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••••• तो 1965 और 1971का युद्ध नहीं हुआ होता

Bhola Tiwari Jun 22, 2019, 2:22 PM IST टॉप न्यूज़
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अजय श्रीवास्तव

1962 के युद्ध में भारत चीन से बुरी तरह पराजित हो चुका था,भारत को युद्ध के अंतिम समय तक ये उम्मीद थी कि चीन भारत पर आक्रमण नहीं करेगा मगर चीन ने भारत के विश्वास पर तगडी चोट की थी।

अमेरिका और सोवियत संघ इस युद्ध के बिल्कुल खिलाफ थे मगर चीन को रोकना किसी के बस में नहीं था।युद्ध के थोडे हीं समय बाद अमेरिकी इंटेलीजेंस का पता चला कि चीन परमाणु बम की टेस्टिंग के काफी करीब पहुंच गया है।

उन दिनों कैनेडी अमेरिका के राष्ट्रपति थे,उन्होंने भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को अपने हाथ से पत्र लिखा कि अमेरिका चीन के परमाणु परीक्षण के पहले भारत को मदद करने को तैयार है।अमेरिका चाहता है कि चीन से पहले दूनिया का सबसे बड़ा लोकत्रांतिक देश भारत परमाणु परीक्षण करे।केनेडी ने यहाँ तक कहा कि अमेरिका आपको परमाणु बम भेजवा देगा बस आपको परमाणु परीक्षण करना है।

नेहरू जी ने तुरंत भाभा से बात की,उनके विचार भी सकारात्मक थे मगर विदेशी मामलों के जानकार और नई विदेश नीति बनाने वाली टीम इसके खिलाफ थी।उनका कहना था कि भारत शांतिपूर्ण राष्ट्र है और इसी सिद्धांत पर हमें आगे बढ़ना है।पंडित नेहरू को मजबूरन केनेडी को मना करना पडा।

ये बातें 1949 बैच के विदेश सेवा के अधिकारी महाराज कृष्ण रस्गोत्रा ने बीबीसी हिंदी के वरिष्ठ पत्रकार रेहान फजल से बातचीत में कहा।94 वर्षीय रस्गोत्रा ने कहा कि अगर भारत केनेडी के प्रस्ताव को मान लिया होता तो 1965 और 1971का युद्ध नहीं हुआ होता।

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