लग गये थे । जमीन पर दीवार खड़ी की जा सकती है , लेकिन दिलों में दीवार नहीं खड़ी की जा सकती । दिलों में प्यार है तो जमीनी दीवार कुछ नहीं कर सकती । 3 अक्टूबर 1990 को जर्मनी पूरब पश्चिम का भेद मिटाकर फिर एक हो गया था । लोगों ने दीवार को गिराकर उस पर नाच कूद कर जश्न मनाया था । अपने आत्मीय जनों से मिलकर फूट फूटकर रोए भी थे । 

आज बर्लिन की दीवार एक स्मारक के तौर पर मात्र 3 किलोमीटर हीं बची है । लोग आते हैं । इसका एक टुकड़ा निकालते हैं । उसे घर ले जाते हैं । यादगार के रुप में रखते हैं । एक होटल का मालिक इस नेक काम के लिए अपने ग्राहकों बकायदा छेनी हथौड़ी भी मुहैय्या करवाता है । इस दीवार के गिरने से बेमिशाल फासले मिटे थे । दिलों के दरमियान दूरियां कम हुईं थीं । लोग एक दूसरे के गले मिले थे । जीने के लिए और क्या चाहिए था । सब कुछ लोगों को मिल चुका था ।

तुम मिले , दिल खिले ;

और जीने को क्या चाहिए ।

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