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इनको न छुट्टी चाहिए, न आराम

Bhola Tiwari Jun 23, 2019, 7:01 AM IST टॉप न्यूज़
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प्रवीण झा

(जाने माने चिकित्सक नार्वे)

दक्षिण कोरिया मेरा प्रिय देश तो है ही, और इनकी तुलना मैं अफ्रीकी गैंडों से करता रहा हूँ। पर यह देश भी कभी लुंज-पुंज देश ही था। 1998 ई. में अचानक यह देश डूब गया। सैम्संग कंपनी बंद हो गयी। किया मोटर्स और डायवू बिक गया। बैंक कंगाल हो गये। देश की आधी जनसंख्या गरीबी रेखा के नीचे चली गयी।

अचानक इस देश के हर व्यक्ति पगला गए। पूरे देश ने मिलकर दिन-रात काम करना शुरू किया। डूबती कंपनियों को उठाने के लिए पूरा देश लग पड़ा। लोग अठारह घंटे तक काम करते, वेतन कम लेते, और वहीं कंपनी में सो जाते। कंपनी के अंदर शरणार्थी कैंपों की तरह एक के ऊपर एक खाने वाले शयनकक्ष बन गए। बड़े से छोटे कर्मचारी वहीं सो जाते। कंपनी वाले उनके भोजन का बढ़िया इंतजाम करते। सब साथ खाते और काम करते। हर शाम शराब पीना भी शुरू हो गया। काम करना, शराब पीना और फिर काम पर लग जाना।

महिलाओं ने घर की जिम्मेदारी सँभाल ली। पुरूषों ने कंपनियाँ संभाल ली। चार वर्ष के अंदर दक्षिण कोरिया अपनी समृद्धि में वापस लौट आया। छोटा सा कोरिया विश्व के पंद्रह अमीर देशों में खुमार हो गया। लेकिन इस प्रक्रिया ने कोरिया की जीवनशैली ही बदल दी। कर्मी अब भी काम करते रहे, शराब पीते रहे, कंपनी में ही खाते-पीते-सोते रहे। वो पूरी तरह बैल बन गए। उनकी मानवीय भावनाओं पर जो असर हुआ, उसकी बात फिर कभी।

मेरे मित्र 2003-06 तक वहाँ रहे जब कोरिया धनी बन चुका था, पर बैल तो बैल ही थे। उन्होंने आज तक इतने कर्मठ लोग नहीं देखे, जिन्हें न छुट्टी चाहिए, न आराम। इनके लिए वर्कॉहलिक का अर्थ वर्क और अल्कोहल बन गया। अब माहौल बदला है, पर उस शैली की छाप अब भी है।

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