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अब क्या बताएं टूटे हैं कितने कहां से हम

Bhola Tiwari Jun 23, 2019, 5:56 AM IST टॉप न्यूज़
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एस डी ओझा

पहले पूरा मध्य एशिया सनातनी था. उसके बाद बौद्ध धर्म व इस्लाम का वर्चस्व बढ़ा. सनातन धर्म को हिन्दू धर्म भी कहते हैं.आर्यन या ईरानियों की भाषा में 'स 'को 'ह 'की तरह उच्चारित करते थे. इसलिए वे सिन्धु नदी के पार रहने वालों को हिन्दू कहने लगे. कुछ का विचार यह है कि सनातनी पंचाग चन्द्रमा पर आधारित है. चन्द्रमा का एक नाम इन्दु भी है. इन्दु का हीं अपभ्रंश हिन्दू बना. कुछ का यह भी जकहना है कि चूंकि भारत हिमालय से लेकर इन्दु सरोवर (हिन्द महासागर) तक फैला हुआ है, इसलिए हिमालय से 'हि 'और इन्दु सरोवर का 'न्दु ' लेकर बना दिया गया हिन्दू. जो भी हो," हिन्दू धर्म " की जगह इसे सनातनी या वैदिक धर्म कहना ज्यादा श्रेयस्कर होगा.

रुस में आज से एक हजार साल पहले सनातन धर्म था. यहां प्रकृति पूजा का प्रचलन था. सनातन धर्म में आज भी सूर्य, वायु, अग्नि, पर्वत और वृक्ष की पूजा होती है. प्रकृति को सम्मान देने की यह परम्परा रुस में ईसाइयत के आगमन तक जारी रहा. इनके प्रमुख देवता आसमानी विजली के संचालक वज्र देवता थे, जिन्हें ये पेरुन कहते थे. हर संधि या समझौता की शपथ पेरुन के नाम की खाई जाती थी . सनातन धर्म में भी इन्द्र वर्षा का देवता माने जाते हैं. आसमानी विजली उनका बज्र माना गया है.इसलिए वज्र देवता और इन्द्र में कोई फर्क नहीं हुआ. विद्वानों का मानना है कि प्राचीन रुस की पूजा पद्धति काफी कुछ सनातनी पूजा पद्धति से मिलती है. रुस में मृत्यु की देवी को मरेना व जीवन की देवी को जीवा कहते थे. मरेना व जीवा हमारे मृत्यु व जीवन शब्द के बहुत हीं करीब हैं. रुसी भाषा का व्याकरण हमारी संस्कृत के व्याकारण से काफी मिलती जुलती है.खुदाई से पत्थर व लकड़ी की मूर्तियां मिली हैं,जो कि हमारी देवी दुर्गा जैसी हैं. सन् 2007 में रुस के वोल्गा प्रान्त के स्तराया मायना गांव में खुदाई से विष्णु की मूर्ति मिली है. यह इस बात का द्दोतक है कि इस गांव के सनातन धर्मी विष्णु के परम भक्त रहे होंगे. 

महाभारत के अर्जुन का उत्तर कुरू तक जाने का उल्लेख मिलता है. इसमें उत्तर कुरू का जो भौगोलिक चित्रण मिलता है, वह हूबहू रुस का भौगोलिक विवरण है. अर्जुन के जाने के बाद सम्राट ललितादित्य, मुक्तादि और उनके पोते जयदीप का उल्लेख मिलता है. खुदाई से प्राचीन सिक्के, पदक, अंगूठियां आदि मिली हैं. रूस में ईशाई धर्म के आ जाने के बाद इन अवशेष चीजों की ऐतिहासिकता पर किसी ने ध्यान नहीं दिया. फिर यहां साम्यवादियों के आ जाने के बाद तो इन अवशेषों का विध्वंस होना हीं था. आज भी रूस के तातारिस्तान प्रांत के तातार मुस्लिम अपने को भारत वंशी मानते हैं.

फिर से रूस में सनातन धर्म हिलोरे ले रहा है. अब तक 6% रूसी सनातन धर्म में दीक्षित हो चुके हैं. यही प्रक्रिया रही तो अगले पचास सालों में पूरा रूस सनातन धर्म को मानने लगेगा .लोगों में सनातन धर्म के प्रति आस्था बढ़ती जा रही है. सनातन धर्म के प्रति बढ़ते हुए क्रेज को देखते हुए रशियन आर्थोडैक्स ईशाई मिशनरी ने धर्मान्त्रण पर रोक लगाने की मांग की है. रोक तो तब लगेगी, जब यह सिद्ध हो जाय कि बलात् धर्म परिवर्तन हो रहा है स्वेच्छा से किए गये धर्म परिवर्तन पर रोक नहीं लगती. इस्कोन जैसी संस्था पूरे रूस भर में सक्रिय है .रूसी लोग कृष्ण भक्त में तल्लीन रहते हैं. श्रीकृष्ण की गीता को रूसी लोगों ने अपने जीवन का मुख्य आध्यात्मिक ग्रंथ मान लिया है.

रूस का सनातन धर्म के प्रति मोह अपने आप में इस विशाल भारत देश की संस्कृतिक व धार्मिक सभ्यता को समेट कर रूस ले जाने का एक सार्थक प्रयास है. सनातन धर्म के आधुनिक संस्करण का जन्म हो रहा है. सनातन धर्म अपने टूटने के खिलाफ अब उठ खड़ा हुआ है. जरुरत है इसे तिनका तिनका खुद को समेट कर पुनः मजबूत करने की. राजेश रेड्डी का एक शेर मैं यहां उद्धृत करने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूं -

अब क्या बताएं ,टूटे हैं कितने कहां से हम. 

खुद को समेटते हैं यहां से हम, वहां से हम.

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