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और कितने धृतराष्ट्र.......??

Bhola Tiwari Jun 25, 2019, 8:08 AM IST टॉप न्यूज़
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नीरज कृष्ण 

पटना : लगभग 22 वर्ष पूर्व दिल्ली के उपहार सिनेमा में 13 जून 1997 को लगी आग में 59 लोगों की मौत हो गई थी। इसी वर्ष 19 फरवरी को दिल्ली के बसंत विहार स्थित जे पी होटल में लगी आग में कई लोगों की जान चली गयी।

अब 24 मई 2019 को सूरत में तक्षशिला कोचिंग इंस्टीटूट में आग लगने से मारने वालों की संख्या 21 थी। देश के तमाम समाचार माध्यमों ने इस समाचार को प्रमुखता से अपने अपने समाचारपत्रों में स्थान दिया परंतु यह किसी भी अखबार ने नहीं लिखा कि आग लगने से मरने वाले 19 बच्चों में 16 लड़कियां हैं। मरने वालों की संख्या 21 बताई है, पर यह बात शीर्षक में नहीं है और ना कहीं हाईलाइट की गई है। खबर के मुताबिक, 21 लोग मरे हैं इनमें 20 जिन्दा जल गए और एक बच्चे की कूदने से मौत हुई। मरने वालों में 18 लड़कियां हैं। सभी की उम्र 15 से 22 साल की थी।

इस घटना के बाद मेरी व्यख्याता मित्र अनीता यादव जी ने तत्क्षण ही दिल्ली स्थित मुखर्जी नगर में रह रहे उन छात्रों के सुरक्षा को लेकर लिखा जो नारकीय स्थिति में रहकर......देश की सबसे बड़ी एवं प्रतिष्टित प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी में संलग्न हैं। उन्होंने बहुत ही जायज प्रश्न को सामने लाया है।

आजकल मेरे शहर और बिहार की राजधानी पटना की स्थिति भी मुखर्जी नगर से कम बदतर नही है। पैसे की हवस में स्थानीय निवासी या तो खुद या किसी के माध्यम से जिस प्रकार से अपने आवासीय परिसर में बॉयज होस्टल/गर्ल्स हॉस्टल खोल रहे हैं.....। यह आने वाले बड़े खतरे की संकेत है।

पटना के आसपास के जिले जहां शैक्षणिक सुविधाएं नगण्य है और अभिभावक लाचारी की स्थिति में अपने बच्चों को जिस तरह से पटना के असुरक्षित होस्टल्स में अपने बच्चों को भगवान के भरोसे छोड़ रहे हैं....देखकर भय होता है। खासकर गर्ल्स हॉस्टल......10x12 वर्ग फ़ीट के कमरे में जानवरों की तरह चार-चार लड़कियों को रखा जा रहा है। घर के बाउंड्रीवाल को दस-पंद्रह फ़ीट ऊंचे शेडों से घेर दिया जा रहा है......किसी भी होस्टल में एक भी फायर एक्सटिंविशर नही है, न आपातकालीन स्थिति से निपटने के कोई उपाय ही शेष हैं। भागने के लिए एक मात्र सहारा संकरी सीढियां हैं। होस्टल की चौहद्दी में......50 वर्ग फ़ीट खाली स्थान नहीं है। सड़कों पर बेतरतीब तरीके से पार्किंग.......यदि किसी प्रकार से आगजनी की घटना घट गई तो एक भी बच्चे को बचा पाना असंभव हो जाएगा। 

स्थानीय प्रशासन को इससे कोई लेना- देना नही है। सरकारों को अपने ही बनाये हुए नियमों की जानकारी नहीं है........।

मैं न अभी किसी सरकार को दोषी करार दे रहा हूँ ना कि सरकारी विभागों की अकर्मण्यता पर बात करना चाह रहा हूँ.......। मेरा सीधा सा सवाल खुद से है कि हम पैसे की हवस में और कितने अंधें बनेगें। सरकार या तंत्र ही दोषी सिर्फ क्यों है......। करोड़ो रूपये कमाने वाले कोचिंग संस्थान की क्या यह जिम्मेवारी नही है कि वे बच्चों की सुरक्षा पर भी ध्यान दें। आखिर हम कब तक धृतराष्ट्र बने रहेंगे। कबतक हम अपने बचाव के लिए दूसरे को दोषी ठहराते रहेंगे। 

चलते-चलते....

1. क्या किसी भी सरकारी तंत्र या समाचार पत्र समूह ने हमे यह जानकारी दी है कि आपातकालीन स्थिति में हमें आपने मोबाइल से मदद मांगने के लिए 100, 101, 102 या 108 नम्बर लगाने के पहले शहर का std कोड भी लगाना है या सीधे नम्बर लगाना है।  

विदेशों में आपातकालीन स्थितियों से निपटने के लिए सिर्फ एक नम्बर ही प्रयोग में लाये जाते हैं। आप संकट की स्थिति में नम्बर को प्रयोग में लायें...... आपके दरवाजे पर सभी आपातकालीन सेवाएं प्रदान करने वाली संस्थाओं के वाहन तुरंत हाजिर हो जाएंगे.....जिनका काम है वे अपने कार्य मे लग जायेंगे..... शेष वापस अपने गतंव्य पर लौट जाएंगे।

2. क्या हमें कभी यह सिखाया गया है किसी भी माध्यम से कि-----आगजनी के दौरान अपने कमरों के दरवाज़ों के नीचे खाली जगहों में गीले तौलिये लगा दिया जाये और खाली जगहों को सील कर दिया जाये, जिससे धुआं उनके कमरों तक नहीं पहुंच सके या बहुत कम मात्रा में पहुंचे।

3. क्या हमें यह बात बार बार याद दिलाई जाती है कि आगजनी के दौरान अपनी नाक पर गीले रुमाल बांध लिया जाये, जिससे हमारे फेफड़ों में धुआं प्रवेश न कर सके।

4. क्या हमें यह बताया गया है कभी कि आगजनी के दौरान हमें अपने कमरों के फर्श पर औंधे लेट जाना चाहिए क्योंकि धुआं हमेशा ऊपर की ओर उठता है।

क्या हमारे डिजाइनर पत्रकार अपने-अपने टीवी चैनलों/अखबारों के माध्यम से यह बार बार याद दिलाते रहते हैं कि आप उपरोक्त तरीकों को अपनाकर अपने को तबतक सुरक्षित या जीवित रख सकते हैं जब तक बचावकर्मी आप तक पहुंच न जाएं।

क्या हमारी आज की डिजानर पत्रकारिता का यह कर्तव्य नही है कि सप्ताह में एक दिन इस तरह की बातों को अपने-अपने माध्यमों से आम जनता तक इन बातों को पहुंचाती रहे कि आग लगने की स्थिति में ज़्यादातर मौतें शरीर में धुआं जाने से होती हैं, जबकि आग के कारण कम होती हैं।

 आगजनी की स्थिति में हम लोग धैर्य से काम नहीं लेते हैं और इधर से उधर भागने लगते हैं। भागने से हमारी सांसें तेज़ हो जाती हैं जिसके कारण बहुत सारा धुआं हमारे फेफड़ों में प्रवेश कर जाता है और हम बेहोश हो जाते हैं और ज़मीन पर गिर जाते हैं तथा फिर आग की लपटों से घिर जाते हैं।

गले फाड़-फाड़ कर सिर्फ यह चिकरने से कि हम मंगल पर चले गए, हमने बुलेट/कैप्सूल ट्रेन की खोज कर ली......उसने 55 वर्षों में यह किया और हमने 10 वर्षों में वह किया......से बेहतर है कि हम विदेशी मुल्कों से मानवीय जीवन के मूल्यों को सीखने की ज्यादा जरूरत है जहां नियाग्रा फॉल में फंसे एक पशु को भी बचने के लिए, देश अपनी पूरी संसाधनों को झोंक देती है और हम आजादी के 72 वर्षों बाद हाइड्रोलिक लिफ्ट न होने के कारण देश के नोनिहलों को आग में स्वाहा होते बेशर्मी से देखते रहे।

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