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"सेकंड शाहजहाँ ऑफ द वर्ल्ड"

Bhola Tiwari Jun 26, 2019, 7:39 AM IST टॉप न्यूज़
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 उषा लाल सिंह

मांस का बना शरीर कभी कभी विलक्षण मस्तिष्क का धनी भी होता है जो दिखता तो करोड़ों इंसानों की तरह ही है पर उनके द्वारा किये गए कुछ विशिष्ट कार्य ब्रह्मांड में असंख्य तारों के बीच सूरज या चाँद सा पहचान दिला जाता हैं।

              बिहार की भूमि वैसे भी काफी उर्वर है।बिहार किसी पहचान का मोहताज नहीं। पाषाण काल से लेकर आधुनिक भारत में अपना अलग ही वजूद रहा है इसका। महावीर की जन्मभूमि और बुद्ध की कर्म भूमि रही बिहार से ही कभी मौर्य साम्राज्य का एकछत्र संचालन होता था। स्वतंत्र भारत के प्रथम नागरिक के पद को सुशोभित करने वाले डॉ राजेन्द्र प्रसाद भी यहीं की मिट्टी के उपज थे।

      इन रत्नों को बस किताबों व फिल्मों की माध्यम से जानी हूँ। जब भी बड़े लोगों की जीवनी व कार्य पढ़ती हूँ तो लगता है ये विशेष मिट्टी के रहे होंगे।

जब शिव खेड़ा को पढ़ी तो जानी कि," विजेता कोई अलग काम नहीं करता, बल्कि काम को अलग ढंग से करता है"

शायद ऐसा ही कुछ अलग काम कर रहे थे बिहार के गया जिला के वजीरगंज प्रखण्ड के गेहलौर गाँव के दशरथ माँझी। 

  मुझे ये बताते बहुत ही खुशी हो रही है कि दशरथ माँझी जी मेरे घर पटना में तीन बार आ चुके हैं।ठिगने कद काठी के साथ में लोहे का बड़ा सा खंती,कांधे पर खादी का कपड़े का झोला टांगे मलिन पड़ चुके सफेद कुर्ते-धोती व गले में पतले धागे में बंधी कंठी में पहली बार देखी थी।

पटना में रहने व गाँव से जुड़े होने के कारण अतिथियों का हमारे घर आना जाना कुछ ज्यादा ही होता था।जिससे कभी- कभी मन दुखी भी हो जाता था।पर माँ कभी दुखी नहीं होती थी उन्हें भरा-भरा घर ज्यादा अच्छा लगता था। 

    जब पहली बार दशरथ जी मेरे घर आये थे तो माँ को उनके प्रति बड़े आदर भाव को देखकर सच कहती हूँ उस वक्त मन ही मन खीझ उठी थी,कि माँ भी न ......बाद में चाय- नाश्ता के बाद माँ आने का कारण पूछी, तब उन्होंने बताया था कि लालू जी (तत्कालीन मुख्यमंत्री) से मिलने आये थें तो कल समय दिये है । इनके मुँह से मुख्यमंत्री का नाम और मिलने की बात सुनकर हम माँ के पास आकर बैठ गए थे।मतलब जिज्ञाषा हुई कि ये हैं कौन?

दशरथ माँझी जी पढ़े लिखे नहीं थे , शायद इसलिए औरों की तरह अपना परिचय देने में सक्षम न दिखे।परन्तु उनके झोले में रखी वस्तु उनका परिचय हम सब से करवा रही थी।

उनके झोले में अनगिनत अखबार की कतरन,हिन्दी व अंग्रेजी की पत्रिका भी थी।एक अंग्रेजी पत्रिका में इनके लिए "सेकंड शाहजहाँ ऑफ द वर्ल्ड"लिखा गया था।

तो कोई इनकी पर्वत काटने की कथा बता रहा था।जिसमें जिक्र था कि उनकी पत्नी ठोकर खाकर लहूलुहान हो गई थी। पत्नी को बहुत प्यार करते थे इसलिए मन ही मन प्रण लिए थे कि जो मेरी पत्नी को रुलाया है उसे छोड़ेंगे नहीं। उनकी पत्नी का नाम फ़िल्म में फगुनिया सुने।पर याद है उन्होंने बताया था कि वो प्यार से कलेवा कहते थे। कलेवा मेरे लिए नया शब्द था।जब इसका अर्थ पूछी थी तब बताये थे.....

कलेवा मतलब खाने का कौर (bite) होता है। सच कहती हूँ उस वक्त मन प्रफुल्लित हो गया था। अपने बिल्डिंग के और भी लोगों को इनका छपा दिखाने ले गई थी। सब लोग इनको देखने भी आए थे। पर ये कोई नहीं सोचा कि इनकी प्रसिद्धि राज्य व देश की सीमा लांघ कभी सात समंदर पार भी पहुंचेगी।

आज की तरह पहले मोबाइल नहीं हुआ करता था घर में कैमरा था पर रील नहीं। क्योंकि पहले किसी खास अवसर पर ही रील भरवाया जाता था।आज अफसोस होता है कि उनके साथ हमारे किसी परिवार की कोई तस्वीर नहीं। खैर मैं इनकी बातों से काफी आकर्षित हुई। सारे कतरनों को पढ़ने के साथ ही अनगिनत सवाल भी पूछती जाती।

             वो भी सब बात बताने लगे। उस दिन की ही घटना बताने लगे कि वो जो पहाड़ काट कर रास्ता बनाये हैं उसके पक्कीकरण के लिए ही मुख्यमंत्री से मिलने आये थे। पर गार्ड अंदर जाने ही नहीं दिया। तब हम खंती से लगे दीवाल खोदने। इतने में गार्ड गुस्सा कर डाँटता है कि क्या कर रहा है? तब हम बोले कि , हमरा पहाड़ काटे में त समय नहीं लगा ई दीवार कौन चीज है। जाकर कह दो दशरथ माँझी नाम है मेरा।

शायद इस नाम से आम लोग भले परिचित न थे पर बड़े लोग उन्हें जान रहे थे। तभी लालू जी ने अगले दिन मिलने को बुलाये थे।और अगले दिन के इंतजार के लिए ही शाम में मेरे घर आये थे।

एक कतरन में लिखा था 

"कौन कहता है दिल्ली दूर है...."

मतलब इनके दिल्ली पैदल जाने का जिक्र।जब विस्तार से पूछे तब जो इन्होंने बताया, उसे हम भाई- बहन आँखे फाड़े सुन रहे थे-  ये एक दिन गया से अपने गाँव जा रहे थे।रास्ते में पटरी पर ट्रेन देखें तो इनकी जिज्ञाषा हुई जानने की ,कि ये क्या है?

इन्होंने किसी से पूछा कि ये क्या है?

बताया गया कि रेलगाड़ी है।

इनका पुनः सवाल -

कहाँ जाएगी?

जवाब मिला दिल्ली।

ये फिर पूछे कि दिल्ली कहाँ हैं?

इस बार जवाब मिला , बाबा दिल्ली बड़ी दूर है....

बस यही बात उन्हें लग गई थी कि आखिर कितना दूर है?

अपनी दृढ़ निश्चय के बल पर खंती और और कुछ समानों की गठरी के साथ सत्तू भी साथ में लेकर पटरी के सहारे दिल्ली की ओर निकल पड़े।रास्ते में जहां कहीं भी रुकते स्टेशन मास्टर से कुछ लिखवाकर साइन करवाते।इनकी दिल्ली वाले घटना को फ़िल्म में दिखाया गया है।पर उसमें कुछ और जोड़कर।

रात में इन्हें खाना भी मैं ही परोस कर खिलाई थी।अगले दिन नहा धोकर सुबह का खाना खाकर चले गए।पर अब मुझे इनका इंतजार रहता कि कब मेरे घर आये।

 दूसरी बार जब आये तो मेरे पति भी पटना आये थे।वो भी इन्हें नहीं जानते थे।छत पर इनकी सूखती लँगोटी देख कर ये हमसे पूछे थे कि तुम्हारे घर ये लँगोटी वाला आदमी कौन आया है?

फिर हम उनके बारे में इन्हें सब कुछ बताई।एक बार और आये थे।फिर पिताजी का भी तबादला हो गया।फिर कभी मिलना न हुआ।पर उसी वक्त बताये थे कि मेरे ऊपर फिलिम भी बनेगा।जिसे उस वक्त हम सब यकीन न किये थे।

बाद में जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी ने उन्हें अपनी कुर्सी पर बिठाया तब पेपर में पढ़ी थी।फिर तो कई बार गहलौर घाटी की चर्चा पेपर, टी वी और फ़िल्म में भी देखी।

इधर बहुत दिन से मन में एक इच्छा थी कि कभी गहलौर घाटी और दशरथ माँझी के घर जाऊँगी।

संयोग से पिछले महीने गहलौर जाने का सौभाग्य मिला।उनकी प्रतिमा देख कर आँखे छलछला आई।वहाँ साफ सफाई में लगे राम स्वरूप माँझी जी जिनकी गले की कंठी इनके भी कबीरपंथी होने का सबूत दे रही थी मुझसे बोले आप रो क्यों रहे हैं?

     भरे गले से जब बताई कि ये कभी मेरे घर आते थे।तो वो भी बहुत खुश हुए।बहुत ही अपनेपन से बोले कि यहाँ से रोकर न जाएं इन्हें तकलीफ होगी।

फिर रामस्वरूप जी से ही पूछ कर दशरथ जी के घर गई।जहां उनका बेटा भगीरथ माँझी, उनकी बेटी,और उनका तीन बेटा-बहुओं पोता पोतियों से भरा पूरा परिवार था। 

पर भगीरथ जी की एक मात्र बेटी अंशु है।जो आंगनबाड़ी सेविका है।और आगे स्नातक की पढ़ाई भी कर रही है।उनके पति मिथुन जी से भी मिलना हुआ।जो भगीरथ जी को लेकर कभी- कभार पटना आते हैं।उन्हें अपना मोबाइल नम्बर और पता उनके कॉपी पर लिख आई हूँ कि कभी जरूरत पड़े तो बेझिझक आइयेगा।मुझे बहुत खुशी होगी।

            भगीरथ जी से बात चीत के क्रम में जानी कि एक बीघा अपना जमीन है।चार बीघा बट्टाई जोत रहे हैं।पर इस बार धान की उपज अच्छी नहीं हुई है।

सरकार द्वारा दी गई जमीन पहाड़ के किनारे बंजर व ऊसर भूमि है जो वर्तमान में उनके किसी काम का नहीं।हाँ ये अलग बात है कि उसपर पूंजी लगा कर कुछ दुकान या कम्पनी स्थापित की जा सकती है।जो सरकार के सहयोग से ही सम्भव है।

             जिन्हें कभी रूबरू देखी थी आज उनके बुत देख कर मन हर्ष व दुःख से भर गया।

          इनकी दो प्रतिमा लगाई गई है।एक घर के पास रोड पर।दूसरी गहलौर घाटी मतलब जहां पहाड़ काटकर रास्ता बना है वहाँ काले पत्थर की मूर्ति।काला वाला मूर्ति उनकी सजीवता का अहसास कराता है।पर सदा उनके साथ रहने वाला खंती न रहने के कारण कुछ अधूरा से लगा।रामस्वरूप माँझी जी पूछने पर बताये कि मूर्ति स्थापना के समय खंती और हथौड़ी भी बना था पर टूट गया।

     आज दशरथ माँझी जी के नाम पर "दशरथ माँझी कौशल विकास योजना" चलाई जा रही है।पर इनके आश्रित आज भी पारंपरिक पेशा कृषि से ही जुड़े है।थोड़ी जमीन खुद की तो थोड़ी बट्टाई की खेती।

       गाँव से वजीरगंज प्रखण्ड की दूरी करीब 45 किलोमीटर है जो इस रास्ते के बन जाने से 13 किलोमीटर में सिमट कर रह गई है।

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