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ये दुनिया और वो दुनिया : स्वास्थ्य बनाम खुशहाली

Bhola Tiwari Jun 26, 2019, 8:20 AM IST टॉप न्यूज़
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 प्रवीण झा

(जाने माने चिकित्सक नार्वे)

हालाँकि हम हर किसी ऐरे-गैर सूचकांक की परवाह नहीं करते हैं अपितु पिछले दशक के दौरान ‘वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट’ ने विश्व में अपना महत्त्व दर्ज़ कराया है। वृहत सकल घरेलू उत्पाद और गतिशील औद्योगिक विकास के चलते भारत इस सूचकांक पर अच्छी उछाल मार सकता था परन्तु दुर्भाग्यवश सामाजिक सहायता और स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में ये काफी पीछे रह गया। मज़बूत स्वास्थ्य और सामाजिक सहायता व्यवस्था के दम पर स्कैंडिनेविया के जन-कल्याणकारी राज्य प्रथम चार पायदानों पर डटे हुए हैं। इस वर्ष फ़िनलैंड को प्रथम स्थान प्राप्त हुआ और नॉर्वे उसे कांटे की टक्कर देते हुए दूसरे स्थान पर रहा।

वैसे अमरीका जैसे देश भी इस सूचकाँक पर नीचे गिरे हैं पर भारत ने 133 वां स्थान पा कर बड़ी गिरावट दर्ज़ की है; और पाकिस्तान से कहीं पीछे रह गया है जो 75 वां स्थान प्राप्त करने में सफल रहा। क्या हम इस बात से चिंतित हैं? क्यों नहीं हम सूचकांक पर इस शिकस्त को निरर्थक घोषित कर दें? भारत जन कल्याणकारी राष्ट्र तो नहीं है - बल्कि ये भी सोच सकते हैं कि इतनी बड़ी जन संख्या के लिए मुफ्त शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराना संभव ही नहीं है। शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में देश में निजीकरण इस दशक के उच्चतम शिखर पर है। कम से कम मध्यम वर्ग, जो देश की कुल जनसँख्या का तकरीबन तीन चौथाई हिस्सा है , उसने निजी संस्थानों की ओर रुख कर लिया है। जो गरीब वर्ग है उसके लिए ओबमाकेयर की तर्ज़ पर मोदीकेयर का आश्वासन है। भविष्य आशाजनक दिख रहा है। फिर भी , दो बिलकुल भिन्न समाजों में, यथा स्कैंडिनेविया और भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की तुलना हमें कुछ अर्थपूर्ण निष्कर्षों तक पहुँचा सकती है। 

 एक साधारण उदाहरण लेते हैं। जब आप भारत में बीमार पड़ते हैं तो आप अपॉइंटमेंट लेकर सबसे नज़दीक के या आपके भरोसे के किसी डॉक्टर के पास जाकर इलाज करा लेते हैं. आप अपना डॉक्टर चुनने के लिए स्वतंत्र हैं। नॉर्वे में हर व्यक्ति के लिए एक फॅमिली डॉक्टर निर्दिष्ट है। आपको चाहे जो बीमारी हो पहले आपको उसी डॉक्टर के पास जाना होगा। पीठ दर्द के लिए आप अपने नियत चिकित्सक की अनदेखी करते हुए सीधे हड्डी के डॉक्टर के पास नहीं जा सकते। इस परिप्रेक्ष्य में भारत में स्थिति बेहतर लगती है जहाँ आप सीधे सुपर स्पेशलिस्ट (विशेषज्ञ) के केबिन में प्रवेश पा सकते हैं। परन्तु संसाधन प्रबंधन के परिप्रेक्ष्य से देखा जाये तो भारत में स्वास्थ्य सेवा पिरामिड खारिज कर दिया गया है। यह मानक पिरामिड है जिसमे प्राथमिक, द्वितीय और तृतीय स्तर की सेवाओं की क्रमिक उपलब्धता होती है जिससे कारगर स्वास्थ्य सेवा सुनिश्चित की जाती है. पिरामिड को बाईपास करने का असर एम्स जैसे शीर्ष अस्पताल में मरीज़ों की लम्बी कतारों में देखा जा सकता है। छोटी- मोटी बीमारी और थोड़ी बड़ी बीमारी के लिए भी हर किसी को एम्स का दरवाज़ा खटखटाने की ज़रुरत नहीं। हर न्यायिक मामले के लिए सीधे सर्वोच्च न्यायालय तक नहीं जाया जाता है। पिरामिड की ये अनदेखी एक बड़ी विसंगति है. विशेषज्ञ सेवाओं के इष्टतम उपयोग के लिए देश में इस पिरामिड को सार्वभौमिक बनाना होगा। फॅमिली डॉक्टर यथा हर व्यक्ति के लिए एक चिकित्सक नियत करना और नियोजित रेफरल व्यवस्था को लागू करना व्यवहार्य तो है पर इसके लिए स्वास्थ्य प्रणाली में बड़ा सुधार अपेक्षित है।

 इस और उस दुनिया में जो एक और बड़ा फर्क है वो निजी बनाम सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था है. स्कैंडिनेविया में सभी नागरिकों के लिए अस्पताल में भर्ती किये गए रोगियों (inpatient)के लिए उच्च स्तरीय स्वास्थ्य सेवाएं मुफ्त उपलब्ध हैं. भारत में भी तीन स्तरीय सरकारी अवस्थापना मौजूद है जिसमें विशेषज्ञ सेवाएं शामिल हैं परन्तु यहाँ धन की कमी है (क्योंकि इस क्षेत्र में सकल घरेलू उत्पाद का योगदान कम है ), बीमारियां बहुत ज्यादा हैं और ये व्यवस्था संगठनात्मक कुप्रबंधन से ग्रस्त है। निजी स्वास्थ्य व्यवस्था और भी अव्यवस्थित है तथा निजी और सरकारी स्वास्थ्य सेवा प्रणाली के मध्य कारगर समन्वयन नहीं है। सरकारी विनियमों के छत्र तले नॉर्वे के अनेकानेक निजी स्वास्थ्य संस्थानों के सरकारी अस्पतालों के साथ मज़बूत गठबंधन हैं. इस प्रकार से विनियमों के साथ सरकारी-निजी सेवाओं की सहभागिता आज के भारत की महती आवश्यकता है. सरकारी-निजी सहभागिता का ये मॉडल कई राज्यों में लागू किया भी जा चुका है परन्तु इसे और अधिक सहयोगपूर्ण, समावेशी, किफायती बनाने और विनियमित करने की ज़रुरत है।

 एक और जो पहलू है वो है भारत में मरीजों में मन में बढ़ता अविश्वास जिसके कारण वे दूसरे , तीसरे अनेकों चिकित्सकों की रायशुमारी करते रहते हैं। यूरोप जैसी प्रोटोकॉल आधारित स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था में इलाज सम्बन्धी दिशानिर्देश अंतर्राष्ट्रीय मानकीकरण का अनुपालन करते हैं और एक से दूसरे विशेषज्ञ में कुछ खास अंतर नहीं पाया जाता है। किसी अन्य चिकित्सक की राय तो ली ही जा सकती है परन्तु डॉक्टरों को लाइसेंस देने की प्रणाली इतनी सख्त है कि जो भी सेवा दी जाएगी उसकी गुणवत्ता हर जगह एक समान ही पायी जाएगी. भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद् को भी सुनिश्चित करना चाहिए कि समान योग्यता और अनुभव प्राप्त चिकित्सक समरूप गुणवत्ता युक्त सेवा प्रदान करें। एक ऐसी प्रणाली जिसमें मरीज़ को यह आश्वस्ति रहे कि जो लाइसेंस प्राप्त विशेषज्ञ उसका इलाज कर रहा है उसकी योग्यता पर कोई प्रश्नचिह्न हो ही नहीं सकता जिससे कि वो किसी अन्य चिकित्सक के पास जाने की आवश्यकता महसूस ही न करे।    

 इसके अलावा अन्य प्रासंगिक मुद्दे भी हैं. पर संक्षेप में कहा जाये तो वास्तव में भारत में कुशल स्वास्थ्य कर्मियों की कमी नहीं है और यहाँ अवस्थापना भी मौजूद है। ज़रूरत है तो स्वास्थ्य सेवा पिरामिड को सुचारु बनाने, कारगर रूप से जोड़ने और विनियमित करने की दृष्टि से व्यवस्था में सुधार लाने की. निश्चित ही, स्वास्थ्य सेवाओं का स्तर ऊपर उठाने मात्र से अगले दशक में भारत को एशियाई महाद्वीप का सबसे खुश राष्ट्र बनाया जा सकता है।                                                                            

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