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भारतीय राजनीति की अभूतपूर्व घटना

Bhola Tiwari Jun 21, 2019, 7:05 AM IST टॉप न्यूज़
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अजय श्रीवास्तव

कुछ घटनाएं राजनीति में अभूतपूर्व होती हैं जिनका जितना विश्लेषण किया जाय उतना हीं कम है।एक ऐसी पार्टी जिसको पिछले विधानसभा चुनाव में बामुश्किल उम्मीदवार मिले थे चुनाव लडने के लिए, परिणाम बेहद हताश और निराश करने वाला था।भाजपा ने 50 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे उनमें से 49 सीटों पर उनके उम्मीदवारों के जमानत जब्त हो गए थे।एक उम्मीदवार जिसकी जमानत बची थी वो भी बुरी तरह हारा था। उस शून्य से सत्ता पर काबिज होना वाकई हैरतअंगेज है।

इस तपस्या के पीछे संघ की कडी़ मेहनत और तपस्या है।राममाधव और उनकी टीम ने एक एक घर के दरवाजे खटखटाए सभी मतदाताओं को कम्युनिस्ट सरकार की नाकामयाबी गिनवाईं और इस बात का भरोसा दिलाने में सफल रहे कि अगर सरकार बनती है तो त्रिपुरा को केन्द्र सरकार विशेष सहयोग करेगी।केन्द्र और राज्य में एक ही पार्टी का शासन विकास और रोजगार के द्वार खोलेगा।

मणिक सरकार जो बेहद शालीन और ईमानदार हैं उन्होंने दक्षिणपंथी का तगमा हासिल किऐ भाजपा को कमतर आँकने की भूल कर दी।उन्होंने स्वीकार किया है कि वामपंथी सरकार रोजगार सृजन करने में असफल रही जो सत्ता परिवर्तन का कारण बना।त्रिपुरा में बेरोजगारी का प्रतिशत 17% फीसदी है जिनके गुस्से का शिकार होना पडा।

राज्य में संघ के पचास हजार कार्यकर्ता दिन रात काम करते रहे,संघ का अनुशासन पग पग पर काम आया, कोई गुटबाजी नहीं थी बस एक हीं मिशन था कैसे वामपंथी सत्ता को उखाड़ फेंकना है।पन्ना प्रमुख पेज इंचार्ज बनाए गए,प्रत्येक पेज को 60 वोटरों की जिम्मेदारी दी गई जो घर घर जाकर लोगों को पार्टी की नीतियों को समझाता उन्हें पार्टी से जोडता।वहीं वामपंथियों में पच्चीस साल के शासनकाल से उपजी अहम घातक साबित हुई।एक माणिक सरकार के ईमानदार होने से क्या होता जब अन्य मंत्री, पदाधिकारी भाई भतीजावाद में लिप्त थे।

राजनीतिक विश्लेषक जो वातानुकूलित कमरों में बैठकर चुनाव विश्लेषण कर रहे थे वे इस परिणाम से अवाक थे,दरअसल माणिक सरकार की छवि,ईमानदारी और करिश्माई नेतृत्व का कोई जवाब नहीं था किसी के पास और न हीं उनके कद का किसी के पास सीएम केंडिडेट था।

राजनीति में जीत-हार सामान्य प्रक्रिया है लेकिन कुछ जीत असमान्य होती हैं और वह इतिहास के पन्नों में सुनहरे अक्षरों से दर्ज हो जाती है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता अपने मिशन में कितने समर्पित हैं इसका प्रत्यक्ष प्रमाण त्रिपुरा चुनाव में परिलक्षित हो गया है।

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