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"मध्यपूर्व में शांति स्थापित करने के उद्देश्य से पचास अरब डाँलर की योजना "पीस टू प्रोस्पेरिटी" पेश किया अमेरिका ने

Bhola Tiwari Jun 24, 2019, 11:00 AM IST टॉप न्यूज़
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अजय श्रीवास्तव

साल 2017 में अमेरिका ने विवादित यरूशलेम में अपना दूतावास खोलकर यरूशलेम को इजराइल की राजधानी के रूप में मान्यता दे दी थी।इस कार्यक्रम में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बेटी और दामाद ने शिरकत की थी और राष्ट्रपति ट्रंप ने वीडियो पर इस क्रार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा था कि इस घडी का लंबे समय से इंतजार था।

जिस वक्त यरूशलेम में अमेरिकी दुतावास का उद्घाटन हो रहा था उसी समय गजा सीमा पर इसराइली सैनिकों के साथ फलस्तीनियों की झपड में कम से कम 55 फलस्तीनी मारे गए और 2700 लोग बुरी तरह घायल हुए थे।

डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने से पहले अमेरिका, इजराइल और फिलिस्तीन संघर्ष को दो राष्ट्र समाधान की नीति के तहत देखता था मगर डोनाल्ड ट्रंप कहते हैं कि अमरीका इजरायल-फलस्तीनी संघर्ष में दो दशक पूरानी "दो राष्ट्र समाधान की नीति से बंधा हुआ नहीं है।ट्रंप की मध्यपूर्व की नीति बिल्कुल अस्पष्ट और एकतरफा है।अमेरिका ने यरूशलम में अपना दूतावास खोलने से पहले किसी भी मित्र राष्ट्र से सलाह लेने की जहमत भी नहीं उठाई जो उसके अख्खड़पन को हीं प्रर्दशित करती है।यूरोपीय संघ और अरब देशों ने ट्रंप के इस निर्णय की कडी आलोचना की है।एक तरफ आप फिलिस्तीन के नेताओं से बातचीत करते हैं दूसरी तरफ विवादित यरूशलम में आप अपना दूतावास खोल उसे इजरायल की राजधानी के रूप में मान्यता देते हैं।

"पीस टू प्रोस्पेरिटी" नाम की इस योजना के तहत अमरीका मध्यपूर्व में शांति स्थापित करने के उद्देश्य से पचास अरब डाँलर का निवेश विभिन्न परियोजनाओं में करेगा।इस योजना के अनुसार अमेरिका फलीस्तीनी इलाकों को जोड़ते हुए एक नया काँरिडोर बनाएगा जिसके जरिए इस प्रांत में व्यापार को बढ़ावा दिया जाएगा।अमेरिका फलस्तीनी अर्थव्यवस्था में सुधार लाने के लिए और उसे पडोसी अरब मुल्कों से रेल और सडक माध्यम से जोडने के लिए एक ग्लोबल इंवेस्टमेंट फंड की आवश्यकता है।अमेरिका सोचता है कि फलीस्तीन में कई पीढियों ने मुश्किल परिस्थितियों में जीवन गुजारा है लेकिन अब इसका अगल अध्याय आजादी और सम्मान का होगा।व्हाइट हाउस का दावा है कि फलस्तीनी लोगों के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा बनाई जा रही ये योजना अब तक की सबसे महत्वाकांक्षी और विस्तृत योजना है और इस योजना को लागू करने के लिए दस साल वक्त बताया है।

व्हाइट हाउस द्वारा जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि इसके तहत सबसे अधिक निवेश गजा और वेस्टबैंक में किया जाएगा,जबकि कुछ निवेश जार्डन, मिस्र और लेबनान में भी होगा।इस पूरी योजना में निर्माण और व्यापार से जुडी करीब 179 छोटी बडी परियोजनाएं हैं।

फलस्तीन ने राष्ट्रपति ट्रंप की इस महत्वाकांक्षी योजना को खारिज कर दिया है और कहा है कि फलस्तीन के इलाकों पर इसराइली कब्जे को नजरअंदाज कर योजना बनाई गई है।पीएलओ का कहना है कि ये योजना फलस्तीन के लोगों का प्रतिनिधित्व नहीं करती और इस कारण ये सफल नहीं होगी।पीएलओ की कार्यकारी समिति की सदस्य हनान अश्रवी ने सोशल मीडिया पर लिखा,"पहले आप गजा की घेराबंदी खत्म करे और हमारी जमीन, संसाधनों और धन की जो चोरी इसराइल कर रहा है उसे रोकें।हमें हमारी आजादी दे और हमारी सीमाओं, हवाई क्षेत्र और पानी पर हमारा अधिकार दें।हम स्वत्रंत और संप्रभु लोगों को आप एक समृद्ध अर्थव्यवस्था बनतें देखेंगे।"

फलस्तीन ने बहरीन में 26,26 जून को होने वाली बैठक में शामिल होने से भी इंकार किया है।

आपको बता दें इजरायल के चारों तरफ मुस्लिम देश हैं जो यहूदियों को देखना पसंद नहीं करते।14 मई 1948 को इजरायल ने अपने आप को स्वत्रंत घोषित किया,फलस्तीनियों ने इसका खूब विरोध किया मगर जब इजरायली सेना विद्रोहियों को मारने लगी तब साढे सात लाख फलीस्तीनी सेना के डर से घरबार छोडकर भाग गए जबकि फलीस्तीनियों का कहना है कि सेना ने उन्हें भगा दिया।लेकिन इजरायल इस कहानी को नहीं मानता।उसका दावा है कि फलीस्तीनी लोग उनकी वजह से नहीं बल्कि मिस्र, जार्डन, सीरिया और इराक के हमले की वजह से भागे थे।जब ये संघर्ष खत्म हुआ तो इजराइल ने फलीस्तीनियों को उनके घर वापस नहीं लौटने दिया,उनका तर्क था कि मकान के मालिक गैरहाजिर थे इस वजह से सरकार ने उनके घरों को जब्त कर लिया।

संयुक्त राष्ट्र संघ ने सीमाओं पर शर्णार्थियों के लिए कैंप लगाए और वे उन्हीं में रहने लगे।इजरायल के गठन और लाखों फलस्तीनियों के पलायन के बाद फलस्तीनी राष्ट्रीय आंदोलन और तेज हो गया।साल 1956 में स्वेज नहर पर नियंत्रण को लेकर मिस्र और इजरायल में ठन गई और युद्ध जैसे हालात बन गए मगर फ्रांस और इंग्लैंड की मध्यस्थता से ये मामला सुलझ गया।

1967 में अरब-इजरायल का महत्वपूर्ण युद्ध हुआ जिसमें इजराइल ने अरब की फौज को धुल चटाते हुए उसके बहुत से एरिया में कब्जा कर लिया।ये युद्ध केवल छह दिनों तक चला मगर इस युद्ध ने इजराइल को बहुत मजबूत बना दिया।इजराइल ने मिस्र से गाजापट्टी और सिनाई प्रायद्वीप, जार्डन से पूर्वी येरुशलम समेत वेस्टबैंक और सीरिया से गोलान हाइट्स को अपने कब्जे में ले लिया।एक बार फिर पाँच लाख फलीस्तीनी घर बार छोड़कर भागे।

आज फलीस्तीन अपना ऐरिया चाहता है जो संघर्ष के दौरान इजरायल ने कब्जा कर लिया था मगर इजरायल एक इंच भी जमीन छोड़ने को तैयार नहीं है।अगर हम निष्पक्ष रूप से देखें तो जो जमीनें इजरायल ने कब्जा कर रखी है वह फलीस्तीनियों की है।पिछले तीस सालों में इजराइल ने अपने आप को इतना मजबूत कर लिया है कि कोई भी देश उसका नुकसान कर बच नहीं सकता ये तो तय है।

अमेरिका एक तरफ दो राष्ट्र समाधान की नीति से पीछे हट रहा है तो दूसरी तरफ दूनिया को ये दिखला रहा है कि उसे फलीस्तीनियों की चिंता है।एक तरफ आप यरूशलेम में अपना दूतावास खोलकर उसे इजराइल की राजधानी के रूप में मान्यता देते हैं दूसरी तरफ वो फलीस्तीनियों से बातचीत की भी उम्मीद करते हैं।अमेरिका की इस दोगली नीति को पीएलओ ने पूरी तरह खारिज कर दिया है और कहा है कि वो अमेरिका द्वारा प्रायोजित किसी भी बातचीत में शामिल नहीं होंगे।

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