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जब तक जिये खुली किताब की तरह

Bhola Tiwari Jun 22, 2019, 7:13 AM IST टॉप न्यूज़
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अजय श्रीवास्तव

सरदार खुशवंत सिंह अपने जिंदगी के अंतिम क्षण तक जवाँदिल बने रहे।अपनी 90 वीं जन्मदिन पर उन्होंने कहा,"तम्मना तो बहुत रहती है दिल में,कहाँ खत्म होती है, जिस्म से बुढा जरूर हो गया हूँ लेकिन आँख अभी तक बदमाश है दिल अब भी जवान है,दिल में ख्वाहिशें तो रहती हैं, आखिरी दम तक रहेंगी पूरी नहीं कर पाऊँगा ये भी मुझे मालूम है।"

ये बिंदास बोल खुशवंत सिंह हीं बोल सकते थे क्योंकि उनकी जिंदगी लोगों के लिए खुली किताब थी।उन्होंने जिंदगी में कुछ छूपाया नहीं।उनकी छवि शराबी, रसिया,सेक्स के प्रति आशक्त की बन गई थी जबकि उनके जानने वालों की नजर में वे खुशदिल, अनुशासनप्रिय सख्शियत के मालिक थे।उनके पुत्र राहुल सिंह का कहना है कि वह रोज सुबह चार बजे उठ जाते थे,अपनी चाय वे स्वयं बनाते थे फिर दूरदर्शन पर हरमंदिर साहिब से आ रहे कीर्तन सुना करते थे।दोपहर बारह बजे वे लंच कर घंटे डेढघंटे आराम करते थे।रात आठ बजे का मतलब आठ बजे वे डिनर कर लेते और नौ बजे सो जाते थे।मरने तक यही उनकी दिनचर्या थी।उनसे बिना समय लिए कोई मिल नहीं सकता था।स्वभाव से नास्तिक खुशवंत सिंह अपनी सिख रूपी पहचान अंत तक बनाये रहे।उनके बेटे राहुल सिंह बताते हैं कि जब उन्होंने बाल कटवा लिये तो पिताजी बहुत नाराज हुऐ थे।धर्म में विश्वास न करने वाला व्यक्ति रोज हरमंदिर साहिब का कीर्तन सुनता था ये भी उनकी जिंदगी का अजीब पहलू था।इमेरजेंसी के दौर में उन्होंने संजय गांधी और इंदिरा गांधी का खूब साथ दिया मगर स्वर्ण मंदिर में सेना के घुसने का खूब विरोध भी किया।ऐसा नहीं था कि वे अलगावादियों का समर्थन करते थे।उन्होंने भिंडरावाला को खूब खरी खोटी सुनाई थी।खुशवंत सिंह को सन् 1974 में पद्मभूषण सम्मान से नवाजा गया था, लेकिन इंदिरा गांधी द्वारा ब्लूस्टार चलाये जाने के खिलाफ आवाज उठाते हुऐ सन्1984 में इस सम्मान को वापस कर दिया।उनके सम्मान वापिसी का समाज के हर क्षेत्रों में स्वागत किया गया।सिखों के तो वे निर्विवाद हीरो बन गए थे।

खुशवंत सिंह का जन्म दो फरवरी 1915 को पंजाब के हदाली में हुआ था जो अब पाकिस्तान में है।उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के सेंट स्टीफंस काँलेज से पढाई की।सन्1947 में उनका चयन फाँरेन सर्विश के लिए हो गया।उन्होंने स्वतंत्र भारत में सरकार के इंफारमेशन आँफिसर के तौर पर टोरंटो और कनाडा में सेवाएं दी,लेकिन उनका मन वहाँ भी नहीं लगा।उन्होंने इलुस्टेडेड वीकली आँफ इंडिया, नेशनल हेराल्ड और हिंदूस्तान टाईम्स में बतौर संपादक काम किया जो उनका स्वर्ग काल थी।उन्होंने "ट्रेन टु पाकिस्तान",आई शैल नाँट हियर द नाइटिंगेल, दिल्ली जैसी कालजयी रचनायें भी लिखी।उनकी सक्रियता 99 वर्ष में भी ठीक वैसी हीं बनी रही जैसे पहले हुआ करती थी।95 वर्ष की आयु में उन्होंने उपन्यास "द सनसेट क्लब" लिखा जो प्रबुद्ध वर्ग में काफी सराही गई।

उन्होंने पूरी जिंदगी ईमानदारी से बिताया।बहुत से निर्णय पर उनकी आलोचना भी खूब हुई लेकिन वे अपने निर्णय पर अडिग रहे।प्रसिद्ध इतिहावीद रामचंद्र गुहा ने उनकी मौत पर कहा कि वे हमेशा सिखों के इतिहास लिखने के लिए और बेबाक राय के लिए याद किये जायेंगे।दिल्ली में उन्हें "ओल्ड डर्टी मैन"के नाम से भी जाना जाता था लेकिन उन्हें कोई शिकायत नहीं थी।

एक साहित्यकार के रूप में,इतिहावीद के रूप में,संपादक के रूप में उनका कोई मुकाबला नहीं था वे अपनी शर्तों पर जिंदा रहे और बेहद आराम से सोते सोते चले गए।आप हमेशा याद रहोगे सरदार खुशवंत सिंह।

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