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उत्तम नेतृत्व से सफलता !!

Bhola Tiwari Jun 24, 2019, 6:00 AM IST टॉप न्यूज़
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 नीरज कृष्ण

स्वातंत्रोंतर भारत में लोकतान्त्रिक प्रक्रिया अपनाने के बाद संभवतः यह अहला आम चुनाव था, जो दल एवं नीतिओं से परे जाकर नेतृत्व के आधार पर लड़ा गया। एक ओर जहाँ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी राष्ट्रवाद एवं विकास की स्पष्ट नीतियों को लेकर चुनाव प्रक्रिया में शामिल हुए, वहीँ राहुल गांधी की नीति एवं नेतृत्व चुनाव के अंतिम चरण तक स्पष्ट नहीं हो सका। ऐसा भरतीय इतिहास में पहली बार नहीं हुआ है। यदि गहनता से श्रीरामचरितमानस का अध्ययन किया जाये, तो उसमें भी हम देखते हैं कि आदि कवि तुलसीदास ने श्रीराम के सफल नेतृत्व व गुणों पर गहनता से प्रकाश डाला है।

इंजन चलता है, डिब्बे नहीं। अच्छा इंजन रहने से खराब डिब्बे भी दौड़ पड़ते हैं। यदि इंजन खराब है तो अच्छे डिब्बे भी खड़े रह जाते हैं। ठीक ऐसी ही भूमिका किसी संस्था में नेतृत्व की होती है। राम-रावण–युद्ध में निश्चित ही श्रीराम का नेतृत्व अच्छा था। अतः उनकी सेना विजयी हुई। जहाँ राम के प्रति प्रेम के कारण उनकी सेना प्राणों का बलिदान करने को तैयार है, वहीं रावण द्वारा अपने सैनिकों में भय उत्पन्न किया जा रहा है। वह अपने सैनिकों से कहता है कि जो रणभूमि से भागेगा, उसका वध मैं करूँगा। तुम सभी ने खूब खाया-पीया है, नाना प्रकारके भोग किये हैं, अब लड़ाई के मैदान में प्राण प्रिय लग रहे हैं-

जो रन बिमुख सुना मैं काना।

 सो मैं हतब कराल कृपाना॥

सर्बसु खाइ भोग करि नाना।

 समर भूमि भए बल्लभ प्राना ।। 

भयपूर्ण वातावरण में व्यक्ति अच्छा परिणाम नहीं दे सकता। भय उत्पन्न करने वाले संस्था प्रमुख के प्रति उसके लोगों का प्रेम एवं समर्पण स्वतः कम हो जाता है। अपने लोगों की रक्षा करने वाले मुखिया के प्रति दल का विश्वास बढ़ता है और कार्य भी अच्छा होता है। श्रीराम कठोर परिस्थितियों में भी अपने लोगों की समुचित रक्षा करते हैं। अतः उनकी सेना भयमुक्त हो उनके लिये लड़ रही है। रावण ने विभीषण के प्रति एक प्रचण्ड शक्ति छोड़ी। विभीषण उसे कदापि सहन नहीं कर सकता था। विभीषण को पीछे करके श्रीराम उस शक्ति को स्वयं अपने ऊपर सह लेते हैं।

आवत देखि सक्ति अति घोरा। 

प्रनतारति भंजन पन मोरा।।

तुरत बिभीषन पाछे मेला। 

सन्मुख राम सहेउ सोइ सेला।। 

श्रीराम का यह गुण उनकी सेना में सुरक्षा के साथ-साथ साहस का भी संचार करता है। सुरक्षा की भावना साहस पैदा करती है। अपने हितैषियों की बात सुनना, उनको उचित महत्त्व देना रावण के स्वभाव में नहीं है। भाई विभीषण एवं मन्त्री माल्यवन्त रावण को अत्यन्त विनयपूर्वक समझाते हैं कि राम से युद्ध करना ठीक नहीं। रावण उनकी बातों पर विचार न करके उन्हें सभाभवन से ही बाहर निकालने के लिये सेवकों को कहता है-

रिपु उतकष कहत सठ दोऊ। 

दूरि न करह इहाँ हुइ कोऊ।। 

माल्यवन्त तो शासकीय सेवक है। वह तत्काल घर चला जाता है, परंतु विभीषण तो भाई है; उसके लिये घर चले जाना उतना आसान नहीं है। विभीषण पुनः निवेदन करना शुरू करता है- 

माल्यर्वत गृह गयउ बहोरी। 

कहइ बिभीषनु पुनि कर जोरी।। 

परंतु रावण कोई राय सुनने को प्रस्तुत ही नहीं। वह लात मारकर विभीषण को निष्कासित कर देता है। अपने हठ पर कायम रहना, उचित मन्त्रणा को महत्त्व न देना तथा अपने सुहद को सार्वजनिक रूप से अपमानित करना अच्छे नेतृत्व का परिचायक नहीं है। उत्तम नेतृत्व के अभाव में रावण की सेना हारती है और उसका वध होता है। इसके विपरीत अपने लोगों और सलाहकारों से असहमत भी होना होता है तो भी भगवान् श्रीराम उनके विचारों का पूरा सम्मान करते हैं तथा तर्क सहित अपना निर्णय बताते हैं। इससे न केवल अच्छी मन्त्रणाएँ उनके पास आती हैं अपितु उनके लोग आत्मीयता का भी बोध करते हैं। रावण द्वारा निकाले जाने पर विभीषण भगवान् श्रीराम के पास आ गया है। भगवान् श्रीराम को विभीषण के आने का समाचार दिया जाता है। सुग्रीव उनको मन्त्रणा देते हैं कि राक्षसों की माया जानी नहीं जाती, पता नहीं यह किस कारण आया है, हो सकता है गुप्तचरी के उद्देश्य से आया हो। अतः इसे बन्दी बना लेना चाहिये- 

जानि न जाइ निसाचर माया। 

कामरूप केहि कारन आया ।। 

भेद हमार लेन सठ आवा। 

राखिअ बाँधि मोहि अस भावा॥ 

सुग्रीव को इस राय से भगवान् श्रीराम सहमत नहीं है, परंतु फिर भी इस राय की प्रशंसा करते हैं और इस राय को न मानने का कारण बताते हैं। वे सुग्रीव से कहते हैं कि आपको राय अच्छी है परंतु मैं शरणागत को रक्षा के लिये प्रतिबद्ध हैं। 

सखा नीति तुम्ह नीकि विचारी। 

बम पन सरनागत भयहारी॥ 

वे सुग्रीव को सन्तुष्ट करने के उद्देश्य से कहते हैं कि यदि यह भेद लेने भी आया है तो भी कोई हानि नहीं है, क्योंकि लक्ष्मण सारे राक्षसों का क्षण मात्र में नाश करने में सक्षम है। दोनों ही स्थिति शरण में आया है अथवा भेद लेने, विभीषण को वे लाने का आदेश देते हुए श्रीराम कहते हैं- 

भेद लेन पठवा दससीसा। 

जब न कछु भय हानि कपीसा॥ 

जग महूं सखा निसाचर जेते। 

लछिमनु हन्इ निमिष महुँ तेते॥ 

जो सभीत आवा सरनाई। 

रखियउँताहि पान की नाई॥ 

श्रीराम अपने लोगों का आदर करते हैं तथा उनकी बात से असहमत होने पर भी उसे महत्त्व देते हैं। अतः महान् नायक हैं। रावण अपने ही लोगों में भय उत्पन्न करता है तथा उन्हें भयाक्रान्त कर कार्य लेना चाहता है। अतः वह अच्छा नायक हो नहीं सकता। उसे अपने दल का नहीं अपने व्यक्तिगत बल का अधिक विश्वास है। वह घोर अहंकारी है। उसका अहंकार उस समय भी कम होने का नाम नहीं ले रहा है, जबकि उसके अधिकांश योद्धा मारे जा चुके हैं। वह कहता है कि युद्ध मैंने अपने बलबूते छेड़ा है, जिसे जाना हो जाय में अकेले ही शत्रु को उत्तर दे दूंगा- सुभट बोलाई दसानन बोला। 

रन सन्मुख जा कर मन डोला॥ 

सो अवही बरु जाड पराई।

संजुग विमुख भएँ न भलाई॥ 

निज भुज मैं बयरु बढ़ावा। 

देहउँ उतरु जो रिपु चढ़ी आवा।। 

उसे अपने दल पर नही, मात्र अपने बल पर विश्वास है। अतः वह अच्छा नायक होने के सर्वथा अयोग्य हैं। इसके विपरीत श्रीराम न केवल अपने लोगों पर विश्वास है, बल्कि वे उनके कार्यो को प्रशंसा भी करते रहते हैं। श्रेय अपनी झोली में न डालकर अपनों में बाँट देते हैं। लंका जलाकर लौटे हनुमान जी की वे प्रशंसा करते समय पूरी तरह भावविह्वल हो जाते हैं। 

पुनि पुनि कपिहि चितव सुरत्राता।

लोचन नीर पुलक अति गाता।। 

अच्छे नेतृत्व के लिये आवश्यक है कि लोगों पर विश्वास किया जाय, उनकी राय को महत्त्व दिया जाय, भयमुक्त वातावरण बनाया जाय तथा अपने दल को सुरक्षा प्रदान की जाय। अधीनस्थों में भय उत्पन्न करना अच्छे नेतृत्व का परिचायक नहीं है। वाल्मीकीय रामायण तथा तुलसीकृत श्रीरामचरितमानस के मनन से हमें उत्तम नेतृत्व के अनेक गुणोंका ज्ञान होता है, जिन्हें अपने व्यक्तित्व में आत्मसात् करके हम व्यक्तिगत एवं सांगठनिक दक्षता प्राप्त कर सकते हैं। नायक को मुख के समान होना चाहिये, जो व्यक्तित्व का परिचायक है, जो आहार ग्रहण करनेके लिये तो एक ही है, परंतु विवेकपूर्वक सारे शरीर का पालन-पोषण करता है। नायक का गुण बताते हुए भगवान् श्रीराम भरत से कहते हैं-

मुखिआ मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक। 

पालइ पोषइ सकल अँग तुलसी सहित बिबेक॥ 

नेतृत्व को अवधारणा एवं कला पर प्रबन्धन शास्त्रियों ने पर्याप्त साहित्य उपलब्ध कराया है। परंतु इन दोनों महाकवियों ने रामकथा के माध्यम से नेतृत्व कला के अनेक महत्त्वपूर्ण पहलुओं को बारीकी से छुआ है। ये बातें हमारा संस्कृति एवं विरासत से जुडी होने के कारण शीघ्र हृदयंगम होती हैं। हमें इन ग्रन्थों को धर्म तथा काव्य के अलावा प्रबन्धन की दृष्टि से भी देखना चाहिये।

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