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राजनैतिक वृद्धि केवल नेतागिरी नहीं

Bhola Tiwari Jun 25, 2019, 6:40 AM IST टॉप न्यूज़
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प्रवीण झा

(जाने माने चिकित्सक नार्वे)

हालिया एक मशहूर समाजशास्त्री से बतियाने का मौका मिला। उनकी एक थ्योरी है प्रवासी भारतीयों के राजनैतिक वृद्धि पर। उनके तीन समूह है- पहले में भारतीय, जो संपत्ति और शिक्षा वृद्धि में जितने ही आगे रहे हैं, राजनैतिक वृद्धि में पीछे। दूसरे में मेक्सिकन, आर्मीनीयन और अफ्रीकी लोग जिन्होंने राजनैतिक झंडा गाड़ा है, भले ही आर्थिक वृद्धि न हुई हो। तीसरे में यहूदी, जो दोनों में सफल रहे। 

इसमें सामाजिक संरचना और झुकाव का मूल-मंत्र कहीं न कहीं छिपा है। आप राजनैतिक वृद्धि को नेतागिरी से न जोड़ें। अंग्रेज़ी का ‘पोलिटिकल पावर’ नेतागिरी से आगे है। ऐसे देश हैं जहाँ भारतीयों की जमीनी संपत्ति सबसे अधिक है पर उन्हें कोई नहीं पूछता। पूँजीवादी समय में भी शक्ति का अर्थ धन-संपत्ति नहीं है, यह बात चौंकाती है। 

यह सब मनोदृष्टि का मामला है। भारत का एक बड़ा समूह चुपके से धन अर्जित कर, बच्चों को अच्छी शिक्षा देकर खुश रहना चाहता है। उनको इस बात की फिक्र नहीं कि उनकी चलती कितनी है? उनकी सामाजिक पहुँच कितनी है? क्या उनमें यह सामर्थ्य है कि वो अपने घर के सामने की टूटी सड़क बनवा लें? अगर नहीं तो उनके अरबपति होने से समाज को क्या मिला? समाज को छोड़िए, उन्हीं को क्या मिला? सड़क तो टूटी ही रह गयी। समस्या यह है कि शिकायत करने वाले लोगों के पास पूँजी नहीं। पूँजी वालों को कोई शिकायत नहीं। वो बढ़िया ए.सी. गाड़ी लेकर निकल जाएँगे, ट्रेन चले न चले। बिजली नहीं आती तो ज़ेनरेटर खरीद लेंगे। 

अंबानी-अडानी को गाली देना और बात है। पर जब कुछ धन्ना सेठों के ‘इकॉनॉमिक पावर’ का रूपांतरण ‘पोलिटिकल पावर’ में होता है, मैं कहीं न कहीं खुश भी होता हूँ। सोचिए हमारे पास पड़ा एक-एक रूपया अगर कुछ ‘पोलिटिकल पावर’ में बदल जाए, तो क्या हो। अभी तो पैसे से बस लौकी खरीद रहे हैं।

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