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प्रकृति की लीला : एक किलोमीटर के फासले पर कहीं सूखा कहीं बाढ़

Bhola Tiwari Jun 23, 2019, 6:12 AM IST टॉप न्यूज़
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दिनेश मिश्रा

बिहार में कहीं सूखा तो कहीं बाढ़, कहीं बाढ़ और सूखा थोड़े से फासले पर साथ-साथ या फिर क्रमवार पड़ते दिखाई पड़ते हैं. पूरी तरह से बाढग्रस्त होना या पूरी तरह से सूखा ग्रस्त होना तो सबके समझ में आता है मगर बिहार के साथ समस्या यह है कि अगर स्थानीय वर्षा के साथ-साथ हिमालय वाले ऊपरी जल ग्रहण में भी वर्षा एक साथ हो गई तब तो फिर उत्तर बिहार में बाढ़ ही आएगी. यह क्षेत्र ऊपर से आने वाली नदियों के पानी के साथ-साथ स्थानीय वर्षा की भी मार झेलता है. अगर बारिश ऊपरी क्षेत्रों में ठीक ठाक या अधिक हो जाय और निचले क्षेत्र में वर्षा नगण्य हो या बहुत कम हो तब जहां तक नदी का पानी पहुँच जाएगा वहाँ तक तो बाढ़ रहेगी मगर उसके ठीक बगल में स्थानीय वर्षा के अभाव में सूखा पडा रहेगा. ऐसी परिस्थिति में कभी कभी ऐसा भी हो जाता है कि बाढ़ और सूखे के बीच का फासला महज आधे किलोमीटर से कम रह जाए. ऐसा यहाँ अक्सर हो जाया करता है. अगर स्थानीय वर्षा भी कम हो और ऊपर से भी नदी का पानी न आ पाए तो सूखा निश्चित रूप से पड़ेगा. ऐसा अगर दो या तीन साल लगातार हो जाय तो फिर सूखा नहीं पड़ता, अकाल पड़ता है. 

बिहार इस परिस्थिति को आज़ादी बाद कई बार झेल चुका है और भविष्य में भी इसकी सम्भावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता. इतना सब होने के बावजूद हमारी पहचान बाढ़ वाले और जरूरत से अधिक पानी वाले इलाके की है और पूरा देश हमारे पानी को लालायित होकर देखता है. इस साल जल-बहुल क्षेत्रों में बिहार में जो कुछ भी घट रहा है वह सभी के लिए चिंता का विषय होना चाहिए.  

किसी एक जगह पर बाढ़ और सूखा किसी ख़ास क्रम से आते हैं यानी पहले बाढ़ फिर सूखा या फिर पहले सूखा और फिर बाढ़. जहां तक खेती का सवाल है आम तौर पर रोहिणी नक्षत्र में आगे वर्षा हो जाए तो कृषि-कार्य शुरू हो जाता है. आर्द्रा नक्षत्र में रोपनी हो जाती है. अगर सब कुछ ठीक रहे और हथिया नक्षत्र में अच्छी बारिश हो जाए तो भदई और खरीफ दोनों ही फसलें ठीक हो जाती हैं. सब कुछ ठीक रहने के बावजूद अगर हथिया का पानी ना बरसे तो अगहनी धान कि उपज आधी तक हो जाती है और रब्बी के लिए भी ज़मीन में नमी नहीं बच पाती है. तब फिर सिंचाई की ही जरूरत पड़ती है.

रोहिणी, आर्द्रा और हथिया में अगर वर्षा न हो तो खेती की जरूरतों को पूरा करने के लिए कृत्रिम सिंचाई की व्यवस्था चाहिए जो परम्परागत स्रोतों के सूख जाने या हेय दृष्टि से देखे जाने अथवा स्वार्थवश सिंचाई विभाग (आज कल इसका नाम बदल कर जल संसाधन विभाग कर दिया गया है) या लघु सिंचाई विभाग के जिम्मे आता है. आर्द्रा और हथिया के बीच भी अगर कहीं सिंचाई की जरूरत पड़े तो यह मांग भी इन दोनों विभागों के दायरे में आती है. 

क्या यह दोनों विभाग अपना काम दुरुस्त तरीके से कर पाते हैं और जिस संरक्षणात्मक सिंचाई के लिए इन विभागों का जन्म हुआ था उसके प्रति कहीं कोई गांभीर्य दिखाई पड़ता है या इसके लिए बहानेबाजी का ही आश्रय लिया जाता है जो दशकों से चल रहा है? सुनने में आया है कि नए निजाम ने फिर से नेपाल में बाँध बनाने का संकल्प दुहराया है. इसके बारे में हमें सिर्फ इतना ही कहना है कि इस बाँध का प्रस्ताव पहली बार 1937 में किया गया था और तबसे वार्ताओं का दौर चल रहा है. यह वार्ता कब समाप्त होगी उसका अनुमान ही लगाया जा सकता है. यदि वार्ता 80 साल में भी अधूरी है तो बाँध बनाने में कितना समय लगेगा यह एक विचारणीय प्रश्न है जिस पर चर्चा होनी चाहिए. और अगर यह जरूरी सिंचाई नहीं मिल पाती है तो इसके लिए जिम्मेवारी तय होनी चाहिए और अगर कारवाई होती है तो उस कार्रवाई को सार्वजनिक किया जाना चाहिए. सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण के क्षेत्र में राज्य में जो अरबों रुपये का निवेश हुआ है उसके मूल्यांकन का समय आ गया है.

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